दिसम्बर 2019
अंक - 55 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत-गंगा

ऐसा भी दिन आएगा

हाथ मलेगा शीश धुनेगा,
रह रह कर पछताएगा।
ऐसा भी दिन आएगा।

बचपन बीता खेलकूद में,
उम्र कटी नादानी में।
डूब रही काग़ज़ की कश्ती
फिर से उथले पानी में।
चाहे जितना
जोर लगा ले
नाव बचा न पाएगा।
ऐसा भी दिन आएगा।

काम बहुत-से थे करने को
उन्हें बावरे भूल गया।
वशीभूत होकर माया के
आठ मदों में फूल गया।
उलझी कड़ियाँ
अंत समय में,
कैसे तू सुलझाएगा।
ऐसा भी दिन आएगा।

कर दे कमरा तन का खाली
कर तैयारी चलने की।
सूखी लकड़ी राह निहारे
पगले तेरे जलने की।
अकड़ी काया
लेकर कैसे
अपनी अकड़ दिखाएगा।
ऐसा भी दिन आएगा।


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जाग मुसाफ़िर जाग रे

दिल की धड़कन सुना रही है,
महाकाल का राग रे!
जाग मुसाफ़िर जाग रे!

लख चौरासी गतियाँ घूमी
किंतु रहा अज्ञानी रे!
श्रावक कुल मानुस तन पाया
फिर भी की नादानी रे!

डसे हुए है मुख में तुझको
मोह-कालिया नाग रे!
जाग मुसाफ़िर जाग रे!

मन-भँवरे को विषय भोग के
विषयों में मत उलझा रे!
उलझीं कड़ियाँ इस जीवन की
जीते जी तू सुलझा ले।
खेल रहा है क्यूँ अनादि से
रास रंग की फाग रे!
जाग मुसाफ़िर रे!

पर परिणिति की मोह-वारुणी
पीकर निज को भूला रे!
चार कषायों में रत रहकर
आठ मदों में फूला रे!
पुण्य-पाप के निज आतम में
लगा न अब तो दाग रे!
जाग मुसाफ़िर जाग रे!

अब तो रम जा निज परिणिति में
कर ले निज कल्याण रे!
चला चेतना, कर्म शत्रु पर,
भेद ज्ञान के वाण रे!
जग जाएँगे जनम-जनम के
सोए तेर भाग रे!
जाग मुसाफ़िर जाग रे!


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दीपक जैसा जल

जब तक साँसें
हैं इस तन में
दीपक जैसा जल।

रहा सदा
संघर्ष दिए का
घोर अँधेरों से
आशा की लौ
कब डरती है
दुख के फेरों से

मेरे मन
मत कम होने दे
अंतर का सम्बल।

मंज़िल चलने
से मिलती है
नदिया कहती है।
हवा हमेशा
प्राणों को
सरसाने बहती है

देख रहा क्यूँ
कल का रस्ता
आता कभी न कल।

निर्झर कहाँ
रुका करते हैं
गति अवरोधों से
हिम्मत वाले
कब घबराते
सतत विरोधों से

संशय की
आँधी से डिगता
कब विश्वास अटल?


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कर्म -मथानी में

छोटी-मोटी बातों में मत
धीरज खोया कर।
अपने सुख की चाहत में मत
आँख भिगोया कर।

काँटों वाली डगर मिली है
तुझे विरासत में।
छिपी हुई हैं सुख की किरणें
तेरे आगत में।
देख यहाँ पर खाई-पर्वत
सब हैं दर्दीले।
कदम-कदम पर लोग मिलेंगे
तुझको दर्पीले।
कुण्ठाओं का बोझ न अपने
मन पर ढोया कर।

बे-मानी की लाख दुहाई
देंगे जग वाले।
सुनने से पहले जड़ लेना
कानों पर ताले।
मुश्किल से दो-चार मिलेंगे
तुझको लाखों में।
करुणा तुझे दिखाई देगी
उनकी आँखों में।
अपने दृग जल से तू उनके
पग को धोया कर।

कट जायेगी रात सवेरा
निश्चित आएगा
जो जितनी मेहनत करता
फल उतना पायेगा।
समय चुनौती देगा तुझको
आगे बढ़ने की।
तभी मिलेंगी नई दिशाएँ
आगे बढ़ने की।
मन के धागे में आशा के
मोती पोया कर।

बीज वपन कर मन में साहस
धीरज दृढ़ता के।
छँट जायेंगे बादल मन से
संशय जड़ता के।
सबको सुख दे दुनिया आगे-
पीछे घूमेगी।
मंज़िल तेरे खुद चरणों को
आकर चूमेगी।
कर्म मथानी से सपनों को
रोज़ बिलोया कर।
छोटी-छोटी बातों में
मत धीरज खोया कर।


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उठा कर्म की ध्वजा

तट पर मत कर शोर
जलधि में उतर
डूब कर मोती ला

हासिल हुआ यहाँ कब किसको
बिना किए कुछ बतला दे
उठा कर्म की ध्वजा हाथ में
आलस को चल जतला दे
मन समझाने, भाग्यवाद की
मंदिर से मत पोथी ला

छोड़ सहारों को पीछे तू
पथ पर चल पड़ एकाकी
तू चाहे तो ला सकता है
धरती पर नभ की झाँकी
बड़ी-बड़ी ख़ुशियाँ आएँगी
पहले ख़ुशियाँ छोटी ला

खुली चुनौती दे अंबर को
आगे बढ़कर साहस से
सोना कर दे छू कर दुनिया
तू दृढ़ता के पारस से
कर अपने साकार दृष्टि में
विजय श्री की चोटी ला


- मनोज जैन मधुर

रचनाकार परिचय
मनोज जैन मधुर

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