प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जुलाई 2017
अंक -28

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

लघुकथा- भीड़


दिन भर आग उगलने के बाद थका-मांदा सूरज पुराने तालाब में डुबकी लगाने को आतुर तेजी से ढ़लता जा रहा था। गोधूली बेला मे सभी अपने नीड़ की तरफ बढ़ चले। घंटों से नूरा को ढ़ूंढ़ती फातिमा भी हलकान हो घर को चल पड़ीं।
"अम्मी ओ अम्मी! नूरा आ गयी क्या?" फातिमा ने टेर लगाई।
"नहीं तो, तुम्हारे साथ ही तो थी। क्यों, क्या हुआ?" अम्मी चुन्नी से हाथ पोंछती बाहर आई।
"हाँ! हम उसे नहला कर वहीं पोखर के पास छोड़ कपड़े धोने लग गयी थीं फिर आते वक्त बहुत ढ़ूंढ़ा पर ..." रजिया रूआंसी हो उठी।
"ओह! अब तो अंधेरा हो गया, अब क्या होगा?" अनजानी आशंका से कांप उठी अम्मी।
"क्या हो गया?" रहीम मियां अंदर आते हुए सबसे मुखातिब हुए।
"अब्बा, वो नूरा नहीं मिल रही शाम से।" रजिया बोली।
"क्या?  या खुदा! कहीं कुछ...." कहते हुए दौड़ कर रहिम मियां बाहर निकले और अपने पड़ोसी रहमत और लल्लन को आवाज़ दी। कुल जमा तीन घर ही थे बस्ती में इनके।
सब जानकर दोनों डंडा और रस्सी लिए आ गये। रहीम मियां टॉर्च लिए लपकते से निकलने को हुए कि पड़ोस मे रहने वाले मास्टर साहब ने टोका, "क्या हुआ? ये कहाँ की तैयारी?"
"मास्टर जी, वो अपनी नूरा नहीं मिल रही शाम से। कल्लू चमार की नज़र कब से उस पर लगी है...हमेशा कहता है बूढ़ी गौ रख कर क्या फायदा...इसे मुझे बेच दे।" कहते हुए एक खौफ-सा छा गया रहीम की आँखों में। रुंधे गले से बोला, "आप तो जानते हो कि वो हमारे घर की सदस्य जैसी है। उसी को ढ़ूंढने जा रहे हैं।"
"बाहर बहुत अंधेरा है, कल सुबह ढ़ूंढ़ लेना।" मास्टर जी ने गंभीरता से कहा।
"अंधेरा? आज तो पूरे चांद की रात है मास्टर जी, फिर ये टॉर्च भी तो है ..." उतावला होता रहीम बोला।
"पूरे चांद से लोगों के दिमाग का अंधेरा नही जाएगा मेरे भाई! नूरा को कुछ नहीं होगा, उसे बचाने के नाम पर सौ हाथ खड़े हो जाएंगे, भले उस भीड़ में कल्लू चमार भी क्यों न हो, पर..."

एक पल को रूक कर उन्होंने रहीम के कंधे पर हाथ रखते हुए भीगी आवाज़ में कहा,  "अभी रात में तुम सभी को नूरा के साथ देख कर तुम्हारे सच पर कोई यकीन न करेगा और न बचा पाएगा....भले उस भीड़ में मैं भी क्यों न होऊं।"



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लघुकथा- स्टेटस अपडेट


गाड़ी पार्क करते हुए सुधीर की नज़र मान्या पर पड़ी, जो फोन पर तल्लीन थी। सुधीर को देख फ्रेश होने का इशारा करती फिर बातों में लग गयी। शॉवर के नीचे सर रखकर सुधीर दिनभर की हलकान शिड्यूल से धीरे-धीरे उबर रहा था...फ्रेश होने के बाद टीवी के सामने बैठा चैनलों में खुद को उलझाने की कोशिश पे भूख हावी होने लगी। लगभग आधा घंटा हो चुका मगर मान्या  की बातों का समापन होते नहीं दिख रहा था। थक कर वो किचन की ओर चल पड़ा। डाईनिंग टेबल पर नज़र पड़ते ही उसकी आँखें चमक उठीं...भूखी आँतें कुलबुलाने लगीं।
अलग-अलग डोंगों में कई प्रकार की मिठाईयां, नमकीन, दही-भल्ले सब करीने से सजे थे। टेबल के बीचो-बीच खूबसूरत कैंडल जलाने के लिए रखा था। सुधीर मुस्कुरा उठा...उसने सबसे पहले काँच के बाउल में दही-भल्ले निकाले। अभी पहला चम्मच मुँह मे रखा ही था कि मान्या आ पहुंची, "अरे! ये क्या किया आपने?"
सुधीर ने प्रश्न सूचक नज़रें घुमाई।
"पूरे दिन इतनी मेहनत से ये नाश्ता बनाया, कल वॉल पर स्टेटस अपडेट करना था और आपने सब गुड़-गोबर कर दिया।" पैर पटकती मान्या जा चुकी थी। सुधीर के मुँह मे घुलते दही-भल्ले का स्वाद कड़वा होने लगा था।



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लघुकथा- यशोधरा


"सेवन टेन जा सेवेंटी...शाबास चीनू! होमवर्क हो गया...अब आप अपना बैग संभाल कर रख आओ।" एक लंबी उबासी लेकर सरिता ने घड़ी पर नज़र डाली। "उफ्फ साढ़े सात बज गये, रात का खाना और कल सुबह की तैयारी भी...बहुत काम फैला है।" सोचती वो अपनी थकान भूल झट से सब्जी की टोकनी उठाई जो चीनू को होमवर्क करवाते समय ही साफ कर ली थी।
किचन की ओर जाते हुए उसने एक नज़र रिया पर डाली, जो कुछ लिखने मे व्यस्त थी। आज उसका चेहरा उतरा-सा था।
"अपनी व्यस्तता मे मैं रिया पर ध्यान ही नहीं दे पा रही आजकल।" तुरंत ही मन कचोटा उसका।

"रिया क्या बात है बेटा? आपका चेहरा क्यूँ लटका है?"
"कुछ नहीं मम्मा...आप बहुत थके हो...चलो मैं आपके लिए शरबत बनाती हूँ।" कहती रिया अपनी कॉपी बंद करती सरिता के पीछे चल दी।
"नहीं बेटा, आप पढ़ो...आज थोड़ी थकान है....वो ऑफिस में आज कुछ अधिक काम था इसलिए ..."
"कल स्कूल में बुद्ध जयंती है मम्मा...इसलिए होमवर्क नहीं है। अभी महात्मा बुद्ध पर ही आलेख लिख रही थी मैं।" रिया ने शरबत का गिलास सरिता को पकड़ाते हुए कहा। सरिता मुस्कुराते हुए घूँट भरने लगी।

"मम्मा एक बात पूछूं?"
सरिता ने प्रश्न सूचक नज़रों से बेटी को देखा।
"क्या स्त्रियों को शांति और ज्ञान की जरूरत नहीं होती?" हज़ारों भाव थे रिया की आँखों में।
सरिता की नज़र बेटी से टकराई और अचानक ही सुबह का दृश्य आँखों मे घूम गया जब पतिदेव गुस्से मे पाँव पटकते गाड़ी स्टार्ट कर ये भुनभुनाते निकले थे कि "इस घर मे कभी शांति नही मिल सकती....।"

उसने एक निश्वास लिया...बेटी का आशय स्पष्ट था। चीनू भी बैग रख कर सरिता के पास आ खड़ा हुआ।
बहुत ही सहज हो कर उसने दोनों बच्चों को अपनी गोद मे समेटते हुए मुस्कुरा कर कहा, "बेटा, जिस शांति और ज्ञान की तलाश मे पुरूष पलायनवादी मानसिकता दिखाते हैं वो हम स्त्रियों को सहज प्राप्त है क्योंकि हमें पता है कि घर-गृहस्थी और ज़िम्मेदारियों को नकारते कथित ज्ञान और शांति एक मिथक है और हम यशोधरा बनकर ही संतुष्ट हैं।"


- अपराजिता अनामिका श्रीवास्तव
 
रचनाकार परिचय
अपराजिता अनामिका श्रीवास्तव

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