प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जुलाई 2017
अंक -28

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्यांकन

राष्ट्रानुराग से ओत-प्रोत हैं ‘सृष्टि-सेतु’ की रचनाएँ- आचार्य बलवन्त
 



कविता अन्तर्मन की मार्मिक अभिव्यंजना है। साहित्यकारों ने इसे मानव मेधा की सर्वोत्कृष्ट उपज बताया है। इसकी साधना के लिए प्रचुर एवं परिष्कृत काव्य सामग्री तथा यथोचित प्रयत्न अपेक्षित होते हैं, किंतु इन साधनों से ही कविता का प्रभावोत्पादक और हृदयग्राही हो पाना सम्भव नहीं है। मेरे विचार से कवि की अन्तर्वेदना चरमोत्कर्ष पर पहुँचते ही मूर्त रूप लेने के लिए तद्नुरूप शब्द, शैली और शिल्प ढूँढ ही लेती है।
'सृष्टि-सेतु' जाने-माने कवि स्व.भगीरथ काले की समकालीन एवं शाश्वत संदर्भों से जुड़ी रचनाओं का अनूठा संग्रह है। इसमें आपकी जीवनसंगिनी मंजू काले की ‘प्रतिहारी तुम’ एवं ‘15 अगस्त’ नामक रचनाएँ संग्रह में चार-चाँद लगाती हुई प्रतीत होती हैं।


श्री काले की रचनाएँ जीवन के अनेक आयामों से संबंधित हैं। कवि अपने परिवेश के प्रति सजग तथा उसके अस्तित्व के प्रति कृतज्ञता से भरे प्रतीत होते हैं। आपके लिए कविता भावों की अर्थपूर्ण अभिव्यक्ति के साथ मानवता के श्रेष्ठ प्रतिमानों की स्थापना का उपयोगी उपकरण है। संग्रह की अधिकांश रचनाओं की पृष्ठभूमि में पार्श्व संगीत की तरह मनुष्यता की पीड़ा और उसके अवसाद की अनुगूंज निरंतर सुनाई देती रहती है।

समीक्ष्य पुस्तक ‘सृष्टि-सेतु’ संग्रह की प्रथम रचना ‘देवभूमि’ प्रकृति के अनेक रंगों की आभा लिए हुए है-

वह निरभ्र आकाश
निर्भय मन का उल्लास
वे गगनचुंबी शिखर
हमारा परमात्म मिलन है
यह देवभूमि मानव जीवन में
कैवल्य क्रांति की
प्रणेता है
धन्य है वह देवभूमि।

 

‘जीवन प्रिय तुम प्राण न खोना’ संग्रह की विशिष्ट रचनाओं में एक है, जिसमें कवि ने मानवीय मूल्यों के विकास पर बल देते हुए अत्यन्त विचारणीय बात कही है-

धर्म कर्म जिसने न किया
जीवन में क्षण भर
व्यर्थ हुआ उसका जीवन
नर जीवन धर कर।


‘निराला’ संग्रह की बिल्कुल निराली रचना है, जिसमें कवि श्री काले ने महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ को कालपुरुष के मेरुदण्ड की संज्ञा दी है। निराला सच में निराले थे। राष्ट्रोत्थान के लिए ‘वीणावादिनी वर दे’ में व्याप्त उनके आर्तभाव हृदय को झंकृत कर देते हैं। तभी तो कवि श्री काले ने लिखा है-

पैदा कर लो सौ कवियों को
हो न सकेगा कभी निराला।


‘उन्नीस सौ बासठ’ शीर्षक रचना में भारत-चीन युद्ध की भयावहता भलीभाँति उजागर हुई है। ‘अरे चीनियों’ एक ओजस्वी रचना है, जिसमें कवि श्री काले दुश्मन के साथ 'शठे शाठ्यं समाचरेत’ के सिद्धांत को अपनाने की अपील करते हुए ईंट का जवाब पत्थर से देने का आह्वान करते हैं। कवि ने दया-धर्म की दुहाई देने वाले चीन के दोहरे चरित्र पर यहाँ करारा प्रहार किया है-

बुद्धा की तुम आँख फोड़ते
आये हो गुरुद्वारों में
अरे चीनियों हट जाओ तुम
मेरे सीमा-द्वारों से।


‘प्रजातांत्रिक या उद्धारक’ की अमुक पंक्तियाँ युगीन यथार्थ से टकराती-सी प्रतीत होती हैं। राजनेताओं की कथनी-करनी के बीच के विरोधाभास पर कटाक्ष करते हुए कवि कहते हैं-

कहते हो किसान नंगा है
भूखा खड़ा भिखारी
नन्हें बच्चे तरस रहे हैं
बिलख रही है नारी
टूटी झोपड़ियों की छत से
बूँदें टपक रही हैं
बाहर देखो धमक-धमककर
बिजली चमक रही है
पर प्रिय सत्यभाषी यदि तुम हो
तनिक तुम्हीं यह बोलो
अपने उर के अंदर देखो
खोलो और टटोलो।

रचना लयात्मक एवं सारगर्भित है, पर बिजली की चमक की ध्वन्यात्मकता के लिए यहाँ ‘धमक-धमक’ का प्रयोग उतना उपयुक्त नहीं लगता।

‘युवा’ शीर्षक रचना में कवि ने युवाओं के लक्षण विस्तारपूर्वक गिनाएँ हैं। उन्होंने युवा होने का अभिप्राय जोश, जज़्बा और ज़िन्दादिली से भरा हुआ बताया है। कवि के अनुसार युवा होने का अर्थ है सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ने वाला तथा सुअवसर का सदुपयोग करने वाला। 'सृष्टि-सेतु' शीर्षक कविता में समय के यथार्थ को चित्रित करती धूप की रेखाओं की प्रतीकात्मकता अद्भुत है-

कहीं धूप की रेखाएँ कुछ
कर कलाइयों से टिक-टिक
अहो समय क्या रूक जाओगे
बात बहुत ही करती दिक।

भोगवादी प्रवृत्ति ने मनुष्य को इतना स्वार्थी बना दिया है कि वह भौतिक सुख-स्वाद के लिए दूसरों के प्राण लेने में भी नहीं हिचकिचाता-

वसुधा पर तब नहीं कहीं था
इतना भोग और व्यापार।
प्राण नहीं लेते थे प्राणी
और नहीं था हाहाकार।


सैनिकों के अदम्य शौर्य का यशोगान करती कवयित्री मंजू काले की ‘प्रतिहारी तुम’ की पंक्तियाँ जीवन में साहस, सच्चाई और संयम के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं।

आज देश के प्रतिहारी तुम
धरती तुम्हें पुकारती।
जीवन में संयम से तुमको
आगे ही बढ़ते जाना है।
सत्य साहसी बनके पथ पर
तुमको आज विजय पाना है।
समर भूमि में डटे रहो तुम
धरती तुम्हें पुकारती।
पग-पग तेरा बढ़ता जाए
जयध्वनि तुम्हें पुकारती।


संग्रह की अन्य रचनाओं में स्वर्ग-नर्क, लाली-कुंकुम, आज देश जागा है, तृष्णा, गाँधीजी, तन का गहना और लौह पुरुष मन को खूब आकृष्ट करती हैं। मानवता, प्रकृति, अध्यात्म एवं राष्ट्रानुराग कवि के काव्य के प्रमुख विषय हैं। शब्द संयोजन, लयात्मक आरोह-अवरोह से आबद्ध है। इनके बिंब विलक्षण एवं विस्मयकारी हैं। कवि ने दुरुह प्रतीकों और अस्पष्ट बिम्बों से बचकर अपनी रचनाधर्मिता को बोझिल एवं विचारों से परे होने से बचाए रखा है।

श्री भगीरथ काले की 54 वर्ष पुरानी यत्र-तत्र बिखरी रचनाओं को सहेजकर पुस्तकीय स्वरूप प्रदान करने में आपकी पुत्री रचना उनियाल ने जो समर्पण भाव प्रदर्शित किया, वह प्रशंसनीय है। ‘सृष्टि-सेतु’ संग्रह की रचनाएँ प्रेम की सकारात्मकता को अक्षुण्ण बनाए रखने में सहायक सिद्ध होंगी, ऐसा मेरा विश्वास है।




समीक्ष्य पुस्तक- सृष्टि-सेतु (काव्य संग्रह)
रचनाकार- स्व.भगीरथ काले


- आचार्य बलवन्त
 
रचनाकार परिचय
आचार्य बलवन्त

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