अगस्त 2017
अंक - 29 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव

ग़ज़ल-

नज़र ख़ुद से मिलाने में पसीने छूट जाते हैं
ख़ुदी को आज़माने में पसीने छूट जाते हैं

हमारी मुस्कराहट से सभी को रश्क होता है
मगर यूँ मुस्कुराने में पसीने छूट जाते हैं

मुहब्बत आपने कर ली ये अच्छी बात है लेकिन
मुहब्बत को निभाने में पसीने छूट जाते हैं

हुनर को बेच लेने का हुनर आता नहीं सबको
मुनासिब दाम पाने में पसीने छूट जाते हैं

फ़सल नफ़रत की पैदा कर रहे हैं अब सियासतदां
अमन के गुल उगाने में पसीने छूट जाते हैं

पुरानी बात है जब आँच सच से दूर रहती थी
अभी सच को बचाने में पसीने छूट जाते हैं

ये जो उम्मीद की लौ है इसे बुझने न दें यारो
अँधेरे को मिटाने में पसीने छूट जाते हैं


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ग़ज़ल-

बताऊँ कैसे तुम्हें क्या है अपना हाल मियाँ
यहाँ तो जिंदगी ही बन गयी सवाल मियाँ

बड़ा है शोर तरक्की का हर तरफ लेकिन
हमें नसीब नहीं अब भी रोटी-दाल मियाँ

हमारे दौर का एहसास मर गया शायद
किसी भी अश्क को मिलता नहीं रुमाल मियाँ

भरोसा करके जिन्हें रहनुमा चुना हमनें
हमारे हक़ का वही काट रहे माल मियाँ

समझ गयी है तुम्हारा फ़रेब हर मछली
चलो समेट लो अब तुम भी अपना जाल मियाँ

हैं कौन लोग लुटेरे हमारी खुशियों के
हमारे मन में भी अब उठते हैं सवाल मियाँ


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ग़ज़ल-

मखमली अहसास बस जीवित रहे
प्यार का विश्वास बस जीवित रहे

चाँद-तारे सब मिलेंगे आपको
शर्त है आकाश बस जीवित रहे

जीतना या हारना मुद्दा नहीं
खेल का अभ्यास बस जीवित रहे

मारे जायेंगे असुर सारे मगर
राम का वनवास बस जीवित रहे

यक्ष प्रश्नों तक पहुँचने के लिए
है ज़रुरी प्यास बस जीवित रहे

ख़ुद-ब-ख़ुद पतझर सुखद हो जाएगा
दृष्टि में मधुमास बस जीवित रहे

'शम्स' को मरने का डर बिल्कुल नहीं
अन्त तक उल्लास बस जीवित रहे


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ग़ज़ल-

ख़्वाहिश-ए-दिल हज़ार बार मरे
पर न इक बार भी किरदार मरे

प्यार गुलशन करे है दोनो से
न तो गुल और न ही ख़ार मरे

चल पड़े तो किसी की जान मरे
न चले तो छुरी की धार मरे

ताप तन का उतर भी जाये मगर
कैसे मन पर चढ़ा बुखार मरे

ज़िन्दगी तू है अब तलक ज़िन्दा
मौत के दाँव बेशुमार मरे


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ग़ज़ल-

एक लम्हा गुजार कर आये
या कि सदियों को पार कर आये

जीत के सब थे दावेदार मगर
एक हम थे कि हारकर आये

आईने सब खिलाफ़ थे लेकिन
पत्थरों से क़रार कर आये

ज़िन्दगी एक तुझसे निभ जाये
ख़ुद से धोखे हज़ार कर आये

आज़ ही हम बज़ार में पहुंचे
आज ही हम उधार कर आये

अपने दामन को ख़ुद रफ़ू करके
ख़ुद ही फिर तार-तार कर आये

तेरी महफ़िल में 'शम्स' आये जो
ग़म की चादर उतार कर आये


- डॉ. दिनेश त्रिपाठी शम्स

रचनाकार परिचय
डॉ. दिनेश त्रिपाठी शम्स

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ग़ज़ल-गाँव (1)