अगस्त 2015
अंक - 6 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

लघुकथाएँ

लघुकथा- इंसाफ़

एक अख़बार की तेज-तर्रार चीफ एडिटर मेधा के प्रेम में पागल रोहन को अपनी सीधी-साधी घरेलु पत्नी रिया काँटे की तरह चुभ रही थी। रही सही कसर उसने एक पुत्री को जन्म देकर पूरी कर दी। पुत्र के सपने देख रहा रोहन पागल हो गया और उसने धक्के देकर पत्नी पुत्री को निकाल बाहर किया।
आज एक बुटीक की मालकिन के रूप में निखरी हुई रिया और उसकी इंजीनियर बेटी को देखकर वह हतप्रभ रह गया। प्रकृति उसके अन्याय का दंड दे चुकी थी। वह आज भी एक संतान के लिए तरस रहा था।



लघुकथा- जैसी करनी वैसी भरनी

केशव ने उम्र भर अमीर-ग़रीब किसी को नहीं बख्शा। लाचार की आह की फ़िक्र न करके खूब रिश्वतखोरी की। इकलौते बेटे के लिए बेशुमार दौलत जो इकठ्ठी करनी थी उसे...!
"आपने अच्छा नहीं किया पापा... मेरा अकाउंट ब्लाक करके" ड्रग्स के नशे में झूमता हुआ वह चीखा।
"बेटा! नशा तेरी जान ले लेगा, छोड़ दे इसे। ये सबकुछ तेरा ही तो है" वो गिड़गिड़ाया। पर बेटा वहाँ कहाँ था।
नशे की तलब ने उसे कुछ सोचने के काबिल छोड़ा ही कहाँ था। जा रही एक महिला का पर्स खींचकर वह ऐसा भागा कि काल बनकर आते ट्रक को न देख सका। ज़िन्दगी ने उसे दूसरा मौका फिर नहीं दिया। बाप के बुरे कर्मो का फल औलाद को मिल चुका था।


- ज्योत्स्ना 'कपिल'

रचनाकार परिचय
ज्योत्स्ना 'कपिल'

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कथा-कुसुम (4)