दिसम्बर 2019
अंक - 55 | कुल अंक - 60
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

दुर्योधन और दुःशासन का बोलबाला मगर कृष्ण नदारद!
दुर्योधन और दुःशासन का बोलबाला मगर कृष्ण नदारद!
 
बेटियों को सब पर संदेह करना सिखाओ। उन्हें हथियार चलाना सिखाओ और आवश्यकता पड़ने पर उसका तुरंत उपयोग करना भी। आती-जाती सरकारों ने आज तक कुछ नहीं किया, आप उनके भरोसे न रहें! अपनी रक्षा आप करें! पुरुष मानसिकता में सुधार आने की सोच रखना एक भ्रम है, जिसे हम और आप वर्षों से पाल रहे हैं। कुछ पुरुषों के अच्छे हो जाने भर से कोई परिणाम नहीं आ सकता जब तक कि अपराध के विरोध में जनता के स्वर मुखर न हो! होने के बाद तो सब आन्दोलन करते हैं लेकिन किसी भी तरह के अपराध को सामने होते देख, बचकर निकल जाना; हमारे समाज की ये चुप्पी भी कम घातक नहीं। इसी बात से तो अपराधियों के हौसले बुलंद होते हैं। जब अपराधियों को इस बात का पूरा यक़ीन है कि इस देश में बलात्कारी को फाँसी कभी नहीं होगी, तो उन्हें क्यों और किस बात का डर!
 
'बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ' वाला स्लोगन किसी काम का नहीं! क्योंकि पढ़ लेने से भी बेटियाँ बच नहीं जातीं। वे तब भी ज़िंदा जला दी जाती हैं। उनका दोष यह है कि वे अब भी समाज पर विश्वास कर लेती हैं। समाज, जहाँ हवस के दरिंदे छुट्टा घूम रहे हैं। समाज, जहाँ बलात्कारियों पर वर्षों तक केस की नौटंकी कर उसे बचा लिया जाता है। समाज, जहाँ उन्नाव रेप के बलात्कारी विधायक लोगों के बीच सेलिब्रिटी की तरह हँसते हुए चलते हैं। समाज, जो कभी हिन्दू-मुस्लिम, मंदिर-मस्ज़िद में उलझ लड़ता है तो कभी उन नेताओं के लिए, जिनकी नज़रों में उसकी क़ीमत एक वोट से ज्यादा कुछ भी नहीं!
आलू-प्याज के दामों में उलझा समाज उनके कम होने की उम्मीद लिए आसमान की ओर तकता है। सब्जियों और पेट्रोल के महँगे दामों में उलझे समाज को पता ही नहीं चला कि बीते वर्षों में मौत कितनी सस्ती हो गई है!
 
हर 15 मि. में एक रेप
प्रति घंटे 4 रेप
प्रत्येक दिन लगभग 90 मुक़दमे दर्ज़
और प्रत्येक माह 2700 महिलाओं से रेप
क्या कीजियेगा, देश की बेटियों को बचाकर?
और ये तो वे आंकड़े हैं जो लिखित हैं. वे जिन्हें कभी दर्ज़ ही नहीं किया गया, उनकी सोचें तो रूह काँप उठेगी। 
मात्र कड़ी निंदा करने से समस्या नहीं सुलझ जाती! गहरा दुःख व्यक्त करना भी काफ़ी नहीं! मन की बात बहुत हुई, अब जन की बात भी सुनी जाए, जनता की पीड़ा महसूस की जाए, उनके भय के अंदर झाँककर देखा जाए कि अब कितनी सहिष्णुता शेष है। कुल मिलाकर 
यथार्थ के धरातल पर जनता को अब अपराधियों के ख़िलाफ़ एक्शन की दरकार है। एकाध केस को निबटाना समस्या का समाधान नहीं है। इसे जड़ से उखाड़ना होगा। 
 
सहिष्णुता की और कितनी परीक्षा, कब तक दे आम आदमी??
यदि सरकार देश नहीं संभाल सकती, पुलिस सुरक्षा नहीं दे सकती और न्याय तंत्र अपने आँखों की पट्टी खोल वीभत्स अन्याय को भी नहीं देख पाता! अपराधी सामने खड़े होने पर भी वर्षों तक कानूनी पाठ पढ़े जाते हैं तो माफ़ कीजिये, ये अब शायद किसी के बस की बात ही नहीं रही! आप एक-दूसरे की दुहाई देकर राजनीतिक रोटियाँ सेकिए,अब जनता अपना हिसाब खुद ही कर लेगी! आने वाली पीढ़ियों के हिस्से, समाज का यही विकृत रूप पेश होगा। 
दुर्भाग्य है कि इतिहास में यह समय 'बलात्कार युग' के नाम से जाना जाएगा. जहाँ दुर्योधन और दुःशासन का बोलबाला था और कृष्ण नदारद!
 
गाँधी के देश की ये कैसी तस्वीर है कि 'गाँधीगिरी' के कट्टर समर्थकों ने भी अब हाथ खड़े कर दिए हैं। सच यही है कि जनता की सहनशक्ति की भी एक सीमा होती है जो अब समाप्त हो चुकी है। राजघाट पर आमरण अनशन पर बैठी महिलाओं को देख बापू का हृदय भी रोता होगा। आज यदि वे जीवित होते तो स्वयं आगे होकर भारत की बेटियों के हाथ में लाठी थमा उनसे अत्याचार का विरोध करने और अत्याचारी का सिर क़लम करने को कहते। 
 
कितना अच्छा होता यदि देश की शीर्षस्थ महिलाएँ, नेता, पत्रकार सब एकजुट हो आमरण अनशन पर बैठ, बलात्कारियों के लिए तुरंत दंड की माँग करते लेकिन क्यों बैठें, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा जो आड़े आती है! सत्ता के विरुद्ध एक शब्द भी बोल दिया जाए तो राष्ट्रहित की बातें चीख-चीखकर सुनाई जाती हैं लेकिन बलात्कार के ख़िलाफ़ बोलने में इसी ज़ुबाँ को लकवा मार जाता है! ये राज्य के आधार पर बोलना तय करते हैं.
हिन्दू-मुस्लिम करते समय इनकी छवि चमकने लगती है क्या?
 
जनता भी ख़ूब समझती है कि ढोंगी नेताओं का एक ही मन्त्र है, 'अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता'.
वरना अगर ये सब वहाँ अड़ जायें तो क्या मजाल कि अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हों कि उन्हें किसी का डर ही नहीं! पर अपराधों के उन्मूलन से जुड़कर कौन अपने राजनीतिक कैरियर की अंत्येष्टि करेगा! यही इस देश का सच और जनता का दुर्भाग्य है!
देशवासियों की हिम्मत, दिल और विश्वास तीनों टूट चुके हैं. कौन जोड़ेगा इसे?

- प्रीति अज्ञात

रचनाकार परिचय
प्रीति अज्ञात

पत्रिका में आपका योगदान . . .
हस्ताक्षर (60)कविता-कानन (2)ख़ास-मुलाक़ात (13)मूल्यांकन (2)ग़ज़ल पर बात (1)ख़बरनामा (12)व्यंग्य (1)संदेश-पत्र (1)विशेष (2)'अच्छा' भी होता है! (2)फ़िल्म समीक्षा (2)