प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जुलाई 2017
अंक -30

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ज़रा सोचिए

आज के सन्दर्भ में भी राजा दशरथ एक आदर्श


गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरित मानस में वैसे तो सभी चरित्र उल्लेखनीय हैं, पर कदाचित ही आम जनमानस का ध्यान कभी राजा दशरथ की ओर एक आदर्श ससुर के रूप में गया हो। राजा दशरथ का चरित्र एक आदर्श ससुर के रूप में आज के सन्दर्भ में भी ध्यान आकर्षित करता है। उनका चरित्र आधुनिक समाज के लिये आदर्श और अनुकरणीय दोनों है।
गोस्वामी तुलसीदास रामचरित मानस में लिखते हैं कि राजा दशरथ ने पुत्रों श्री राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के विवाह के पश्चात, पुत्रों को प्रेम से अंक में लिया तो पुत्र वधुओं को भी। अर्थात राजा दशरथ के व्यवहार में पुत्रों और पुत्र-वधुओं के मध्य कोई भेदभाव नहीं है। वे दोनों को समान रूप से प्रेम देते हैं।


लिये गोद करि मोद समेता। को कहि सकइ भयउ सुखु जेता।।
वधु सप्रेम गोद बैठारी। बार बार हिय हरषि दुलारी।।
(बाल काण्ड)


वधुओं को विदा कराकर वे जब लाते हैं तो अपनी रानियों को बुलाकर समझाते हैं कि बहुएँ बहुत छोटी हैं अभी बच्ची हैं, इन्हें ऐसे प्यार से रखना जैसे पलकें पुतलियों को रखती हैं। राजा दशरथ की यह सोच वात्सल्य प्रेम का प्रतीक है।
पति की इस सीख का माता कौशल्या ने भी भली-भांति पालन किया। माता कौशल्या जब पुत्र श्रीराम और वधु सीता के वनवास के आदेश से आहत होकर कहती हैं।


मैं पुनि पुत्रवधू प्रिय पाई। रूप रासि गुन सील सुहाई।।
नयन पुतरी करि प्रीति बढाई। राखेउँ प्रान जानिकिहीं लाई।।
(अयोध्या कांड)


माता कौशलया ने भी पुत्र वधु सीता को अपने प्राणों के समान संभाल कर रखा। राजा दशरथ नहीं चाहते हैं कि सुकुमारी वधु सीता को वन में कोई कष्ट हो इसलिये समझाते हैं।

तब नृप सीय लाई उर लीन्ही। अति हित बहुत भांति सिख दीन्ही।।
कहि बन के दुख दुसह सुनाये। सास ससुर पितु सुख समझाए।


परन्तु  श्रीराम और माँ सीता वनवास को चले जाते हैं, तब वे अपने मंत्री सुमन्त को वन भेजते हैं और उनको समझाते हैं कि दोनों पुत्रों श्रीराम और लक्ष्मण और पुत्रवधू सीता को चार दिन वन दिखलाकर वापस ले आना। यदि पुत्र वापस न आये तो जनककुमारी सीता को वापस ले आना क्योंकि वन में बहुत कष्ट हैं।

पितृगृह कबहूँ कबहूँ ससुरारी। रहहु जहां रूचि होई तुम्हारी।।
एही विधि करेहु उपाय कदम्बा। फिरइ त होई प्रान अवलंबा।।


राजा दशरथ मंत्री सुमन्त को कहते हैं कि वधु सीता को समझाना कि जहाँ इच्छा हो वहाँ रहे, चाहे मायके में चाहे ससुराल में। उनके विचार उस समय के समाज को देखते हुए अति उदार तथा आधुनिक थे। पुत्र के वनवास की अवधि में पुत्रवधू को स्वतंत्रता देते हैं। राजा दशरथ ससुर के रूप में अत्यधिक उदार और प्रेम की मूरत थे। अपने इन्हीं गुणों के कारण आज भी प्रशंसनीय और अनुकरणीय हैं।

यदि हम आज के समय में उनके विचारों को आदर्श मानकर बहु को बेटी के समान समझेंगे और उसके सुख-दुख का ध्यान रखेंगे तो बहु और बेटी में कोई भेद नहीं रह जायेगा। आज के सन्दर्भ में राजा दशरथ के चरित्र के माध्यम से गोस्वामी तुलसीदास का प्रत्येक परिवार के लिये यही सन्देश है तथा समाज के लिए मार्गदर्शन।


- आरती शर्मा
 
रचनाकार परिचय
आरती शर्मा

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