महिला ग़ज़ल अंक
अंक - 40 | कुल अंक - 60
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव

ग़ज़ल-

वो बंद पलकों से तक रहा है, निहां-निहां सी मैं हो रही हूँ
छुपाऊँ कैसे बदन की लग़ज़िश,अयां-अयां सी मैं हो रही हूँ

लगा रहा है वो कश पे कश और धुआँ-धुआँ सी मैं हो रही हूँ
हवा उसे छू के आ रही है, रवां-रवां सी मैं हो रही हूँ

हुए हैं गेसू ज्यूँ रात रानी, गुलाब जैसे ये लब हुए हैं
महक रहा है चमन सरापा, जवां-जवां सी मैं हो रही हूँ

जो लब न खोलूँ तो नैन बोलें, ज़ुबां की अंगड़ाई राज़ खोले
ग़ज़ब हुई है ये रुख़ की रंगत, बयां-बयां सी मैं हो रही हूँ

वो मेरे दिल में समा गया है, मगर मुझे है तलाश उसकी
यकीं-यकीं सा है इश्क़ उसका, गुमां-गुमां सी मैं हो रही हूँ

ख़ुदा ने बख़्शी है वो फ़कीरी, कि सर ये सजदे में झुक रहा है
नमाज़ जैसी 'ज़िया' है उसकी, अज़ां-अज़ां सी मैं हो रही हूँ


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ग़ज़ल-

वफ़ा के वादों पे चल रही हूँ
मैं बारिशों में भी जल रही हूँ

सम्भाले रखना मुझे हमेशा
किसी की पहली ग़ज़ल रही हूँ

गुज़र रहा है वो मुझको छू कर
मैं लड़खड़ा कर संभल रही हूँ

वो एकटक मुझको तक रहा है
मैं दिल ही दिल मे मचल रही हूँ

खुला है मौसम बहार-ए-दिल का
मैं धूप जैसी निकल रही हूँ

दहक रहा है वो बनके सूरज
मैं बर्फ जैसी पिघल रही हूँ

बहार बनकर तुम ऐसे छाए
कली से गुल में बदल रही हूँ


- दीपाली जैन ज़िया

रचनाकार परिचय
दीपाली जैन ज़िया

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ग़ज़ल-गाँव (2)