Hastaksher

मार्च 2020
अंक - 58 | कुल अंक - 58
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्याँकन

तथाकथित बाबाओं की कारगुजारियों का भंडाफोड़: महामृत्यु का ब्लैक होल

 



'महामृत्यु का ब्लैक होल' मतलब एक ऐसा अंधा कुँआ, जिसमें जो एक बार गिर गया या चला गया फिर उसका वापस आना नामुमकिन है। आज की भागमभाग ज़िन्दगी में ‌लोगों का सुख-चैन सब छिन चुका है। लोग हर समय तनाव में रहते हैं और ऐसे में लोग दो पल की शांति की तलाश में इधर-उधर भटकते फिरते हैं। कभी किसी बाबा की शरण में तो कभी किसी और की। वे यह नहीं जानते कि जिस शांति को पाने के लिए वे मारे-मारे फिर रहे हैं, वह किसी और से नहीं बल्कि अपनी अंतरात्मा में झाँकने से मिलेगी। स्वयं के द्वारा किए गये प्रयास योग-मेडीटेशन जैसे अभ्यासों तथा स्वयं को पहचानने से ही शांति का रास्ता बनता है। आज लोगों के पास स्वयं से मिलने का समय नहीं है लेकिन सोकॉल्ड गुरुओं की शरण में जाकर वे न सिर्फ अपना बहुमूल्य समय गँवा देते हैं बल्कि अपने विवेक और बुद्धि को भी खो बैठते हैं। ऐसे लोगों के दिलो-दिमाग़ पर यही बात छाई रहती है कि शांति गुरूजी (तथाकथित) की शरण में जाने से ही मिलेगी। उन्हें लगता है कि पता नहीं बाबाजी कौनसी जादू की पुड़िया उनके हाथ में दे देंगे, जिससे उनकी ज़िन्दगी में ख़ुशहाली छा जाएगी और उन्हें जीने का सबब मिल जाएगा। जबकि  ऐसे ही लोगों को अपने जाल का ग्रास बनाने का चलन कुछ एक तथाकथित मठाधीशों, संन्यासियों व बाबाओं द्वारा ख़ूब चलाया जा रहा है। इन बाबाओं का दावा होता है कि वे लोगों की ज़िन्दगी ख़ुशहाली से भर देंगे, बशर्ते कुछ दिन उन्हें देने होंगे।

'महामृत्यु का ब्लैक होल' के उपन्यासकार डॉ. अजय शर्मा ने अपने इस उपन्यास में तथाकथित बाबाओं के तथाकथित आश्रमों की पोल खोलकर ब्लैक होल में छेद करने का हरसंभव प्रयास किया है। लेखक में अपनी जिज्ञासा को शांत करने का अनूठा जज़्बा दिखाई दिया है। सबकुछ जानते हुए भी लेखक ब्लैक होल में घुसकर यह अनुभव करना चाहता है कि स्वामी जी बने इन मठाधीशों के यहाँ जो खेल खेला जाता है वह कैसे अंत तक पहँचते-पहुँचते अपना रंग-रूप बदलता है। कैसे लोग अंधविश्वासी होकर एक स्वामी के पीछे लग जाते हैं और उसे अपना भगवान समझ लेते हैं और वे अपना होशो-हवास व विवेक तक खो बैठते हैं। जहाँ धर्म, आस्था और भक्ति की आड़ में लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। लोगों के जीवन को ख़ुशहाल बनाने के नाम पर तरह-तरह के प्रलोभन देकर व अपने सम्मोहन जाल में फांसकर उन्हें लूटा जा रहा है।

इस उपन्यास का मुख्य पात्र डॉ. आकाश काफी निर्भीक, बेबाक और बोल्ड है। उस पर गुरुजी या उनके चेले अपना कोई रंग चढ़ाने में क़ामयाब नहीं हो सके हैं। कहानी की शुरुआत टीचर ट्रेनिंग से होती है, जिसमें डॉ. आकाश का भी चयन कर लिया जाता है। आकाश 'जीवन को कैसे ख़ुशहाल किया जाता है' इस बेसिक कोर्स को पहले ही कर चुके हैं। हालांकि उनका संन्यासी-बाबाओं से दूर-दूर तक का नाता नहीं था। वह तो संन्यासी बाबाओं के आश्रमों में क्या क्रियाकलाप होते हैं? लोगों की भावनाओं के साथ कैसे खेला जाता है? इसका कच्चा चिट्ठा सबके सामने लाने पर आमादा है। आख़िरकार आकाश जिस अवसर की तलाश में थे वो उन्हें मिल जाता है और टीचर बनने की सभी औपचारिकताएँ पूरी कर मुंबई आश्रम जाने का मौक़ा मिल जाता है। आकाश आश्रम की गतिविधियों में शामिल होकर धीरे-धीरे टुकड़ों में अपने अनुभव को इकट्ठा करने में जुट जाते हैं, साथ ही जासूस की तरह आश्रम की कुछ कमज़ोर कड़ियों की तलाश में भी। उन्हें कुछ कड़ियाँ हाथ भी लगने लगीं, जिनमें स्वामी लोकेशानंद एक है।

आकाश आश्रम में ट्रेनिंग लेने वाले सभी अन्य लोगों से एकदम अलग है। क्लास लेने वाले कोई भी गुरूजी हो, स्वामी जी हो या संन्यासी, वह क्लास में ‌आँखें मूँदकर व मुँह पर ताला लगाए नहीं बैठते थे, वह बराबर हर विषय पर सवाल-जवाब करते जो स्वामीजी पर भारी पड़े रहते हैं। फलस्वरूप आकाश को क्लास से बाहर कर दिया जाता है। एक दिन स्वामी लोकेशानंद की क्लास में भी आकाश का यही रवैया रहता है। आकाश के रूप में लोकेशानन्द को अपने दिन याद आ जाते हैं कि कैसे उन्होंने अपना घर बार छोड़कर आश्रम में पनाह ले ली थी। अब उन्हें आकाश को देखकर उम्मीद की किरण दिखाई देती है और वह आश्रम में होने वाली गतिविधियों की जानकारी आकाश को देते हैं।

लेखक ने आकाश और लोकेशानन्द के बीच हुई बातचीत के दौरान आश्रम में रहने वाले लोगों के साथ होने वाले शोषण का खुलासा किया है कि जो लोग शिक्षा-दीक्षा लेकर अपने शहर लौट जाते हैं, वे तो फिर भी बच जाते हैं लेकिन जो आश्रम में रह जाते हैं, वे यहीं के होकर रह जाते हैं। एक बार जो यहाँ रह गया फिर वो यहाँ से निकल नहीं सकता। ब्लैक होल में गिरने वाले लोकेशानन्द जैसे और भी कुछ संन्यासी हैं, जो आश्रम की व्यवस्था से असंतुष्ट हैं। लेखक की पैनी नज़र आकाश ने जान लिया कि इन तथाकथित बाबाओं के आश्रम में टीचर ट्रेनिंग के नाम पर ऐसे सेल्समैन तैयार किए जाते हैं, जो प्रोडक्ट रूपी बाबाओं का बख़ूबी गुणगान कर ज़्यादा से ज़्यादा लोगों के जीवन को ख़ुशहाल करने वाले कोर्स बेच सके और उनसे मोटी फीस वसूल सकें। इसके लिए उन्हें एक अच्छा स्पीकर, अच्छा वक्ता बनने और अपना आई कांटेक्ट कैसे बनाए रखना है, के गुर भी सिखाए जाते हैं। बातचीत में ‌लोकेशानन्द व रूसी बाबा द्वारा आश्रम के क्रियाकलापों का जो ज़िक्र किया गया है, वो हैरतअंगेज़ करने वाला है।

उपन्यास की कहानी तीन खंडों में है। पहले दो खंडों में लेखक की नज़रें आश्रम की जाँच-पड़ताल, सभी क्रियाकलापों तथा बाबाओं-संन्यासियों के बारे में जानती नज़र आई हैं। अब ज़रूरत थी तो आश्रम का भंडाफोड़ कर सभी लोगों के समक्ष लाने की और लोगों को यह बात समझाने की कि इन बाबाओं के चक्कर में पड़कर इंसान अपने घर-परिवार से तो दूर होता ही है साथ ही विवेकहीन भी हो जाता है। जब तक उसे इस बात की समझ आती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। तीसरा खंड सबसे मुख्य रहा है। इस खंड में लेखक को अपने मंसूबे में सफ़लता मिली है और मीडिया व तमाम नामी-गिरामी लोगों के सामने आश्रम की काली करतूतों को लाया गया है। यहाँ सबसे बड़ी बात शिक्षा-दीक्षा के नाम पर इन बाबाओं-स्वामी जी द्वारा जो घिनौना कुकृत्य सामने आया है, उसकी जितनी निंदा की जाए कम है। लेखक ने खुलासा करते हुए कहा है कि ट्रेनिंग के बाद दीक्षा का दौर आया, सभी लोग दीक्षा के लिए लाइन से बैठ गये। जब आकाश की बारी आई तो पहले उसे गुरूजी के चरण धोने के लिए कहा गया फिर वह एक आज्ञाकारी बच्चे की तरह गुरूजी के‌ पास बैठ गया। तब गुरूजी ने उसके गले में माला पहनाते हुए कहा कि आज के बाद तुम्हारा राम भी मैं, रहीम भी मैं, विष्णु भी मैं, कृष्ण भी मैं, नर भी मैं और नारायण भी मैं। फिर आकाश को मुँह खोलने के लिए कहा, जैसे ही उसने मुँह खोला कि गुरूजी ने उसके मुँह में थूक दिया और आदेश दिया पैर धोकर जमा किया पानी पी जाओ। इसके साथ अब मैं तुम्हारे रोम-रोम में बस गया हूँ। मैं ही तुम्हें स्वर्ग-नरक के बंधन से मुक्त करूँगा। मैं तुम्हें महामृत्यु दूँगा। जितने लोग इस आश्रम से जोड़ोगे, मैं उतना ही अधिक फल तुम्हें दूँगा। लेखक ने आकाश की दीक्षा के माध्यम से लोगों को एक ऐसेे सच का आईना दिखाया है, जिससे लोग अनभिज्ञ होते हैं। जब तक वह इस सच सेे रूबरू होतेे हैैैं तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

अंत में लेखक ब्लैक होल में रिसाव करने में सफल होता है। आश्रम का कच्चा चिट्ठा सबके सामने आने पर गुरूजी के पास आत्महत्या के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचता। जो व्यक्ति लोगों को महामृत्यु का पाठ पढ़ाता था, वही अपने बनाए महामृत्यु के जाल में घिर जाता है।
उल्लेखनीय है कि आज ऐसे तथाकथित बाबाओं और उनके आश्रमों का जाल दिन-प्रतिदिन फैलता जा रहा है। इस कड़ी में कुछ समय पहले लोगों के खैरख्वाह बने आशाराम बापू, राम रहीम आदि के चेहरों को बेनक़ाब किया जा चुका है। ऐसे समय लेखक द्वारा उठाया गया उपन्यास का विषय समय की माँग है। उपन्यास में शुरू से लेकर अंत तक कहीं नीरसता नहीं आई है। लेखक ने हर पल को जीवंत बनाकर उदाहरण पेश किया है। उपन्यास में सरल व आमजन की भाषा का प्रयोग किया गया है। डॉ. अजय शर्मा का यह उपन्यास लोगों को ब्लैक होल में गिरने से बचाने में क़ामयाब रहेगा।


- डॉ. शशि सिंघल

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इस अंक में ......

आवरण: डॉ. कामरान ख़ान

हस्ताक्षर
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