प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जुलाई 2017
अंक -28

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

लघुकथा- 'ना' की मर्यादा


हर बार की तरह इस बार भी अकेले साइकिल उठाकर पेड़ों की कतारों के बीच से गुज़रती हुई वो विद्यालय जा रही थी। वह अकेले ही अक्सर साइकिल से अपनी राह तय किया करती थी।
बात कक्षा सात की है साइकिल से विद्यालय की दूरी कुछ अधिक थी। एक सुनसान इलाका भी रास्ते में आया करता था। वह विचारों में खोई हुई चली जा रही थी तभी अचानक दो लड़के उसका पीछा करने लगे। कभी वे आगे होते तो कभी पीछे। वह अंदर ही अंदर घबराने लगी पर बाहर से मजबूत बनती रही। एक एक पल बढ़ा-सा लग रहा था। बड़ी मुश्किल से विद्यालय पहुँची। किसी से कुछ कह पाने की हिम्मत उसमें नहीं थी।

दूसरे दिन भी रास्ते में वे ही लड़के मिले, जो कल उसका पीछा कर रहे थे। उसने इसकी कल्पना भी नहीं की थी कि वे लोग आज भी पीछा करेंगे। परिस्थितियों की श्रृंखलाओं से घिरी वही स्थिति जो कल थी, आज भी बिल्कुल वैसी ही थी। किससे कहे, न कहे, घरवालों को बताए तो विवाद बढ़ जाये। विद्यालय में उसके बारे में सब क्या सोचेंगे! डर भी बढ़ता जा रहा था। कुछ समझ नहीं आ रहा था। फिर मन ही मन निश्चय कर चुकी थी कि कल शिकायत अवश्य ही करेगी।

अगले दिन रास्ते में डर के साथ कि पता नहीं क्या होगा, वह घटना वाले रास्ते पर जा पहुँची। कभी दाएँ से आहट का अनुमान लगाती तो कभी बाएँ, पर कोई नहीं था। एक लम्बी साँस लेकर साइकिल तेजी से बढ़ाई और विद्यालय जाकर रुकी। मन ही मन मुस्कुरा रही थी जैसे कोई जंग जीत ली हो।
आज सोचती है तो लगता है वो दौर अलग था, जो प्रतिक्रया नहीं मिलने पर पीछा करना छोड़ देता था। आज का समय होता तो न जाने क्या हो जाता!!





लघुकथा- श्रृंगार


आज विनीता आईने में निहारते हुए शर्मा रही थी। लाल रंग की साड़ी, धुले मुलायम बाल उसकी रंगत को निखार रहे थे। बार-बार कोमल-सी मुस्कान उसके चेहरे पर आ जाती। खिड़की से कई बार बाहर झांकती हुई कुछ ढूंढ़ती हुई उसकी कजरारी निगाहें, फिर वापस आकर काम में लग जाती। स्नेह का गुबार जो हृदय को विचलित कर रहा था। समय कटने का नाम नहीं ले रहा था। घड़ी की सुईयाँ स्थायी प्रतीत हो रही थीं और घड़ी की आवाज़ हृदय की धड़कन को बढ़ा देती। बड़े दिनों बाद सज-धज कर तैयार हुई थी। हर दिन तो बड़ी गम्भीर कठोर-सी दिखने वाली, मुस्कानहीन, श्रृंगारहीन, फ़िर आज क्या खास है! पड़ोसी भी हैरान थे, सोचा कोई खास दिन होगा।

आखिर वो पल भी आ ही गया, जिसका प्रति पल इंतज़ार था। जैसे ही दरवाज़े की आहट हुई, वैसे ही उसने प्रेममयी भावनाओं की गागर फौज से अवकाश लेकर आये पति आशीष के ऊपर उंडेल दीं। जो भावनाएँ महीनों से हिम शिलाएँ बन गयी थीं, वे भी पिघलने लगीं।


- डॉ.रुपाली भारद्वाज
 
रचनाकार परिचय
डॉ.रुपाली भारद्वाज

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