जून 2019
अंक - 50 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

प्रकृति, पर्यावरण और पृथ्वी
प्रकृति, पर्यावरण और पृथ्वी 
 
प्रकृति के इंद्रधनुष से सजी इस सृष्टि को जब-जब निहारते हैं, इसे दाता के रूप में ही पाते आये हैं। सदियों से ये धरती हम सबका भार सह रही है। नदी, पहाड़, झरने, वनस्पति इन सभी ने मिलकर जीवन संभव किया। सूरज ने ऊर्जा भरी सुबह देकर हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी तो चाँद ने थके हुए मनुष्य को अपनी नर्म बाँहों की सुकून भरी थपकी देकर उसकी हर थकान को दूर किया। प्राणवायु साँसों को अबाध गति प्रदान करती रही। सदियों से अडिग खड़े पहाड़ों को देख इच्छाशक्ति को और भी दृढ़ता प्राप्त होती है एवं इनसे गुज़रती हिमनदी हृदय में भीतर ग़ज़ब का आत्मविश्वास भर देती है। बहते पानी की आवाज़ किसी नवजात शिशु की किलकारी बन खूब हिलोरें मारती है। इन रास्तों से गुज़रते हुए हॅंसते-झूमते फूलों और चहकते पक्षियों का दर्शन जीवन के प्रफुल्लित भाव और सुन्दर होने की अनुभूति का जीवंत प्रमाण बन प्रस्तुत होता है। कभी जंगलनुमा स्थानों में भटककर देखें तो यहाँ सारे पेड़ किसी बातूनी दोस्त की तरह गले मिलते हैं। उन पर फुदकते पक्षी कुछ इस तरह से मस्ती और उल्लास से भरे लगते हैं जैसे मायके आकर लड़कियाँ चहकती, इतराती घूमती हैं। कभी-कभी तो यूँ भी महसूस होता है कि किस्से-कहानियों से निकल; वो अलादीन का जिन्न या कोई सुन्दर-सी परी भी अभी सामने आ खड़ी होगी और हाथ थाम; हमें वहाँ की सबसे अनोखी मीठी झील के पास छोड़ आएगी।
वस्तुतः प्रकृति ने हर तरफ से अपने स्नेहांचल में हमें घेरे रखा है। फल-फूल से लदी झुकी हुई डालियाँ और उन पर मंडराते हुए भँवरे किसका मन नहीं मोह लेते! नदी के किनारे घंटों यूँ ही बैठे रहना, कभी आसमान में टहलते बादलों की आकृतियों को समझना तो कभी पानी में उनकी छवि निहारना, प्रकृति प्रेमियों के हृदय को अपार शीतलता प्रदान करता है।
मनुष्य जाति पर यह वो ऋण है, जो हम कभी चुका नहीं सकते लेकिन इसको सहेजकर धन्यवाद अवश्य दे सकते हैं। 
 
दुर्भाग्यपूर्ण है कि धन्यवाद देना तो दूर, हम तो इसका उचित प्रकार से संरक्षण भी न कर सके। आज धरती का अस्तित्व ख़तरे में है। वायुमंडल में जो भीषण प्रतिकूल परिवर्तन हुए हैं और प्राकृतिक आपदाओं के रूप में जिसका परिणाम विश्वभर को झेलना पड़ रहा है, वह मानव के कुकृत्यों की ही देन है। 
हमने तालाबों का पानी चुरा लिया, उन्हें पाटकर भवन बना लिए। रसायनों के बहाव से नदियों को विषैला कर दिया, बारिश से उसके हिस्से की माटी छीन उस ज़मीन पर सीमेंट-कंक्रीट से भर अपना पट्टा लगा लिया, पानी के तमाम जलस्त्रोतों को नष्ट कर दिया। जंगलों को ऊँची इमारतों की तस्वीर दे दी, कीटनाशकों के अधिकाधिक प्रयोग, मिलों, कारखानों, वाहनों से बाहर निकलने वाले धुएं तथा विषैली गैसों से वायु को प्रदूषित किया। प्रकृति का जितना और जिस हद तक दोहन कर सकते थे; किया। अब हमारे पास अपना कहने को अधिक कुछ शेष नहीं है।
 
ये मासूम पक्षी; जो हर वृक्ष को अपना घर समझ हमारी सुबह-शाम रोशन करते हैं। जो सुबह की पहली धूप के साथ हमारे आँगन में चहचहाहट बन उतरते हैं, जो किसी बच्चे की तरह खिड़कियों से लटक सैकड़ों करतब किया करते हैं, जो अलगनी को अपने बाग़ का झूला समझ दिन-रात फुदकते हैं। हमने इन्हें क्या दिया? आधुनिकीकरण और विकास के नाम पर हम इनके भी घर छीन रहे हैं। जंगलों को काटकर हमने न जाने कितने जीव-जंतुओं को बेघर कर दिया। समाचार में देखकर चिंता व्यक्त करते हैं कि "जानवर शहर में घुस आया!" नहीं! वो उसका ही घर था। उनकी जमीन पर अतिक्रमण के दोषी हम हैं। जब जंगल लगातार कटते जायेंगे तो कहाँ जायेंगे ये जीव-जन्तु? इनके बिना ये दुनिया कितनी सन्नाटे भरी होगी, इसकी कल्पनामात्र सिहरा देने के लिए काफ़ी है। इनकी प्रजातियाँ यूँ ही विलुप्त नहीं हो रहीं। अपितु मानवीय स्वार्थ की बलि चढ़ रही हैं। पारिस्थितिक तंत्र के इस असंतुलन ने ही पर्यावरण सम्बन्धी समस्त समस्याओं को जन्म दिया है।
 
इस हरियाली का जीवन कितना नि:स्वार्थ है। हरीतिमा से आच्छादित, फूल-फल से लदे वृक्ष बिन कहे ही सकारात्मक सन्देश दे जाते हैं। ये मुसाफिरों को छाया देते हैं, अपनेपन का एहसास कराते हैं, बिन किराए, कुछ पल निश्चिंतता से बैठने की सुविधा देते हैं। इन्हें अपने होने का मतलब पता है, ये शिकायत नहीं करते, ये जानते हुए भी कि कोई राहगीर पलटकर उनकी तरफ वापिस कभी नहीं आएगा। उन्हें यह भी पता है कि दिन की चटक रोशनी में ही हमें उनकी ज़रूरत महसूस होती है और एक दिन कुल्हाड़ी के तीक्ष्ण प्रहार से उन्हें नष्ट कर दिया जाएगा। लेकिन फिर भी उसकी शाखाएँ सदैव आलिंगन की मुद्रा में ही दिखेंगी। वृक्ष बचेंगे तो डालियों से झूलते झूले की परंपरा बनी रहेगी और बच्चों का खिलंदड़पन नित नई उड़ान भरेगा। संस्कृति जगमगा उठेगी। 
 
पानी की कितनी कमी है और जल-स्तर भी लगातार घटता जा रहा है, इस दुखद तथ्य से हम सब भली-भाँति परिचित हैं। लेकिन औद्योगीकरण और बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए एक अदद घर का रोना लेकर हम इस बात को भूलते हुए लगातार जंगल काटते आ रहे हैं कि वृक्ष और मिट्टी के बिना बारिश का पानी पक्की ज़मीन कहाँ से सोखेगी? ऐसे में जल-स्तर घटना तय ही है जब उसे बढ़ाने के सारे माध्यमों का मुँह हम ही बंद कर रहे हैं। जल के प्रदूषित होने और गाँवों-शहरों में इसके निकास की समस्या और उससे पनपती बीमारियों की जो गाथा है सो अलग! यह इस भू-मंडल पर रहने वाले प्रत्येक मनुष्य का अधिकार है कि उसे पीने के लिए स्वच्छ जल मिले लेकिन विडंबना देखिये कि मनुष्य ही इसकी अनुपलब्धता के लिए उत्तरदायी भी है। दो-ढाई दशक पूर्व की ही बात करें तो हमारे देश में 'पानी के व्यवसाय' का अस्तित्त्व तक नहीं था और न ही इसके शुद्धिकरण की कोई आवश्यकता ही थी। कब धीरे-धीरे हम सबके घरों में प्यूरीफायर लग गए या बोतलबंद पानी आने लगा; पता भी नहीं चला। पानी को शुद्ध बनाने, इसकी पैकेजिंग और इसे बेचने के लिए तमाम कम्पनियाँ बनती चली गईं और इसके विज्ञापन भी सराहे जाने लगे। लेकिन मूल समस्या अब भी जस-की-तस है। विकास के नाम पर जितना शोषण इस धरती का किया गया है उसके दुष्परिणाम अब दृष्टिगोचर होने लगे हैं। आने वाली पीढ़ियों के लिए यह स्थिति जितनी भयावह होगी, इससे निबटना उतना ही दुष्कर भी रहेगा। 
 
पर्यावरण से सामंजस्य बिठाये बिना मानव सभ्यता के विकास की कल्पना ही नहीं की जा सकती। प्रत्येक क्षेत्र विशेष में वहाँ की परिस्थितियों के अनुकूल ही वनस्पतियों का विकास तथा जीव-जंतुओं का आवास तय होता है। प्रतिकूल पर्यावरण में पादप-समूहों तथा जीवों की प्रजातियाँ विलुप्त हो जाती हैं अथवा उनकी प्राकृतिक क्रिया में अवरोध उत्पन्न होता है। इस विषम परिस्थिति का सीधा प्रभाव वहाँ की कृषि, अन्य उद्योग एवं मानवीय जीवन पर पड़ता है। जितनी लापरवाही से हम सब नष्ट करते जायेंगे उतने ही दुरूह परिणामों का मिलना भी तय है। 
 
प्रकृति की प्रकृति में कुछ भी नहीं बदला। बस, मनुष्य ही खोटा निकला! हमें प्रकृति जैसा बनना होगा। इससे जीने की प्रेरणा लेनी होगी।
आसमान सिखाता है कि माँ के आँचल का अर्थ क्या है।
पहाड़ सच्चे दोस्त की तरह, किसी अपने के लिए डटकर खड़े रहने की बात कहते हैं।
सहनशक्ति धरती से सीखनी होगी।
प्रेम क्या होता है और बिना किसी अपेक्षा के अगाध स्नेह कैसे किया जाता है, किसी के दुख में साथ कैसे दिया जाता है; इस कला को पशु-पक्षियों से बेहतर कोई नहीं जानता।
कट-कटकर गिरने के बाद फिर कैसे बार-बार उठना है, आगे बढ़ना है; जीवन का यह पाठ पौधे सिखाते हैं। जब तक ये जीवित हैं  प्राणवायु भी देते हैं कि हमारे अस्तित्त्व को ख़तरा न रहे!
धूप, हवा, पानी से दान की प्रसन्नता महसूस करनी होगी। 
सभ्यता, बीजों और माटी से समझनी होगी जो उगने के लिए धूप और पोषक तत्त्व साझा करते हैं। 
 
यदि हम ऐसा कर पाते हैं तो ही मनुष्यता को पा सकेंगे। उसके पश्चात् ही प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षित होने की आशा रख सकते हैं। सरकारें कुछ नहीं कर सकतीं जब तक कि हम मनुष्यों की सोच निज हितों से ऊपर न उठे। जिन कारणों से पर्यावरण को हानि पहुँच रही है उन क्रियाकलापों का उचित प्रबंधन होना आवश्यक है साथ ही पर्यावरण संरक्षण हेतु जनमानस को जागरूक एवं सचेत भी करना होगा। 
सृष्टि ने हमें वो सब दिया जो इस धरती को स्वर्ग बना सकता था लेकिन हम उसे प्लास्टिक और विषैले पदार्थों से भर अपनी असभ्यता का परिचय देते रहे। परिस्थितियाँ इतनी विकट हो चुकी हैं कि अब वैश्विक स्तर पर यह घनघोर चिंता का विषय बन चुका है। यहाँ तक कि पृथ्वी के समाप्त होने की तिथि भी आये दिन घोषित होने लगी है। 
 
समय तेजी से आगे बढ़ रहा है पर अभी बीता नहीं! हम सब को अपनी इस धरा से प्रेम है और जब तक ये प्रेम जीवित है तब तक पृथ्वी के बचे रहने की उम्मीद क़ायम है। यदि प्रेम ही ख़तरे में है तो फिर यूँ ही जीकर करेंगे भी क्या और किसके लिए! झरनों में जो संगीत है, नदी की जो कलकल है, पहाड़ों से लिपटी जो बर्फ़ है, तारों से खिलखिलाता जो आकाश है, ये बाँहें फैलाए जो वृक्ष खड़े हैं और फूलों की ये सुगंध जिसे घृणा की हजारों जंजीरें भी अब तक बाँध नहीं सकी हैं, ये पक्षी जो आसपास फुदकते, चहचहाते हैं..यही प्रेम है, यही हमारी प्यारी पृथ्वी है। यह हमारी वो विरासत है जिसे हमें आने वाली नस्लों के लिए सुरक्षित रख छोड़ना है कि वे जब इस दुनिया में आयें तो ये उन्हें भी इतनी ही सुन्दर दिखाई दे जिसके प्रत्यक्षदर्शी हम सब रहे हैं। 
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चलते-चलते: मुज़फ्फरपुर में मस्तिष्क ज्वर (इंसेफेलाइटिस) के शिकार बच्चों की असमय मृत्यु ने व्यवस्था का एक और कुरूप चेहरा प्रस्तुत किया है जहाँ प्रशासन या तो मौन है या फिर 'लीची' को दोषी ठहराकर हाथ झाड़े जा रहे हैं। हमें यह ध्यान रखना होगा कि कोई फल नहीं बल्कि उस पर हुए कीटनाशकों या फिर जहाँ ये उगाई जा रहीं हैं; उन क्षेत्रों में आवश्यकता से अधिक कीटनाशकों का प्रयोग इन मौतों का कारण हो सकता है। 2014 में कुपोषण भी इसका ज़िम्मेदार ठहराया गया था। उस समय टीकाकरण तथा अस्पतालों में और सुविधाएँ देने की तमाम घोषणाएँ भी की गईं थीं। अगर वे कागज़ी घोषणाएँ न होतीं तो शायद  मुज़फ्फरपुर की ये तस्वीर इतनी दुखदायी नहीं होती! 
आम जनता बार-बार भूल जाती है कि घोषणाएँ, चुनाव जीतने के लिए की जाती हैं और इनका यथार्थ से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता! काश! सरकार और प्रशासन से बस इतना भर ही हो सके कि देश का कोई बच्चा भूखा न सोये, उसके शरीर में पानी की कमी न हो और आसपास का वातावरण स्वच्छ हो! इसके लिए जनता को भी जागरूक होना पड़ेगा। 
वे बच्चे जिनको लेकर माँ-पिता हजार सपने पाल लेते हैं और बुजुर्ग जिनको पुचकार रोज बलैयाँ लेते हैं। आज उनके घरों में सिसकियाँ हैं, मातम है और सिस्टम से न भिड़ पाने की अंतहीन बेबसी! वे अपनी उस ग़रीबी को भी बारम्बार कोस रहे होंगे जिसकी नियति में अव्यवस्थाओं के चलते केवल और केवल अपनी बलि देना लिखा है। अगले चुनाव की पहली आहट पर, संवेदनहीन नेता इनका प्रयोग पक्ष/विपक्ष के लिए अवश्य करेंगे। उसके अतिरिक्त कुछ नहीं होना! हाँ, बस ये मौतें आँकड़ा बन रह जानी है, भविष्य में तुलनात्मक अध्ययन के लिए।
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* हस्ताक्षर के इस विशेषांक में प्रकृति और पर्यावरण को केंद्र में रखते हुए साहित्य की विभिन्न विधाओं में रचनाएँ आमंत्रित की गई थीं, जिसमें हमें सैकड़ों रचनाकारों के मेल प्राप्त हुए। आप सभी के चिंतन एवं रचनात्मक सहयोग से हस्ताक्षर परिवार आह्लादित है। आशा है यह अंक आपकी आशाओं पर खरा उतरेगा। प्रतिक्रियाओं की अपेक्षा रहेगी। आप सभी का सादर धन्यवाद।
 

 


- प्रीति अज्ञात

रचनाकार परिचय
प्रीति अज्ञात

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