Hastaksher

जून-जुलाई 2020 (संयुक्तांक)
अंक - 61 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्याँकन

सामाजिक पहलुओं पर बात करता लघुकथा संग्रह: स्वरा
- सोनिया वर्मा




गीत, ग़ज़ल, दोहा, कविता, कहानी, लघुकथा या साहित्य की अन्य कोई भी विधा हो मन में किसी क्षण उपजे भावों की ही देन है। हर विधा को लिखने का कोई नियम या पैमाना होता है पर लघुकथा क्षण विशेष में उपजे भाव, घटना या विचार के कथ्य-बीज की संक्षिप्त फ़लक पर शब्दों की कूँची और शिल्प से तराशी गयी प्रभावी अभिव्यक्ति है। संक्षेप में कहें तो किसी क्षण में छिपे जीवन के विराट प्रभाव की अभिव्यक्ति ही लघुकथा है। कथ्य, पात्र, चरित्र-चित्रण, संवाद, उद्देश्य ये सब लघुकथा के ही मूल तत्व हैं।
लघुकथा, कहानी नहीं है परन्तु इसका संबंध कहानी से उतना ही है, जितना एकांकी का नाटक से है; लघुकथा कविता नहीं है परन्तु कविता की तीव्र संवेदना इसमें निहित है।


मन में कुलबुलाते विचारों का संग्रह है 'स्वरा'। लघुकथा संग्रह  'स्वरा' आदरणीय ओम नीरव जी की कृति है। नीरव जी अपने भावों, विचारों को लघुकथा के रूप में बहुत सहजता से व्यक्त करने में समर्थ हैं। लघुकथा संग्रह 'स्वरा' में 38 लघुकथाएँ हैं। पहली लघुकथा 'भीड़' में सामाजिक सेवा के लिए विख्यात सनकी  स्वामी सदानंद के मनोभाव को दर्शाती है। स्वामी सदानंद के भीड़ से भय को विधायक महोदय समझने में असमर्थ थे फिर भी उनका सम्मान करने आश्रम आये। स्वामी सदानंद के भीड़ से भय का कारण पाठक को चौंकाता है।
स्वामी सदानंद- "मैं जब भी भीड़ को देखता हूँ, मेरे भीतर वही दृश्य उभर आता है। बहुत घृणा है मुझे भीड़ से।"
'भीड़' बच्चों के साथ हुए व्यवहार का उनकी मनःस्थिति पर पड़ने वाले प्रभाव को बखूबी व्यक्त करने में समर्थ है। 'भीड़' समाज को बालमन की कोमलता और आजीवन पड़ने वाले प्रभाव को बताने  में सक्षम है।


लघुकथा 'अधिकारी' वर्तमान हालात पर कही गयी लघुकथा है परन्तु इसका अंत चमत्कारिक है, जो मानव की चारित्रिक दृढ़ता दर्शाता है। लघुकथा के शुरूआत में नायिका अधिकारी से भयभीत है।
नायिका- "कहीं अधिकारी ने जान-बूझ कर ऐसी परिस्थिति तो नहीं उत्पन्न की है?" नायिका सावित्री का यह विचार नायिका के भय और मनःस्थिति को दर्शाता है और अधिकारी का नकारात्मक चरित्र दर्शाता है। लघुकथा का वाह कहलाने वाला मोड़ जब अधिकारी नायिका के भय को समझकर सावित्री को छुट्टी देकर घर भेज देता है, उच्च मानवीय मूल्य को दर्शाता है।
अधिकारी- "मुझे मीटिंग में जाना है, तुम भी अकेली ऑफिस में क्या करोगी? मेरी और से आज छुट्टी!" 'अधिकारी' लघुकथा समाज में व्याप्त बुराइयों के बीच बची अच्छाई को दर्शाता है। सभी इंसान दुराचारी नहीं हैं। बुराइयों के साथ अच्छाई भी श्वास ले रही है।


किसी कार्य में सफल होने के लिए जी तोड़ मेहनत करें और बाद में देखे की हमसे आगे बिना मेहनत किए कोई निकल रहा है तो सोचिये कितनी तकलीफ़ होगी। उसी तकलीफ़ को महसूस करवाती है लघुकथा 'आघात'।
निरीक्षण कर रहा व्यक्ति (अध्यापक)-  "क्या तुम कोई किताब-विताब नहीं लाये हो?"
यह सुन लघुकथा का नायक मातादीन वितृष्णा से पूरे परिवेश को देखता है। हर तरफ नकल होती देख; उनका दिल डूबता जा रहा था। अपनी पूरी मेहनत बेकार होते देख ऐसा आघात होता है कि चारपाई से कभी उठ नहीं पाता। 'वर्तमान' परीक्षा प्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लगाती बेहतरीन  लघुकथा है। ऐसी व्यवस्था परिक्षार्थी, समाज और देश को किस अंधे कुएँ मे ढकेल रही है, हम इसका अनुमान लगा सकते हैं।


बस में सवारी करते वक़्त आपने देखा होगा कि सामने की कुछ सीटों पर 'महिला आरक्षित' सीट लिखा होता है। महिलाओं को समानता का अधिकार देने के बाद यह आरक्षण क्यों? इसी भाव पर आधारित लघुकथा है 'आधुनिका'। लघुकथा की नायिका एक कम आयु की युवती, जिसका नाम आधुनिका है। 'आधुनिका' महिला आरक्षित सीट पर बैठने से यह कहकर मना कर देती है कि "अंकल, मैं अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हूँ, पुरुषों की बैसाखी पर नहीं।" यह कथन महिला के आत्मविश्वास को दिखाता है, जो वर्तमान समय में यदा-कदा ही दृष्टिगत है। लघुकथा का अंत थोड़ा लाउड अवश्य हो जाता है। यह विषय एक अछूता विषय है। नारी के आत्मविश्वास और दृढ़संकल्प को दर्शाती लघुकथा है 'क्रांति'। क्रांति द्वारा किया गया विरोध आवश्यक व सही है, जो समाज में व्याप्त कुप्रथाओं का विरोध करने का साहस देती है। दहेज के लोभी लोगों के गालों पर करारा तमाचा है। लघुकथा का उद्देश्य परम्परागत निरर्थक खोखले जीवन मूल्यों पर प्रहार कर नवीन सार्थक जीवन-मूल्यों के लिए भूमि तैयार करना तथा सामाजिक विसंगतियों/विकृतियों एवं व्यक्ति की बाह्र व आन्तरिक जटिलताओं की ओर संकेत करना है।
लघुकथा में लिखे से अधिक छुपे को समझना होता है ऐसी ही लघुकथा है "डर"। डर मानव के व्यवहार की ओर  इंगित करती है।आज मानव को मानव से अधिक खतरा है जानवरों की अपेक्षा।
विज्ञान नये-नये साधन दे रहा है वहीं इसका गलत उपयोग विनाश का कारण भी बन रहा है।वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित लघुकथा है "पछतावा" । वैज्ञानिक मानव का न्यूट्रॉन, प्रोटॉन व मेसॉन से बातचीत है ।यह एक संवादात्मक   लघुकथा है ।न्यूट्रॉन, प्रोटॉन व मेसॉन सूक्ष्म कण है जो नाभिक में रहते है।न्यूट्रॉनजैसे सूक्ष्म कणों की शक्ति का अंदाजा हिरोशिमा-नागासाकी की तबाही से लगा सकते है।मानव संसाधन का दुरुपयोग करते वक़्त यह भूल जाता है कि उसका दुष्परिणाम भी मानवजाति को ही भुगतना है।


प्रकृति परिवेश से जोड़ती लघुकथा है "अनुचर"।अनुचर में पेड़ का मानव से वार्तालाप है ।यह भी एक संवादात्मक लघुकथा है । पेड़ मानव को तुच्छ व स्वयं को श्रेष्ठ बताता है ।मानव को प्रकृति का विनायक कहता है ।इन दोनों लघुकथाओं के पात्र नीरव जी के खंड काव्य 'धुंध से मिलते -जुलते हैं ।दोनों ही समाज को संदेश देती लघुकथाएँ है।
अच्छे इंसान की संगति सफलता दिलाती है वहीं दुष्टों की संगति पतन का कारण बनती है।संरक्षक ही भक्षक हो जाए तो विनाश निश्चित है ।ऐसी ही लघुकथा है "हॉस्टल"। हॉस्टल  की मालकिन भाभी जी द्वारा बच्चों की गलत हरकतों में साथ देना ।पैसों के लालच में गलत हरकतों को  बढ़ावा देने पर आधारित है ।इस प्रकार की बुराइयाँ समाज को गर्त में ले जा रही है ।अच्छे बच्चों के भविष्य को बर्बाद  कर रही है ।लघुकथा का अंत मौन विरोधाभास से होता है ।
मंचो पर कविता पाठ के लिए कवियों का आकर्षण बहुत है या कवि सम्मेलनों में अपनी-अपनी रचना पढ़ने की होड़।पहले के रचनाकार ससम्मान कविता पढ़ना पसंद करते थे परन्तु वर्तमान परिस्थिति एकदम उलट है ।मंचासीन होने के लिए कुछ भी करने को तैयार है आज के कवि।ऐसी ही घटना पर आधारित लघुकथा है" स्वरा" ।यह लघुकथा मंचो पर चल रही राजनीति और नये- नये रचनाकारों कवि सम्मेलन की लोलुपता दर्शाती है ।जिनको रचनाओं में दम नहीं वो कमर मटका कर व चुटकुलों से मनोरंजन करने का प्रयास करते है ।सोमवती लघुकथा की नायिका है जिसे केवल गाना गाना आता है ।नवरस कवि की मदद से सोमवती स्वरा बनकर मंचों की शान बन गई ।मुँह मांगी कीमत पर पाठ करती है।
"स्वराः- दादा आप जानते हैं न कि कम पर जाने से रेट बिगड़ जाता है।" मानवीय स्वार्थ का सजीव चित्रण प्रस्तुत करती लघुकथा ।
लघुकथा संग्रह का नाम भी है - "स्वरा" ,जिसका का मतलब होता है 'ध्वनि की देवी' ।
इस लघुकथा में कालखंड व अंतराल दोष दूर करने के लिए याददाश्त(फ्लैशबैक)  का प्रयोग किया गया है।


लघुकथाकार को लघुकथा लेखन में कथानक, उद्देश्य ,भाषा ,शिल्प ,शैली ,शीषर्क और अंत इन बिन्दुओं पर ध्यान देना होता है।नीरव जी की सभी लघुकथाएँ संदेशपरक है । लघुकथाएं अपने उद्देश्य की पूर्ति बखूबी करती है ।नीरव जी की लघुकथाओं की भाषा सरल और अक्लिष्ट है शब्दों का चुनाव सटीक है।जिससे लघुकथाएँ प्रभावशाली बनी है। भारी भरकम शब्दों एवं अस्वाभाविक बिम्बों का उपयोग रचना को उबाऊ बना देता है जो इन लघुकथा में देखने को नहीं मिली।पाठक को कोई भी लघुकथा पढ़ने या समझने में कोई कठिनाई का अनुभव नहीं होता।
नीरव जी की लघुकथा में कथ्यगत विशेषताओं में गंभीरता, यथार्थपरकता, प्रखरता, सूक्ष्मता, स्पष्टता, पैनापन एवं जुझारूपन आदि प्रमुखतः उल्लेखनीय है।ये जीवन की सच्चाइयों से साक्षात्कार कराती है।  'देखन में छोटे लगै घाव करैं गम्भीर' वाले रूप में कथ्य का पैनापन लिए कुछ लघुकथा है।शीर्षक उचित और आकर्षित करते हैं और लघुकथा को सार्थकता देते है या फिर लघुकथा अपने शीर्षक को सार्थक करती है ।नीरव जी ने किसी भी लघुकथा का अंत करने में कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई । जिससे इनकी लघुकथाओ में प्रवाह बना हुआ है। लघुकथा का सटीक अंत अत्यावश्यक होता है यही लघुकथा का स्तर निर्धारित करता है।लघुकथाओं का रोचक व कलात्मक अंत ही पाठक को प्रभावित करता है ।लघुकथाकार  को लघुकथा के अंत में ही अपनी कलात्मकता दिखानी होती है।
आदरणीय ओम नीरव जी विभिन्न सामाजिक पहलुओं पर अपनी पैनी नज़र रखते है।किसी भी विषय को सफलतापूर्वक लघुकथा मे ढालना इनकी खूबी है।कहन की शैली पाठक को रचना से बांधे रखती है और अंत वाह ,आह की अनुभूति करवाता है पाठक को चौका देता है।यह लेखक की सार्थकता है।
आदरणीय ओम नीरव जी को" स्वरा "के लिए हार्दिक शुभकामना ।पुस्तक की छपाई बहुत अच्छी है कविताकोश प्रकाशन को बहुत बधाई ।आधुनिका का अंत थोड़ा अलग होता तो लघुकथा की रोचकता बढ़ जाती ऐसा मेरा मानना है ।उम्मीद है ऐसे ही अन्य सामाजिक बिन्दुओं को अपनी आगामी लघुकथाओं में अवश्य स्थान देंगे।स्वरा पाठकों के मन में अपनी छाप अवश्य छोड़ेगी ।


समीक्ष्य पुस्तक- स्वरा
विधा- लघुकथा संग्रह
रचनाकार- ओम नीरव
प्रकाशक- कवितालोक प्रकाशन ,लखनऊ
संस्करण- प्रथम 2019
मूल्य- 150 रुपये
पृष्ठ- 72


- सोनिया वर्मा

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जून-जुलाई 2020 (संयुक्तांक)

हस्ताक्षर
कविता-कानन
ग़ज़ल-गाँव
गीत-गंगा
कथा-कुसुम
विमर्श
छंद-संसार
जो दिल कहे
भाषांतर
मूल्यांकन
धरोहर
ख़बरनामा
हाइकु
उभरते स्वर
ज़रा सोचिए!
आधी आबादी: पूरा इतिहास
संस्मरण
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फ़िल्म समीक्षा
जयतु संस्कृतम्
कर्मभूमि-अहमदाबाद