Hastaksher

सितम्बर 2020
अंक - 63 | कुल अंक - 63
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

हिन्दी, हमारा घर है!
हिन्दी, हमारा घर है! 
 
निज भाषा उन्नति अहै,
सब भाषा को मूल
बिनु निज भाषा ज्ञान के,
मिटै न हिय को शूल
- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
 
आज देश भर में 'हिन्दी दिवस' मनाया जा रहा है। यह मुझे हम मनुष्यों के जन्म दिवस सरीखा ही लगता रहा है। हम जीवनपर्यंत इस धरती पर उपस्थित रहते हैं पर अपने अवतरण का दिन सम्पूर्ण उत्साह के साथ व्यतीत करते हैं। बधाई एवं शुभकामनाएँ हर दिशा से आ, दिन के विशेष होने की अनुभूति देती हैं। ह्रदय हर्षोल्लास से भर उठता है। 'हिन्दी दिवस' भी ठीक ऐसा ही है। 
जन्मते ही स्वयं को हिन्दी की गोदी में ही पाया। इसी के वातावरण में श्वांस ली। हिन्दी के पालने में झूलते हुए ही, जीवन में गति का संचार हुआ। स्मृतिपटल पर थोड़ा जोर भी डालूँ, तब भी याद नहीं आता कि सर्वप्रथम हिन्दी का कौन सा शब्द कानों में यूँ मिश्री सा घुल गया था कि अब तक इस भाषा के मोहपाश में बंधी हूँ। इस भाषा से मुझे गहरी आसक्ति है और क्यों न हो! हिन्दी ही सुनी, हिन्दी ही समझी, हिन्दी ही पढ़ी, हिन्दी ही बोली, हिन्दी ही लिखी। 
 
हॄदय जब-जब उद्वेलित हुआ और भावनाओं ने अभिव्यक्त होना चाहा, तब-तब हिन्दी ने मेरा हाथ थाम लेखनी थमा दी। विचारों का झंझावात इसी की बोली में ही सदैव उथल-पुथल मचाता रहा। जीवन के सारे रिश्तों को जो शब्द रुपी मोतियों में पिरोती चली गई वह भाषा हिन्दी ही तो रही। मेरे स्वप्न, मेरे भय, मेरी आशा-निराशा, सुख-दुःख में अपने आँचल से मुझे ढांढस बंधा मेरा मार्गदर्शन करती भाषा भी यही थी। मैंने प्रसन्नता से, उल्लास से और प्रेम में डूब जब भी कुछ कहा तो उसे हिन्दी के सागर में डूबकर ही बाहर निकलते देखा। मेरा चिंतन, मेरा मनन इस भाषा का ऋणी है। 
 
इस हिन्दी ने ही समझाया कि सब अपने हैं। इसका अपनत्व मुझे सदा ही भाता रहा है अरबी, उर्दू, फ़ारसी सबका सम्मान करने का संस्कार भी मुझे मेरी इस भाषा ने ही दिया। देशज शब्दों को तो यह प्रारंभ से ही अपनी गोदी में बिठा दुलारती रही है। आंग्ल भाषा से भी इसे कोई बैर नहीं! दुनिया भले ही कहती रहे कि किसी विदेशी भाषा की उपस्थिति में इसका मान कम हो रहा है पर मेरी हिन्दी हँसते हुए मुझे कहती कि घर, घर ही होता है। चार दिन होटल में रहकर अपना बिछौना याद आता ही है। पिज़्ज़ा-बर्गर जितना भी खा लिया जाए पर स्वादेन्द्रियों को जो तृप्ति घर की दाल-रोटी से मिलती है उसका वर्णन शब्दों से परे है। बाहर आप कुछ भी बोलिए लेकिन हिन्दी हमारा घर है जहाँ भोजन की तलाश में नीड़ को छोड़कर गए पक्षी सांझ तक लौट ही आते हैं। हमारी इस भाषा ने ही हमको जड़ों से जोड़ रखा है। हमारी वैविध्यपूर्ण संस्कृति कई भाषाओं को साथ लेकर चलती है, यही हमारी सभ्यता और संस्कार भी हैं। इसमें सब साथ हैं, एक हैं। हर प्रदेश की भाषा का अपना महत्व है लेकिन इससे हिन्दी के प्रति सम्मान कम नहीं होता! हाँ, आंग्ल-भाषा' का आधिपत्य अवश्य है लेकिन उसके पीछे के कारणों को समझना होगा! 
 
हिन्दी हमारी भाषा है, माध्यम है संवाद का...दिलों को दिलों से जोड़ती है। समय के साथ इसका मूल स्वरुप परिवर्तित हो चुका है। जनमानस के लिए यह हमेशा ही सर्वाधिक सरल, सहज, उपयोगी, प्रभावी एवं ग्राह्य भाषा रही है और भविष्य में भी रहेगी। अन्य भाषाओं की महत्ता स्वीकारते हुए हमें बस इतना ही करना है कि हमारे घर और आसपास की दुनिया के लोग इसे बोलने में गर्व का अनुभव करें न कि ग्लानि का।सरल, सहज भाषा यदि जनमानस के हृदय को सीधे-सीधे छू जाती है, तो इसका एकमात्र कारण यही है, कि यह न केवल आसानी से समझ में आने वाली भाषा है, बल्कि इससे वह खुद को जुड़ा हुआ भी महसूस करता है।
 
टीवी और समाचार पत्रों की लोकप्रियता इसीलिए अब तक बनी हुई है, क्योंकि ये जनमानस की भाषा में बात करते और लिखते हैं। इनकी विशिष्टता इनकी सर्वजन सुबोधता और लचीला होना ही है। ये विज्ञान और प्रोद्योगिकी की भाषा में बात नहीं करते, इसीलिए आम जनता इनसे आज भी उतनी ही जुड़ी हुई है जितना कि वर्षों पहले हुआ करती थी।  ज़रा सोचकर देखिए, यदि हमारे ग्रंथों के सरल हिन्दी भाषा में अनुवाद उपलब्ध न होते, साधारण शब्दों में उनकी व्याख्या न की गई होती, तो कितनों ने उन्हें पढ़ा होता? पहले समाज में हर वर्ग का एक निश्चित कार्य हुआ करता था। विभाजन बेहद स्पष्ट था. संभवत: ज्ञान पाकर, उस पर अपना एकाधिकार बनाए रखने के लिए भी उस समय इसका क्लिष्टीकरण एक अहम मुद्दा रहा होगा! अब परिस्थितियाँ चाहे कैसी भी हों, पर इतना परिवर्तन तो आ ही चुका है, कि शिक्षा और भाषागत स्वतंत्रता हम सभी को प्राप्त हो चुकी है। लेकिन हाँ, हमें भाषा का स्तर नहीं गिराना चाहिए बल्कि इसके प्रयोगवादी स्वरूप को और विकसित करने में अपना पूरा योगदान देना चाहिए। व्यक्ति विशेष के लेखन की अपनी एक शैली होती है और वही उसकी पहचान भी बनती है, ऐसे में सबको अपने तरीके से अपनी बात कहने का पूरा अधिकार है। कथ्य में नीरसता से बचन होगा पर इसकी पवित्रता पर आँच भी न आने दें। यह अपने मूल उद्देश्य संप्रेषण में पूरी तरह से सक्षम बनी रहे और समयानुसार समृद्ध भी होती रहे।  
 
भाषा न तो अभिजात्य वर्ग की बपौती है और न ही शब्दों की फ़िज़ूलखर्ची! तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशी......जो भी हैं, सब भाषा है, पाठक से करीबी रिश्ता बनाने के लिए ईमानदार और संवेदनशील होना बेहद ज़रूरी है, उससे बतियाना भी ज़रूरी है। बस यही प्रयत्न करना है हमें कि भाषा पर संकट न आए, हमारा आपका उससे निकट संबंध बना रहे। अभिव्यक्ति के तरीके भिन्न हो सकते हैं पर हृदय में जो भी भाव उठें, जैसी भी अनुभूति हो, उसे हम व्यक्त ज़रूर करें। चाहे सरल हो या क्लिष्ट; वही भाषा अपनाएँ, जो हमारी अपनी हो क्योंकि बनावटी सामान ज़्यादा दिन नहीं चलता और उसकी सच्चाई सबके सामने आते देर भी नहीं लगती। 
 
आज के समय में प्रकाशकों, पत्र-पत्रिकाओं एवं विभिन्न संस्थाओं का उत्तरदायित्व भी बनता है कि वे स्वहित से ऊपर उठ, भाषा की उन्नति हेतु कार्य करें! सोशल मीडिया पर  विमर्श या आलोचना के नाम पर कुछ साहित्यकारों को अपनी भाषा के गिरते स्तर पर ध्यान देना आवश्यक है। उनके द्वारा अपशब्दों एवं अभद्र भाषा का प्रयोग अत्यंत ही दुर्भाग्यपूर्ण एवं निंदनीय है। 
आशा है, हमारी हिन्दी का मान सदा बना रहेगा! 
'हिन्दी दिवस' की अशेष शुभकामनाएँ!

- प्रीति अज्ञात

इस अंक में ......

सितम्बर 2020

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