प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अगस्त 2017
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्यांकन

जीवन के विभिन्न रंगों एवं पहलुओं को चित्रित करती ग़ज़लों का संकलन: नूर-ए-ग़ज़ल - के. पी. अनमोल
 



ग़ज़ल के नूरानी फ़लक पर कुछ साल पहले एक युवा शायर कुछ अलग ही ताब लेकर आया था और अब किसी सितारे की मानिन्द अपनी चमक बिखेर रहा है। हिन्दुस्तानी ग़ज़ल के परिदृश्य में समकालीन सरोकारों से लेस इनकी ग़ज़लें तकनीकी पक्ष पर भी उतनी ही खरी हैं, जितनी गहराई भाव पक्ष की है। बिल्कुल आम ज़ुबान में अपने आसपास के हालातों, सम्वेदनाओं को अपने शेरों में ढालने का जो हुनर इस ग़ज़लकार के पास है, वह दिन-ब-दिन निखरता ही जा रहा है। समय के साथ इनकी ग़ज़लों के सामानांतर ग़ज़ल को लेकर इनकी समझ में भी लगातार परिपक्वता देखने को मिल रही है।

ग़ज़लों के प्रति एक तरह का जुनून-सा है इस ग़ज़लकार में और वह जुनून अपने पेशे की बदौलत आता है शायद। मैं बात कर रहा हूँ डॉ. मनोज कुमार की, जो एक संजीदा ग़ज़लकार होने के साथ-साथ एक वैज्ञानिक भी हैं। बिहार के सुरसंड (सीतामढ़ी) के इस ग़ज़लकार की ग़ज़ल के लिए दीवानगी की मिसाल देखिए कि अभी ग़ज़ल को समझते हुए एकाध साल ही हुआ था कि इन्होंने कुछ युवा और स्थापित शायरों की ग़ज़लों का एक मजमुआ सम्पादित करने की ठान ली।
काम में जुटने के बाद ज़ाती मसरुफ़ियत और कई अन्य रुकावटों के चलते यह काम थोड़ा देर से हुआ लेकिन अपनी योजना को इन्होंने धरातल पर लाकर ही छोड़ा।


215 पेज की इस किताब में देश भर के कुल 47 रचनाकारों को शामिल किया गया है। देवेन्द्र माँझी, महेश कटारे सुगम, चाँदनी पाण्डेय, शमशाद शाद, फ़ानी जोधपुरी, समीर परिमल और यूसुफ़ रईस कुछ ऐसे नाम हैं, जिनसे ग़ज़ल विधा के पाठक भलीभांति परिचित हैं। इनके साथ ही अनेक युवा रचनाकारों की रचनाओं को भी बड़ी संख्या में संकलन में शामिल किया गया है।
'नूर-ए-ग़ज़ल' नामक इस पुस्तक में सम्मिलित सभी ग़ज़लों में आसान शब्दावली में समकालीन सरोकारों में पगी ग़ज़लें पढ़ने को मिलती हैं, जो आज की हिन्दुस्तानी ग़ज़ल का ख़ास तेवर है। और यही ख़ूबी हमें डॉ. मनोज कुमार की ग़ज़लों में भी देखने को मिलती है। ज़ाहिर-सी बात है, एक रचनाकार की ज़हनियत का असर सम्पादन पर भी आना ही था।


किताब के कन्टेन्ट के बारे थोड़ी विस्तार से जानकारी हमें सम्पादकीय में मिल जाती है, बकौल डॉ. मनोज कुमार, "ग़ज़ल के विषयों की भिन्नता पर विशेष ध्यान देते हुए इंसानी जीवन के हर रंग एवं सामाजिक जीवन के हर पहलू को चित्रित करती हुई ग़ज़लों को इस संकलन में शामिल किया गया है। एक ओर जहाँ ग़ज़ल के परम्परागत विषयों अर्थात् प्रेम, मिलन एवं विरह संताप पर हृदय स्पर्शी रचनाएँ शामिल हैं, वहीं दूसरी ओर सामाजिक, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व के सम-सामयिक मुद्दों को उजागर करती ग़ज़लें भी 'नूर-ए-ग़ज़ल' में प्रमुखता से प्रस्तुत की गयी हैं।"

एक प्रशंसनीय पहलू इस किताब का यह भी है कि इस महत्त्वपूर्ण और उल्लेखनीय काम में आये समस्त खर्च का वहन बिना किसी सरकारी या निजी संस्था के सहयोग के डॉ. मनोज कुमार ने अपनी जेब से किया है। सम्पादन और प्रकाशन में लगा समय और धन इनकी ग़ज़लों के प्रति दीवानगी के सबूत हैं।

वैसे तो किताब में सम्मिलित सभी ग़ज़लें पढ़ने योग्य हैं लेकिन उनमें कुछ रचनाएँ ऐसी भी हैं जो विशेष उल्लेखनीय हैं। जहाँ नए रचनाकार मित्र इस किताब में कुछ नामचीन ग़ज़लकारों के साथ प्रकाशित होने को लेकर उत्साहित होंगे तो दूसरी तरफ तीन पीढ़ियों के अलग अलग मिज़ाज की ग़ज़लें एक ही संकलन में पाकर पाठक वर्ग भी लाभान्वित ज़रूर होगा। पढ़िए पुस्तक से कुछ चुनिन्दा शेर, जो इसमें शामिल ग़ज़लों का एक ट्रेलर भर हैं-



आ गया गर तू ज़मीं पर तो नहीं लौटेगा
अपनी जन्नत का न दे और हवाला मुझको
- देवेन्द्र माँझी

डाल रक्खी हैं नकेलें ज़िंदगी की नाक में
आज ऐसे लोग जन, गण, मन के गायक हो गए
- महेश कटारे 'सुगम'

गर यूँ ही झुकते रहे ये मेरे काँधे बोझ से
एक दिन रख दूंगा में अपनी जवानी इक तरफ
- फ़ानी जोधपुरी

ज़ातो-मज़हब के लिए अब क़त्लो-ग़ारत आम है
गंगा-जमुनी थी कभी तहज़ीब, उल्टी हो गई
- डॉ. मनोज कुमार

फ़लक पर अब हमारी बेटियाँ परवाज़ करती हैं
कहाँ रोके हैं उनको बंदिशें दीवारो-दर की अब
- शमशाद शाद

क़रीबी वो बहुत होने लगा है
गिराएगा मुझे अपनी नज़र से
- समीर परिमल

सच्चाई हुई शहर की रातों में नुमाया
मज़बूरी सड़क पर यहाँ क्या क्या नहीं करती
- यूसुफ़ रईस

परिन्दों की तरह उड़ने की ख़्वाहिश दिल में है हर पल
मगर मग़रूर सैय्यादों की मनमानी से डरते हैं
- डॉ. नीलम श्रीवास्तव

है जिसमें ख़ुद को बदलने का भी माद्दा बाक़ी
मेरे ख़याल से बस कौम वो ही ज़िन्दा है
- अय्यूब ख़ान 'बिस्मिल'

वफ़ा मुहताज है क्या क़ुरबतों की
चलो कुछ दूर रहकर देखते हैं
- गीता वर्मा 'गीत'

जहाँ हर फ़िक्र में हो नागफनियों का घना जंगल
वहाँ के स्वप्न कैसे हो सकेंगे रात-रानी से
- ज्ञानप्रकाश पाण्डेय



जैसा कि मैं ऊपर अपनी बात में कह चुका हूँ कि यह काम पुस्तक के सम्पादक डॉ. मनोज कुमार के शुरूआती दौर का है, सो कुछ कमियाँ भी लाज़मी हैं। वैसे भी मुकम्मल ज़ात सिर्फ़ ख़ुदा की है। अगर उन कुछ अखरने वाली चीज़ों की बात करूँ तो उनमें सबसे पहली चीज़ होगी 'रचनाकारों का क्रम'। किताब में जहाँ दो वरिष्ठ ग़ज़लकार देवेन्द्र माँझी व महेश कटारे 'सुगम' क्रम संख्या 8 व 17 पर दिखते हैं वहीं कलकत्ता के सुगढ़ ग़ज़लकार ज्ञानप्रकाश पाण्डेय कई नवोदित रचनाकारों के बाद अंतिम नंबर पर है। यदि पुस्तक को स्थापित और नवोदित रचनाकारों के दो भागों में रखा जाता तो और बेहतर हो सकता था।
किताब की एक और अखरती हुई बात है 'सभी रचनाकारों की प्रकाशित ग़ज़लों की संख्या का असमान होना।'
कुछ रचनाकारों का चयन ही सवाल खड़े करता है। हालाँकि सम्पादक ने इन बातों का स्पष्टीकरण अपने संपादकीय में कुछ इस तरह दे दिया है, "इस पुस्तक में जिन शायरों की ग़ज़लें शामिल की गयी हैं या जिन्होंने इसमें प्रकाशन हेतु अपनी ग़ज़लें निवेदित की थीं, बतौर शायर मैं उन सभी में सबसे नया और कम अनुभवी था। लिहाज़ा मेरे लिए उनकी ग़ज़लों का चयन एवं सम्पादन करना आसान न था।"


बहरहाल नई दिल्ली के एनबीडी बुक्स प्रकाशन से आई 215 पेज की इस महत्वपूर्ण किताब में ग़ज़ल के पाठकों को लिए बहुत कुछ है। नए ग़ज़लकार साथियों के लिए भी यह कई तरह से उपयोगी है। पुस्तक के सम्पादक डॉ. मनोज कुमार से [email protected]अथवा 08257967466 पर संपर्क कर इसे मँगवाने के बारे में जानकारी हासिल की जा सकती है।





समीक्ष्य पुस्तक: नूर-ए-ग़ज़ल (साझा संकलन)
विधा: ग़ज़ल
सम्पादक: डॉ. मनोज कुमार
संस्करण: प्रथम
मूल्य: 295 रूपये
प्रकाशक: एनबीडी बुक्स प्रकाशन, नई दिल्ली


- के. पी. अनमोल
 
रचनाकार परिचय
के. पी. अनमोल

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