Hastaksher

जून-जुलाई 2020 (संयुक्तांक)
अंक - 61 | कुल अंक - 61
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

यह समय, जैसे कोई बुरा स्वप्न चल रहा है


बीते दिनों उ.प्र. माध्‍यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा हाईस्‍कूल और इंटरमीडिएट परिणाम घोषित किये गये, जिसमें लगभग 8 लाख परीक्षार्थी हिन्दी विषय में फेल हो गये। उधर परिणाम आये और इधर उनकी स्वाभाविक विवेचना प्रारम्भ हुई। इन लम्बी-चौड़ी बहसों में अधिकांश का ज़ोर इसी बिंदु पर था कि हिन्दी भाषी राज्‍य होते हुए भी भाषा की ये दुर्गति!

प्रश्न उठता है कि हिन्दी की दुर्दशा कहाँ नहीं हैं? किस प्रदेश में उसे सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है?

 

जब आप संभ्रांत मनुष्यों की भाषा का मुकुट आंग्ल भाषा को पहनाते हैं, उसी समय आप अपनी भाषा का दु:खद भविष्य निश्चित कर देते हैं।
घर में अतिथियों के आने पर बच्चों का ज्ञान प्रदर्शन करवाते समय उनसे अंग्रेजी भाषा की लघु कविताएँ सुनवा, माता-पिता बलिहारी हुए जाते हैं; परन्तु इन बच्चों को ककहरा सिखाने का कष्ट कोई नहीं उठाता! उन्हें स्वयं याद होगा, यह तथ्य भी संदेह के घेरे में ही समझिये। दोष इन दोनों का नहीं अपितु उस शिक्षा व्यवस्था का है, जो प्रतिदिन हमें यह स्मरण कराती है कि आंग्ल भाषा ही आपका उज्ज्वल भविष्य निर्धारित करेगी। प्रतियोगी परीक्षाओं में भी यही प्रधान भाषा के रूप में दर्शित होती है। किसी के सामने अंग्रेज़ी में बात करने का अलग ही रौब समझा जाता है। तो बच्चा क्यों नहीं, हिन्दी छोड़ इस भाषा को प्रधानता देगा! उसे भी तो इसी समाज का हिस्सा बनना है। अपने भविष्य को सुनहरा होता हुआ वह भी देखना चाहता है। ज्ञातव्य हो, यह सोच हमने ही उसे दी है। 
 
भूल यह भी हो जाती है कि हम अपनों को बड़े ही हल्के में ले लेते हैं। 'अरे! तुम तो अपनी ही हो! तुम तो समझोगी ही!' या कि 'ये तो घर की बात है, बाद में देख लेंगे!' जब हम रिश्तों को इस मानसिकता के साथ जीने लगे हैं तो भाषा की बिसात ही क्या! बड़े भी कहते हैं कि 'शेष विषयों पर ध्यान दो, हिन्दी में क्या सीखना! ये तो रोज़ की भाषा है।' बच्चे जिन्हें पहले से ही इसे पढ़ना 'कूल' नहीं लगता, वे भी यह मान बैठते हैं कि 'इसमें क्या! उत्तीर्ण तो हो ही जाना है।' उनका सारा ध्यान अन्य विषयों पर केंद्रित हो जाता है। यही अति आत्मविश्वास उन्हें ले डूबता है। वे मौखिक और लिखित भाषा का मूल अंतर भूल जाते हैं।  व्याकरण की अल्पज्ञता का प्रभाव उनकी अंकसूची पर चिह्नित होता है।
अब इसमें आश्चर्यचकित होने जैसा क्या है? एक तो बच्चे को पहले से ही हिन्दी में रुचि जागृत नहीं हुई, उस पर इस विषय की उपयोगिता भी हम सार्थक सिद्ध नहीं कर सके! ऐसे में उसका झुकाव अन्य विषयों की ओर होना तय ही है। हमारा सामाजिक ढाँचा और शैक्षणिक नीतियाँ ही ऐसी हैं; जहाँ अंग्रेज़ी को, हिन्दी से अधिक सम्मान हर क्षेत्र में दिया जाता है। फ़र्राटेदार अंग्रेज़ी न बोलने वाले प्रायः उपेक्षित ही रहे और हीन भावना का शिकार हुए। बच्चों में जो थोड़ी-बहुत हिन्दी शेष है, उसके लिए बॉलीवुड फ़िल्मों और गीतों का बड़ा योगदान है।
 
हिन्दी सेवा के नाम पर प्रतिवर्ष संगोष्ठी, परिचर्चा इत्यादि कार्यक्रमों के माध्यम से लाखों रुपया फूँका जाता है पर हिन्दी की स्थिति जस-की-तस बनी हुई है। कारण यही कि काग़ज़ी भाषणों में बड़ी-बड़ी बातें कह दी जाती हैं, तालियाँ पिटती हैं, रंगीन तस्वीरें सुर्ख़ियों के साथ प्रकाशित होती हैं। बस, सेवा यहीं समाप्त हो जाती है। ज़मीनी तौर पर कोई कारगर नीति भूले से भी दृष्टिगोचर नहीं होती! भाषा, हमारी संस्कृति का अहम हिस्सा है, अब इस पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता आन पड़ी है।
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बीते माह सुशांत सिंह की आत्महत्या ने नेपोटिज़्म के अतिरिक्त भी कई प्रश्न खड़े कर दिए हैं। उसके बाद टिकटॉक स्टार सिया कक्क्ड़ ने भी इसी राह चल दुनिया को अलविदा कह दिया। दुःख होता है कि तमाम भौतिक सुख-सुविधाओं के बीच रहते हुए भी हम लोग कितने अकेले हैं। उम्र भर हम उस इंसान की तलाश में रहते हैं, जो हमें सुन सके, समझ सके, सुख-दुःख का साथी हो। करोड़ों लोगों से भरी इस दुनिया में कुछ ही भाग्यशाली होते हैं, जिन्हें ऐसा साथ नसीब होता है।
 
हमने हारना सीखा ही नहीं, बस जीत का पाठ ही पढ़ा है। पुस्तकों ने भी जीतना ही अंतिम लक्ष्य बताया। "हार जाने पर क्या करें? कैसे स्वयं को समझाएँ?" यह विषय कभी पढ़ाई में शामिल ही नहीं रहा। इसीलिए हमें टूटना आता है, रोना आता है लेकिन परेशानियों से भरे इस जीवन में स्वयं को समेटने का सलीक़ा अब तक नहीं जान पाये हैं! भीषण अवसाद के क्षण में बुद्धि काम ही कहाँ करती है! यूँ ही एक-एक कर साथ छूटता चला जा रहा है। लेकिन हमें दुनिया की परवाह न करते हुए, अपने लिए जीना सीखना होगा। जीवित अवस्था में हर परिस्थिति से लड़ा जा सकता है। भागना क्यों है? डटे रहिए, अड़े रहिए। एक पल को भी नहीं भूलना है कि मरने की कोई एक वजह हो सकती है पर जीने के सौ कारण फिर भी शेष रह जाते हैं।
 
हमारे सैनिकों के शहीद हो जाने के बाद से चीन के विरुद्ध सम्पूर्ण भारत में रोष की लहर दौड़ चुकी है। हर कोई उसके नापाक इरादों को सबक़ सिखाना चाहता है। चीनी उत्पादों का विरोध भी ज़ोर पकड़ रहा है। आंतरिक सुरक्षा की दृष्टि से भारत सरकार द्वारा 59 चीनी एप्प्स पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। इनमें टिकटॉक सर्वाधिक चर्चा में है। जहाँ कुछ लोग इसके बंद हो जाने से प्रसन्न हैं तो वहीं इसके प्रशंसक निराश हुए हैं। इस एप्प में सौ बुराइयाँ सही लेकिन इसकी पहुँच गाँव-गाँव तक थी। इसके माध्यम से जहाँ एक ओर फूहड़ता की सभी सीमाओं को लाँघा गया तो वहीं कई प्रतिभाओं को इससे मंच मिला और रोज़गार भी। हमें पूरा विश्वास है कि शीघ्र ही अब एक पूर्ण स्वदेशी एप्प इन युवाओं के चेहरे पर प्रसन्नता लौटा लाएगा। 
 
चलते-चलते: इधर देश में लॉकडाउन अब बस कहने भर को ही रह गया है। सड़कों पर पूर्ववत चहल-पहल दिखने लगी है। सुरक्षा सम्बन्धी नियमों की जानकारी सभी को है लेकिन इसके बाद भी कुछ लोग समझना ही नहीं चाहते। इस महामारी में अनावश्यक बहादुरी दिखाने की कोई आवश्यकता नहीं है, यह मूर्खता ही कही जायेगी। हो सके तो अपने परिवार, क़रीबी मित्रों की तस्वीरें आँखों में बसा लीजिए। 
एक ही बात याद रखिये कि यदि हम कोरोना वायरस से डरेंगे नहीं तो बचेंगे भी नहीं!

 


- प्रीति अज्ञात

इस अंक में ......

जून-जुलाई 2020 (संयुक्तांक)

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