प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अगस्त 2017
अंक -42

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम
जीत
 
अतीत के झरोखे से जब भी गुजरे वक़्त को देखता हूँ तो लगता है जैसे मेरी राहें मेरी मंज़िल से कभी जुडी हुई थी ही नहीं, सपनों का जैसे कोई धरातल था ही नहीं और प्रयासों का फल मिला ही नहीं। हर कदम पर अनगिनत समझौतों ने बस बेबसी ही बेबसी दी। कभी विज्ञान में अनुसन्धान का जूनून था और आज बस एक निजी विद्यालय का शिक्षक हूँ जो अपनी प्रतिभा दिखने का अवसर कब का खो चुका है।
कक्षा का एक प्रतिभावान और अनुशासित छात्र होने के नाते हमेशा सभी शिक्षको का प्रिय रहा और अध्ययन काल में सभी से आशीष और मार्गदर्शन मिलता रहा। अक्सर अपने बारे में सुनता था कि "अमित, तुम एक दिन हमारा नाम रौशन करोगे" तब खुद पर नाज़ होता था। शिक्षा पूर्ण होते ही जोश में आ कर महाविद्यालय में शिक्षक बन गया और साथ ही प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने की ठान ली। अनुसन्धान की बात को किसी ने गंभीरता से लिया नहीं तो सोचा नौकरी लगने के बाद एक दिन सबको दिखा दूंगा कि मैं क्या कर सकता हूँ। मैं अपने लिए बेहतर अवसर की तलाश कर रहा था और घर वाले मेरी जीवन संगिनी की तलाश।
 
रिश्ता भी हो गया और विवाह भी, ज़िम्मेदारियाँ और तनाव दोनों दिन ब दिन बढ़ने लगे। प्रतियोगिता की तैयारी और परिवार की ज़िम्मेदारी, दोनों में से किसी एक का चयन करने की नौबत आ गई। अरमान धूमिल से होने लगे, लग रहा था जैसे कोई ट्रेन छूटने वाली है। हताश हो कर परिवार को चुनना पड़ा, सपनो को दबा दिया कहीं जहाँ से वो फिर सामने ना आये। मेरे फैसले से मैं जितना आहात था उस से कई गुना आहात हुई मेरी जीवन संगिनी जिसने मुझे चार महीनों में उतना समझ लिया जितना मेरे परिवार के लोग आज तक नहीं समझ पाये। मेरा हाथ थामते हुए बोली :- "कुछ चीजें किस्मत में नहीं होती, उनके लिए उदास नहीं हुआ करते।" सही ही कहा उसने, मैं थोड़ा हल्का महसूस करने लगा। 
 
वक़्त अपनी रफ़्तार से चलता गया, सपने पंछी बन कर उड़ चुके थे। छोटी छोटी चीजें में खुशियाँ ढूँढने का हुनर मेरी अर्धांगिनी ने मुझे सिखा दिया। अब परिवार में उसके अलावा दो बेटे भी है जो मेरे काम की थकान को मेरी चौखट के अंदर नहीं आने देते। दिन भर की थकान तब काफूर हो जाती जब शाम को पास ही के एक पार्क में टहलने जाता तो मेरा छोटा बेटा मेरे घर के बाहर कदम रखने से पहले ही दौड़ कर मेरी ऊँगली थाम लेता। मैं भी ये सोच कर खुश हो जाता कि मेरा बेटा आज ही से मुझसे कदम मिला कर चलने लग गया है। घर में अक्सर मैं उस से खुल कर प्यार नहीं जता पाता था क्योंकि पिताजी के सख़्त व्यवहार से मैं अब भी सहमा सहमा सा रहता हूँ घर में मगर बाहर मैं उसको जी भर के स्नेह करता। हम दोनों खूब सारी मस्ती कर के वापस आ जाते। शुरू शुरू में उसकी माँ घर के काम जल्दी निपटने के लिए उसको मेरे साथ भेजती मगर फिर ये ऐसी आदत बन गई जिसको हम दोनों ही नहीं बदलना चाहते थे। अब वो स्कूल जाने लग गया मगर फिर भी शाम हम दोनों की घर से बाहर ही होती थी।
 
कभी कभी बस ये टीस लगती है कि थोड़ी तनख्वाह अगर ज्यादा होती तो सभी के लिए अच्छा होता, ये लालच नहीं बस जरूरत की बात थी। और इसी बीच एक दिन अख़बार पर नजर पड़ी जहाँ एक निजी विद्यालय विज्ञान के शिक्षक को महाविद्यालय से भी अच्छी तनख्वाह ऑफर कर रहा था। आदतन मैंने अपनी अर्धांगिनी से बात की तो उसने इतना ही कहा कि जैसा आपको ठीक लगे। वो मेरे हर फैसले में हमेशा शामिल रही और यहाँ भी मुझे उसकी अप्रत्यक्ष स्वीकृति मिल गई।
 
साक्षात्कार के बाद चयन का कॉल भी आ गया और पंद्रह वर्ष की निरंतरता के बाद एक नई शुरुआत हो ही गई। पहले ही दिन बहुत उत्साह से विद्यालय गया और वहां के माहौल से लग गया कि यहाँ संघर्ष ज्यादा है मेरे लिए। प्राचार्या ने सब नए शिक्षकों को संबोधित करते हुए वहां के अनिवार्य नियमों से अवगत करवाया मगर जो बात उन्होंने सब से ज्यादा दोहराई वो बात ही अच्छे से याद रही कि किसी भी बच्चे को आप हाथ नहीं लगाएंगे, डाँटेंगे भी नहीं, वरना इस स्कूल से मैं खुद आपको सब से पहले बाहर कर दूंगी। 
 
जिस उत्साह से बदलाव का फैसला किया वो उत्साह उद्दंड बच्चों की वजह से कुछ दिनों में ही रफूचक्कर हो गया, ऊपर से उनको कुछ कह भी नहीं सकते। महाविद्यालय में कम से कम उनको डांट तो सकते थे। गुस्सा निकलने का कोई रास्ता ही नजर नहीं आता। संघर्ष इतना बढ़ गया कि अब मेरा गुस्सा मेरे घर की चौखट में कदम रखने लग गया। शादी के चौदह साल बाद पहली बार बीवी से गुस्से में बात की और थोड़ी देर में शर्मिंदा भी हुआ पर वो इस बार भी हमेशा की तरह समझदारी में मुझसे कई कदम आगे रही और कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। मैंने सोचा कि अपने गुस्से पर काबू रखूँगा लेकिन बात एक और बार बिगड़ गई जब शाम को स्कूल की परीक्षा का प्रश्न-पत्र बना रहा था और छोटू आ कर हाथ खींचते हुए बोला :- "पापा चलो ना पार्क में।" उसके हाथ खींचने की वजह से पन्ने पर एक लंबी लकीर बन गई और तुरंत में मैंने उसके गाल पर एक तमाचा जड़ दिया। वो सहम गया, कुछ देर रो भी नहीं पाया, वहीँ खड़े मेरी तरफ देखता रहा और फिर रोते हुए बाहर भागा। वो बाहर निकला और मैंने अपना सर पीट लिया, ये मैंने क्या कर दिया। मैं उसके पीछे लपका और देखा तो वो अपनी माँ से लिपट के रो रहा था। मैं कुछ ही दिनों में दोनों को आहत कर चूका था, बेटे को मनाने की हिम्मत नहीं हुई और वापस जा कर परीक्षा पत्र बनाने में लग गया। सोचा बीवी से बाद में बात करूँगा पर फिर से वो मुझसे ऐसे पेश आई कि जैसे कुछ हुआ ही ना हो और मैंने भी बात को आया गया करना ही ठीक समझा।
 
अगले दिन पार्क के लिए निकलने लगा तो किसी ने मेरी ऊँगली नहीं पकड़ी, पलट के देखा तो छोटू अपने खिलौनों में मग्न है, सोचा आवाज दे कर बुला लूँ पर फिर बिना आवाज दिए ही निकल गया। आज पार्क खाली सा लग रहा था और मैं जल्द ही लौट आया। ये सिलसिला चलता रहा और छोटू ने मेरे साथ आना बंद कर दिया तब मुझे एहसास हुआ कि वो मुझसे कितना नाराज है। मैं कुछ भी कर के उसको अपने साथ ले जाना चाहता था मगर वो था कि जैसे पार्क में जाना ही भूल गया। मैं बुझा बुझा सा रहने लगा, घर में मेरे पिताजी के रहते मैं छोटू से बात नहीं कर पाता और बाहर वो आता नहीं, कई बार सोचा रात में बात करूँगा मगर वो हमेशा की तरह जल्दी सो जाता। मैं उस एक मौके की तलाश में था जब मैं अपने दोनों बच्चों को और बीवी को कहीं एकांत में ले कर खूब सारी बातें कर सकूँ और सब कुछ सामान्य कर सकूँ। 
 
मेरी तलाश पूरी हुई जब मेरे पिताजी और माँ दस दिन के लिये गांव चले गए। मैंने बीवी से कहा कि शाम को कहीं बाहर चलेंगे खाना खाने। वैसे बाहर खाना खाने वाली हिमाकत मैंने पहले भी की थी पर पिताजी ने गरजती आवाज में मना कर दिया तो उनके यहाँ रहते दोबारा हिम्मत नहीं कर पाया। शाम को हम चारों निकल पड़े, आज मैं दिल खोल कर तीनों की सभी फरमाइशें पूरी करने में लगा हुआ था पर छोटू अब तक कुछ नहीं बोला। मैं ये सब कुछ सिर्फ और सिर्फ छोटू के लिए कर रहा था। मैंने उसको हिम्मत कर के पूछ ही लिया :- "तुम्हें क्या चाहिए बेटा?" 
वो मुझसे दूर खिसक गया।
मैंने उसका हाथ पकड़ते हुए उसको अपने पास खींचा तो वो पास आ गया।
मैंने घुटनो पर बैठते हुए उसको गले लगा कर कहा :-"आई ऍम सॉरी बेटा। आज के बाद फिर कभी तुम पर गुस्सा नहीं करूँगा। मान जाओ ना प्लीज।"
उसने भी मेरी गर्दन से लिपटते हुए ये एहसास करवाया कि अब सब ठीक है।
मैंने फिर से पुछा :-" बताओ क्या चाहिए तुम्हे।"
वो रूंधे गले से बोला :-"मेरे साथ पार्क में चलो, अभी के अभी।"
मैं खिल उठा, उसको कन्धों पर उठा कर पार्क की तरफ दौड़ लगा दी। देर रात तक अपने परिवार के साथ पार्क में बैठ रहा और एक एहसास को जीता रहा कि मैंने सब कुछ ठीक कर लिया।।
 

- कल्याण के विश्नोई
 
रचनाकार परिचय
कल्याण के विश्नोई

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कथा-कुसुम (2)