अगस्त 2015
अंक - 6 | कुल अंक - 60
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

असत्यं प्रियम वेलकम पर ख़बरदार! न ब्रूयात स त्यम अप्रियम

कहानी का जिन्न

यह बादशाह अकबर की पांचवी पीढ़ी थी। मान लेने में क्या हर्ज है कि बादशाहत कायम थी। बादशाहत तब भी खानदानी होती थी, विरासत में बाप से बेटे को ही मिलती थी। बादशाहत अभी भी विरासत में बाप से बेटे को ही मिलती है पर हर पांच साल पर सबसे स्वीकृति का ठप्पा लगवाने का स्वांग भर होता है जिसकी जरूरत पहले नहीं थी। बादशाह की तरह खानदानी वजीर (चापलूस) के रुप में बीरबल की पाँचवी पीढ़ी भी बादशाह की बगलगीर थी।

बादशाह अकबर की पांचवी पीढ़ी के बादशाह की सल्तनत में सब कुछ मजे से चल रहा था। काम करने वाले, ठलुये, चापलूस, चोर, घूसखोर, बनिये-वक्काल सब मजे में थे। बीरबल की पांचवीं पीढी के वशंज शाम को तर माल सूंत कर पेट पर हाथ फेर ही रहे थे कि बादशाह का बुलावा आ पहुँचा। जैसे-तैसे धोती की लांग समेटते वे हुजूर के दरबार में दाखिल हुये कि देखो आज कौन सी मुसीबत आ पड़ी है, तो देखा बादशाह सलामत तो विदेशी महंगी सिगार मुंह में दबाये आसमान ताक रहे हैं।

 

पास पहुंचते ही बीरबाल ने खंखारा फिर झुक कर सलाम किया, "हुजूर का इकबाल बुलंद हो, नाचीज खिदमत में हाजिर है, हुकुम करें", हालांकि वे मन ही मन भुनभुना रहे कि यह भी साली कोई नौकरी हुई कि जब मन किया बुला भेजा वह भी बिना किसी ओवर टाइम भत्ते के। आज आफिस का चपरासी तक बिना ओवरटाइम क्लेम किये शाम 4 बजे तक रूकने को तैयार नहीं........नौकरी न हुई गुलामी हो गई।"

वह तो अच्छा हुआ कि बादशाह सलामत सिगार का एक लम्बा कश लगा एक लम्बी खॉसी का पोज बना चुके थे वरना बीरबल वंशज उन्हे भुनभुनाते दिख जाते। जब बादशाह सलामत की खॉसी का दौर रूका तो उन्हाने इशारे से बीरबल वंशज को बैठने के लिये कहा।
"हुजूर ने नाचीज़ को याद फरमाया", बीरबल वंशज बहुत सावधानी पूर्वक बोल रहा था ताकि अंदर की तल्खी चेहरे पर न उभर आए।
"हां बीरबल पंचम.....बात यह है कि हम भी एक कहानी लिखना चाहते हैं.......... "

 

बीरबल वंशज जैसे आसमान से गिरा, मन ही मन भुनभुनाया, "इस साले निरक्षर को क्या हुआ? साला काला अक्षर भैंस बराबर..........हर चीज को इतना आसान समझाता है। यह कोई पांच साला स्वांग नहीं कि गुण्डों के बल बूथ कैप्चरिंग करवा ली, विरोधियों को मरवा दिया और बादशाह हो गये। यह तो दिमाग का काम है, दिमाग का......."

"क्या राय है तुम्हारी बीरबल पंचम, चुप क्यों हो?"

बीरबल वंशज सकपका गया पर संभलते हुये बोला, "हुजूर तो इतनी बडी सल्तनत के बादशाह हैं फिर हुजूर का इन छोटी-छोटी चीजों पर वक्त जाया करना, वक्त की बरबादी होगी हुजूर।"
"छोटी-छोटी चीजें पंचम.....", बादशाह ने पूछा।

"हां हुजूर, ये .....क्या कहते है.......हॉ कहानी................ये कहानियां लिखना तो बेरोजगारों......फाकाकशों का काम है या फिर कुछ खुराफाती दिमागों का शगल.........."
"क्या कहते हो पंचम?"

"जी हुजूर, देख लीजिये किसी बड़े आदमी ने आज तक कोई कहानी लिखी है, सिवाय कुछ खप्ती दिमाग वाले बुडबकों के? आप जैसे बुलंद इक़बाल लोग तो कथाएं बनाने के लिए हैं, लिखने के लिए तो ऐसे ऐरे-गैरे नत्थू-खैरे बहुत घूमते हैं।"

 

बीरबल वंशज की बातें मन माफिक न लगने से उकताए बादशाह जोर से बोले, "खामोश"
बीरबल वंशज सकपका कर चुप हो गया।
"वह साला पड़ोसी राज्य का नायब तक इतनी अच्छी कहानियां लिखता है। रियाया के लोग उसकी कहानियों को उस दिन कितने डूब कर सुन रहे थे कि हमारी मौजूदगी भी फालतू हुई जा रही थी।
"जी" बीरबल वंशज ने थूक सटका।
"तुम मानो न मानो पंचम, कहानी लेखकों का गलैमर ही अलग होता है....उसके आगे हमारी सारी आन-बान का ताम-झाम फीका है। कुछ भी हो बीरबल हम एक कहानी लिख कर रहेंगे", बादशाह ने अपनी इरादा जाहिर कर दिया।
"बीरबल पंचम समझ गये कि बादशाह पर "लिखास का भूत" चढ़ गया है। "बिना लिखे मानेगा नहीं ये बेवकूफ", वह मन ही भुनभुनाए।
"अब बताओ लेखन भी कोई ऐसी चीज है जो हर ऐरा-गैरा-नत्थू खैरा कर ले, वरना सब ऐरे-गैरे प्रेमचंद न बन जाते। इन्हें तो एक ही विज्ञान आता है जोड़-तोड़ का विज्ञान, दल-बदल का विज्ञान, राजनीति की शह और मात का विज्ञान। हुं कहानी लिखेंगे, चिढ्ठी तो ढंग से लिख नहीं पता बुड़बक। वह तो मोबाइल फोन का भला हो कि लोगों का चिठ्टी लिखना ही छूट गया वरना एक यह और छीछालेदर होती", बीरबल मन ही मन सोच  रहे थे।


"क्या सोच रहे हो बीरबल पंचम? कुछ इंतजाम करो, कहानी तो मुझे लिखनी ही है। वह पड़ोसी राज्य का नायब साला........उसे जबाब देना है। हमारी इज्जत, सल्तनत की इज्जत है और सल्तनत की इज्जत को तो हर हाल में बचाना ही है चाहे सच से या झूठ से।"
"बजा फरमाया हजूर, राजनीति का यही उसूल है..........आज तो हर सल्लतन के बादशाह प्रेस और मीडिया तक के सामने झूठ बोल रहे हैं। ......... दूर क्यों जाइये, अपनी पडोसी सल्तनत "इस्लामिस्तान" को ही ले लीजिये", बीरबल पंचम ने नहले पर दहला जड़ा।
"वह तो ठीक है पंचम पर जल्द से जल्द हमारे कहानी लिखने का इंतजाम कीजिए", बीरबल की चापलूसी से उकताए बादशाह, चिढ़ कर बोले।

"इंतजाम" शब्द सुनकर बीरबल पंचम के दिमाग में कई बल्ब जले-बुझे फिर उन्होंने अपनी समझ से सबसे मौजूं इंतजाम पेश (प्रस्तुत) किया।
"हुजूर ऐसा करते हैं अपनी सल्तनत के सबसे बढ़िया कहानी लेखक से गुपचुप एक कहानी लिखवा लेते हैं। उसे हुजूर के नाम से किसी नामचीन खबरनामे में शाया (प्रकाशित) करा देंगे फिर हुजूर के ही चरचे होंगे......हुजूर के।"


"पागल हुये हो बीरबल, हमारी खिलाफत वाले लोगों को इसकी हवा लगेगी तो अगले पांच साला स्वांग में वे इसका भी मुद्दा बना लेंगे। साले मुद्दत से सियायत से दूर है सो ठलुआ बैठे हैं कहो तो अभी से ही सडकों पर उतर आयें।"
"हुजूर.................."
साले हगने-भूतने की बातों तक को तो मुद्दा बना लेते है। कौन किसको साथ ऐश कर रहा है......अरे सालो तुम अपनी के साथ ऐश करो न........बूता है तो......."
बीरबल पंचम अवाक खड़े बादशाह का यह प्रलाप सुने जा रहे थे और बीच-बीच में "लाहौल बिला कुब्बत", मंत्र का जाप किए जा रहे थे।
बादशाह अपनी रौ में कहे जा रहे थे "....सालों नें पिछिले महीने हमारे नोटों की माला पहनने पर कितना हंगामा किया...............अरे हम सल्तनत के बादशाह हैं कोई राह चलते छुटभइए नहीं। अगर हमने एक दो बार कुछ करोड़ के नोटों की माला पहन भी ली तो इनके पेट में दर्द क्यों है........ इन से मांग कर तो लाए नहीं। हमारी जनता का माल है और जनता के बादशाह होने के नाते हमें यह हक है कि हम इसका जैसे चाहें इस्तेमाल करें, जनता का माल हमारा माल फिर हम उसकी माला पहनें, पार्क बनवाएं या अपनी और अपनों की मूर्तियां लगवाएं।"

 

बीरबल को लगा कि बादशाह का यह गुबार तो जल्दी थमने वाला नहीं है अत: वे निहायत चापलूसाना अंदाज में बादशाह से मुखातिब हुए "जान की अमान पाऊं तो एक मशवरा है।"
"क्या कहानी के बारे में......बोलो बीरबल ....फौरन से पेश्तर (पहले) बोलो"
"ऐसा करते हैं जिससे कहानी लिखवाते हैं उसे अगले दिन जन्नत रसीद करा देंगे.....सफाई से...........कोई एक्सीडेंट बगैरह दिखा के.....फिर बकते रहें सब........सबूत कहां से लाएंगें......वक्त के साथ सब ठंडा पड़ जाएगा।"
"बीरबल", बादशाह तेज आवाज में बोले, फिर स्वर नीचा करते हुए बोले, "माना कि सियासत में यह सब जायज़ है सौ क्या उसके आगे के भी खून माफ हैं राजनीति में, मगर कहानी लेखक बनने के लिए यह सब? नहीं बीरबल मेरे जमीर को यह गवारा नहीं।
बीरबल पंचम मन ही मन भुनभुनाए, "जमीर, एक और शिगूफा, इस बेवकूफ के अंदर कोई जमीर (अन्तर्रात्मा) भी है......राजनीति में किसी के पास कोई जमीर या ईमान होता है.........जमीर की सुनी तो हो गई सियासत.........पता नहीं आज कौन सा जिन्न सवार हो गया है इस पर, पहले कहानी फिर जमीर और ईमान।

पर प्रकट में बीरबल ने हथियार डाल दिए, जैसी हुजूर की मंशा। एक हफ्ते की मोहलत अता फरमाएं तो कोई इंतजाम करते हैं।

 

कहानी का इंतजाम


बादशाह की बातों से परेशान बीरबल पंचम ने घर आते ही शैम्पेन के दो पैग गटके फिर उनके दिमाग की बत्ती जली। अगले दिन ही बर्तानवी सल्तनत के एक पुराने और मशहूर लेखक की एक पुरानी पर नायाब कहानी का आइडिया जस का तस मार लिया गया फिर सल्तन के नामचीन अदीबों को इस के मद्देनज़र अखबारों और इंटरनेट पर जो कुछ भी शाया हुआ था उसकी कतरनें इकठ्ठी करके उसकी "समरी" बनाने को काम सौंपा गया (बीरबल की पांचवी पीढ़ी में इतनी सलाहियत ही कहां बची थी जो वे खुद ऐसा काम कर पाते)। इसके बाद  बीरबल कहानी का आइडिया और कुछ कागजों पर लिखी "सिनोप्सिस" लेकर बादशाह सलामत के हुजूर में एक हफ्ते की छुट्टी और हरामखोरी के बाद पेश हुए।

 

ब्यौरा सुन कर बादशाह कागजों का पढ़ने को उतावले हो उठे। दरबारियों को उन्होने कहा, "तखलिया" और बरीबल को लेकर अपने कमेटी रुम में तशरीफफरमा हुये।

बादशाह ने कागजों पर एक सरसरी नज़र डाली फिर अपने दिमाग पर कुछ जोर देते हुए बोले, "अपनी स्कूली तर्बियत के जमाने में, हमें लगता है, हमने ऐसा कुछ कहीं पढ़ा है।"
बीरबल को चापलूसी करने की मानमांगी मुराद मिली, बोले, बज़ा फरमाया हुजूर, यह आइडिया उस (वर्तानवी अफसाना निगार का नाम लेकर) की बहुत मशहूर कहानी से उड़ाया है, बस इस में कुछ हल्का सा फेर-बदल कर के इस सिनोप्सिस के सहारे लिख मारिए, और कुछ न हो सके तो इसके पात्रों के नाम ही बदल दीजिए..........बाकी का जिम्मा हमारा"


"लाहौल बिला, बीरबल" हम एक पेंच निकालते है तो तुम दूसरा लगा देते हो। राजनीति में तो हम से "पेंच फ्री" राजनीति करवाते आए हो आज तक। लोगों को पता नही लगा जाएगा कि कहां से हमने "इस्टोरी" मारी है। तुम हमारी किरकिरी कटाने का पूरा संरजाम करके लाए हो?"

बीरबल पंचम को इस हमले से संभलने में थोड़ा वक्त लगा फिर दो लम्हों की डुबकी लगा कर दूर की कौड़ी खोज लाए।
"खातिर जमा रखें हुजूर, हिंदी कहानी में ऐसा कुछ नहीं होने वाला। हिंदी फिल्मों से लेकर हिंदी कहानीतक किसी को इस बात से परहेज नहीं है कि आपने आइडिया या पूरी की पूरी  कहानी कहां से मारी है?"
"क्या कहते हो बीरबल पंचम", बादशाह भौचक्के थे।
हुजूर का इकबाल बुंलद हो, हिन्दी कहानी में तो और भी सुभीता है....."


"वह कैसे"?
"अरे हिंदी कहानी लेखकों को आपसी थुक्का-फजीहत से फुर्सत ही कहॉ है जो इस पर उनका ध्यान जाए? वह तो एक दूसरे की पीठ खुजाने में मस्त हैं।
"कमाल है!"
"वही तो कहता हूं, हुजूर, आप तो नाहक परेशान हैं। आप तो इस सल्तनत के बादशाह हैं, आपकी शान में गुस्ताखी करने की जुर्रत भला कौन करेगा?"
"सच पंचम!"
"हां हुजूर, इसके उल्टे यह भी हो सकता है कि इस सल्तनत के अदीब आपकी "कहानीवाचस्पति" के ताज से ताज पोशी करें........आप एक बार लिख कहानी डालिए हुजूर फिर इसका जुगाड़ तो हम चुटकियों में करवा देते हैं, किसी भकुये को अपने यहां की "कहानी एकेडेमी" का अध्यक्ष बनाने का टुकड़ा भर फेंकने की देर है।"

बादशाह दूने उत्साह से भर गए, कहानी लिखने का उनका इरादा और पक्का हो गया।

 

बादशाही " कहानी "


एक हफ्ता और बीता और बादशाह सलामत ने एक कहानी लिख ही मारी। हालांकि सचमुच की कहानी से वह बिलकुल मेल नहीं खाती थी मगर उसे सल्तनत के बादशाह ने कहानी मान कर लिखा था तो उसे कहानी ही होना था । पता ही नहीं लग पा रहा था कि यह शुरू किधर से होती है और जहॉ खत्म बताई जाती हे वहॉ खत्म कैसे हो गई क्योंकि वहॉ तक तो बमुश्किल-तमाम कथा शुरु ही हो पाई थी..........निराकार ब्रह्म की तरह, न आदि न अंत। बादशाह सलामत अपनी इस सफलता (कारगुजारी) पर बेहद खुश थे........इतने खुश कि कहानी(?) खत्म होते ही उन्होंने तुरन्त बीरबल के यहां हरकारा दौड़ा दिया, बिना इस बात का इल्म लिए कि इस समय रात का एक बजा है।

 

मरता क्या न करता? सिर पर अचानक टूट पड़ने वाली किसी मुसीबत अंदेशे से या कि दिसम्बर की हवा की सरदी से कंपकंपाते बीरबल पंचम बादशाह की ऐशगाह में नमूदार हुये। रात का एक बजा होने के वावजूद बादशाह सलामत पूरी तरह चौकन्ने भी थे और अच्छे मूड में भी थे।
बीरबल ने घुसते ही कुछ रटा-रटाया "चापलूसी वाचन" करना चाहा पर बादशाह ने बात बीच में ही लपक ली, बोले, "भाई बीरबल देखो तो क्या नायाब शाहकार...वह क्या कहते है कहानी लिख मारी है मैने........लो.......लो जरा पढ़ो तो"
"अरे यही तो हुजूर की फितरत है कि जिस जगह हाथ लगा दें कमाल हो जाना लाजिमी है।"

 

बादशाह खुश हुए। उन्होंने अपनी लिखी कहानी(?) बीरबल की ओर बढ़ाई", "पढ़ो पंचम, फिर बताओ कैसी है?"

बीरबल पंचम पशोपेश में थे। वजीरे आला तो हैं पर पढ़ाई? राजनीति में पढाई लिखाई की जरुरत ही कहॉ थी? बस कुल मिलाकर जैसे-तैसे किताब पढ पाते हैं। स्कूल के वक्त पढ़ाई तो वे जैसे तैसे कक्षा छह तक धकेल पाए थे फिर उन्हे आगे लगा कि यह उनके बस की नहीं। इसी दौरान अच्छी-खासी गुंडई भी करने लगे थे सो राजनीति में उनका भविष्य उज्जवल था। एक बार वे राजनीति में कूदे तो पीछे मुड़ कर नहीं देखा। पढ़ तो नहीं पाए पर राजनीति में गुने खूब। उनकी सियासी चालों पर बडे-बड़े धूल चाटने लगे। वैसे ही आज वह बादशाह के दरबार के इहलौते रत्न (नवरत्न तो अब पांचवी पीढ़ी की बादशाह अफोर्ड ही नहीं कर सकता था) नहीं थे।

 

बीरबाल बादशाह का लिखा पढ़ने का नायाब ड्रामा करने लगे। बीच-बीच में बादशाह की ओर देखते और कभी कहते "क्या खूब", कभी कहते "माशा अल्लाह" गरचे वह एक मंझे हुए अदीब हों और कहानी की नस-नस से वाकिफ हों।

बीरबल पंचम पढ़ने में कुछ ज्यादा ही वक्त ले गए, इतना कि बादशाह सलामत उकताने लगे और जब सब्र न हुआ तो आखीर में खुद ही पूछ बैठे कि कैसी है ?
बीरबाल ने पढ़ने का नाटक बंद कर आंखे बंद कीं दोनों हाथ ऊपर उठाए, "क्या खूब लिखा है जहांपनाह...............आपका यह हुनर भी माशा अल्लाह, आप तो धरती को बख्शी गई खुदा की नेमत हैं नेमत.........कलम तोड़ दी है हुजूर कलम.......जी करता है लिखने वाले के हाथ चूम लूं।"
बादशाह सलामत ने हड़बड़ा कर अपने हाथ पीछे खींचे और घबरा कर बोले, "कलम कहॉ टूटी है पंचम, कलम तो साबुत है, यह देखो..........."
"नहीं हुजूर यह मुहावरा है। जब कोई नायाब शाहकार लिखता है तो यह कहने का रिवाज़ है कि कलम तोड़ दी"
"ओहो", बादशाह सलामत फूल कर कुप्पा हो गए।
"बीरबल पंचम अब आपकी यह जिम्मेदारी है कि हमारी यह कहानी किसी नामचीन रिसाले में शाया हो, जरुरत पड़े तो इसके एवज में उस रिसाले को इफरात में सरकारी इश्तहार दे दिएये जा एं ।"
"हुजूर की ज़र्रानवाज़ी है जो बंदे को इस काबिल समझा। आप मान लीजिए कि काम हो गया। अदब के फील्ड में भी मशहूर होने को तैयार हो जाइए हुजूर।"

 

बादशाही कहानी की रॉयल्टी


बीरबल तो बालू में से भी तेल निकालने के उस्ताद थे सो अगले दिन ही रिसालों में इश्तहार दे दिये गए कि बादशाह सलामत ने एक नायाब कहानी लिखी है। यह दुनिया की "किसी बादशाह द्वारा लिखी पहली कहानी है। इसे प्रकाशित करने के मुंतज़िर प्रकाशक अपने बायोडेटा व रायल्टी की रक़म के साथ शाही दफ्तर में तशरीफ लाएं।

जैसा कि बीरबल को उम्मीद थी, लोगों में बादशाह की कहानी छापने की होड़ लग गई। हर कोई जानता था कि खुद बादशाह सलामत से नजदीकी का मतलब क्या होता है....... रिसाले को सरकारी इश्तहारों से भर दिया जायेगा और कहीं बादशाह की नज़रे करम हो गई तो दरबार मे सीट मिलना भी कोई अजूबा नहीं। कई औद्योगिक घरानों ने तो आनन-फानन में अपने नए प्रकाशन ही शुरू कर दिए।

 

काफी जिद्दोजहद के बाद बीरबल ने सल्तनत के सबसे बड़े औद्योगिक घराने के ताज़ातरीन शुरू हुए रिसाले पर करम कर दिया। पिछले "पांच साला स्वांग" में इस घराने नें बीरबल को चुनाव फण्ड में इतने पैसे दिए थे कि अंधाधुध खर्च करने के बाद भी एक अच्छी-ख़ासी रक़म बच गई थी। आखिर सौदागर राजनीति में पैसा लगाते काहे को हैं......वक्त पर सहूलियतें पाने के लिये ही तो।

बादशाही कहानी की तारीफें रिसालों में छपने लगीं थी। अखबारनवीसों, नामानिगारों के पास तो मानो इसके अलावा और कोई चर्चा ही न थी। वे बड़े-बड़े रिव्यू लिखते और बादशाह की तारीफों के पुल बांध देते । ऐसे लेखक रिव्यू के नीचे बाकायदा अपना नाम पता और फोन नंबर भी लिखते, पता नहीं कब बादशाह सलामत की नज़र में चढ़ जाएं ओर जिंदगी में चिरागां हो जाए। कुछ लोगों ने बाकायदा बड़ी-बड़ी होर्डिंग्स बनवाईं जिसमें बादशाह को कहानी को धन्य करने पर मुबारकबाद दी गई होती थी ओर नीचे निवेदकों के फोटो, जिनके चन्दे से यह होर्डिग खडी गई होती थी। अकसर यह स्थानीय गुंडे होते या राजनैतिक छुटभइए जो हमेशा कहीं "लटक लेने" की फिराक में रहते। हालांकि यह सारे लोग जब अपने कुछ खासमखास दोस्तों के साथ होते तो दो पैग गटकते ही सच बोलने लगते, "देखा साली मेढ़की को भी जुकाम हो गया.....? काला अक्षर भैंस बराबर..........लिखने चले हैं कहानी । कहानी लिखना न हुआ हगना-मूतना हो गया कि जहां चाहा कर मारा..... पढ़ो तो सर में दर्द हो जाता है। मगर करें क्या? वृन्दावन मे रहना है तो राधे-राधे कहना है।"

 

ये सारे लोग रात को नशे में यह कह तो जाते पर सवेरे नशा उतरते ही एक दूसरे के घर भागते और एक दूसरे से कसम लेते देते कि रात को नशे की झोंक में न हमने कुछ कहा है, न तुमने ही कुछ सुना है.....इसकी किसी को कानों कान खबर न हो।

बड़े-बड़े सभागार किराए पर लिए जाते, इसरार कर के उनमें "सरकारी अदीबों" को न्योते दिए जाते। फिर वहां उनसे बादशाही कहानी की प्रंशसा की उल्टियां कराईं जातीं। सबको इसके एवज में मोटे-मोटे लिफाफे की शक्ल में पत्रम्-पुष्पम् देकर रुखसत किया जाता। बीरबल और उनकी मंडली आज कल बहुत बिजी चल रही थी क्योंकि कहानीपर बादशाह द्वारा किए गए इस उपकार के लिए वे बादशाह सलामत का एक भव्य सम्मान समारोह करने वाले थे।


 
और फिर वह समीक्षा:


बादशाह सलामत सुरूर में थे, कुछ तारीफों के, कुछ शैम्पेन के। आस-पास बैठे थे कई चापलूस जो बादशाह की शान में कसीदे पढ़े जा रहे थे। एक नशा दूसरे को गहरा कर रहा था। जाहिर है यह सारी महिफिल बीरबल पंचम ने ही जुटाई थी। तभी द्वारपाल ने आकर किसी के बाहर जाने की सूचना दी जिसे अंदर ही बुला लिया गया।
आने वाला परिचित ही था, बीरबल पंचम की मंडली का ही एक गुर्गा । आते ही उसने एक तुड़ा-मुड़ा अखबार बीरबल की ओर बढ़ाया।
"क्या है," बीरबल ने पूछा।
"खुद ही देख लीजिए," बादशाह की कहानी की समीक्षा छपी है।"
"समीक्षा" बादशाह ने झपटकर अखबार ले लिया और आंखे मिचमिचा का पढ़ने लगे। बादशाह सलामत जैसे-जैसे आगे पढते जाते, उनके चेहरे एक रंग सुर्ख होता जाता था। बीरबल पंचम के भी कान खड़े हुए। आखिर माजरा क्या है?

 

बादशाह सलामत तब तक सारा मजमून पढ़ चुके थे, उनका गुस्सा सातवें आसमान पर था।
"नामाकूल" बादशाह सलामत चिल्लाए।
"क्या हुआ हुजूर", बीरबल पंचम इस तरह घिघियाए गरचे नामाकूलपन का काम उन्हीं ने अंजाम दिया हो।
"ये देखो", बादशाह सलामत ने अखबार बीरबल की ओर फेंका, "साले इस टटपूंजिए लेखक की हिम्मत तो देखो................,अरे जब कोई अच्छा काम किया जाता है तो उसकी तारीफ की जाती है.........आखिर कहानी में हमारे अलावा लोग ही कितने हैं जो अच्छा काम कर रहे हैं.............इस नामाकूल को कहानी की समझ ही कितनी है..........किसी की चार कहानियां छप जाने से क्या उस में कहानी की समझ पैदा हो जाती है....", बादशाह के मुंह से गालियों का सैलाब उमड़ा।
बीरबल हड़बड़ाहट में अखबार खोलकर जल्दी-जल्दी पढ़ने लगे। पहले पेज पर ही तो छपा था। यह तो उसी खुराफाती लेखक का अखबार था जो अपने आपको सल्तनत का "वाहिद (अकेला) ईमानदार अदीब" कह कर तार्रूफ कराता था.......दो टूक बात ही करता था, चाहे भली लगे या बुरी। हां अदीबों में उसका रुतबा था इसीलिए बीरबल ने भी उसे एक बार तो भाव भी दिए थे पर उसकी "ईमानदाराना हरकतों" से तंग आकर बीरबल ने अपने रसूख का इस्तेमाल करके बहुत से प्रकाशनों में उसकी रचनाओं के प्रकाशन पर आघोषित बैन लगवा दिया था। मगर वह काड़ियल आदमी था। उसने अपना सब कुछ दॉव पर लगाकर एक प्रेस खोल लिया था, उसी से वह चार पेज का यह अखबार छापता था जिसे खरीदकर पढ़ने वाले शायद ही दस पांच लोग थे।

 

"आखिर सच्चाई सारी कोशिशों बावजूद सामने आ ही गई", बीरबल मन ही मन सोच रहे थे।

"इस मच्छर जैसे अदना लेखक को मैनेज नहीं कर सके तुम सब", बादशाह दहाड़े, पूरी सल्तनत क्या मैनेज करेंगे आप? मैने पिछली बार ही कहा था कि ठिकाने लगवा दो साले को पर आपको न तो न जाने कितने डर थे? बीरबल की सबके सामने नीची हो रही भी सो बादशाह के सुर में सुर मिलाते हुए बोले "अभी नामाकूल का हिसाब करता हूं..........आप खातिर जमा रखिए" और महफिल बर्खास्त हो गई।

इस वाकए क्या अंत हुआ होगा क्या अब भी यह बताने की जरूरत है? इसके बाद उस अड़ियल ईमानदार अदीब की प्रेस में कई बार अश्लील साहित्य बरामद हुआ जिसके चलते उसे कई बार जेल की हवा खानी पड़ी। बेमौसम ही उसकी प्रेस में आग लग गई, जिसमें उसका सब-कुछ जल कर खाक हो गया। उसे देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त पाया जाने लगा और अन्तत: एक दिन राजधानी के अखबारों में चौथे पेज पर चौथाई कालम की एक खबर छपी "प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन................का प्रेस सचिव गिरफ्तारी से बच कर भागने की कोशिश में राजधानी की पुलिस की गोलियों का शिकार"

 

नीचे जिस कड़ियल आदमी की तस्वीर छपी थी, उसे सल्लतन के अदीबों ने पहचानकर भी नहीं पहचाना कि यह उसी अड़ियल अदीब की तस्वीर है जिसने बादशाही कहानी की "वह बकवास समीक्षा" छापी थी। जो हश्र उसका हुआ, खुदा करे किसी का न हो।

हां उसके बाद अपनी पहली कहानी की तारीफों से उत्साहित हो बादशाह ने और भी कई कहानियां लिखीं (छपवाई) वे सब अब पुस्तकाकार में आने वाली हैं। बीरबल पंचम बादशाह को सल्तनत का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान "कहानी भूषण" दिए जाने के लिए आयोजित होने वाले भव्य समारोह की तैयारी में बहुत व्यस्त हैं।


- डॉ. अरविंद दुबे

रचनाकार परिचय
डॉ. अरविंद दुबे

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व्यंग्य (1)