प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जुलाई 2017
अंक -30

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत-गंगा

गीत- हतप्राण मन

मृत हुई आस के चर्म से जो बनीं,
उत्सवों में बजायी गयीं ढोलकें।
हत हुई प्यास के मर्म से भी घनी,
ज्यों शवों पर नचायी गयीं ढोलकें।।

खोखले वृक्ष के तन से लिपटी रहीं।
जब कटे वन तो आहों से चिपटी रहीं।
कीर्ति में जब अहेरी के गायन हुआ,
युद्ध में ज्यों जलायी गयीं ढोलकें।
हत हुई प्यास के मर्म से भी घनी,
ज्यों शवों पर नचायी गयीं ढोलकें।।

ये रूदन ये नयन ये शयन जागरण।
वो हवन वो मरण वो चयन वो शमन।
जब विरह की कथा हुई व्यथा,
श्याम की वंशियों पर सजायी गयीं ढोलकें।
हत हुई प्यास के मर्म से भी घनी,
ज्यों शवों पर नचायी गयीं ढोलकें।।

थी सुधा मुग्ध जब रास में राधिका।
रूप में चंद्रमा प्रेम रवि लालिमा।
डूबते चिरमिलन खो चुके लास्य पर,
त्राहिमम आज़मायी गयीं ढोलकें।
हत हुई प्यास के मर्म से भी घनी,
ज्यों शवों पर नचायी गयीं ढोलकें।।

विश्व का एक सिद्धान्त है, रस्म है।
मारकर भी नहीं छोड़ता भस्म है।
मृग तड़पकर मृगी की त्वचाधुन सुने,
हर्ष को यूँ बनायी गयीं ढोलकें।
हत हुई प्यास के मर्म से भी घनी,
ज्यों शवों पर नचायी गयीं ढोलकें।।

ये जो मरती हुई आत्म की आह है।
ये जो ढलते हुए सूर्य-सी चाह है।
मर चुकी देह में आस भी प्यास भी,
भग्न हृद के लिये ढायी गयीं ढोलकें।
हत हुई प्यास के मर्म से भी घनी,
ज्यों शवों पर नचायी गयीं ढोलकें।।

ढोल-सा ही तो है ये बदन, चर्म का।
मृत हुए प्रेम का, आत्म का, मर्म का।
साँस चल तो रही किन्तु हतप्राण मन,
बस तितिक्षावरत पायी गयीं ढोलकें।
हत हुई प्यास के मर्म से भी घनी,
ज्यों शवों पर नचायी गयीं ढोलकें।।


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गीत- क्या होता!

​​ना मिलना इतना मधुर मदिर
हम मिल जाते तो क्या होता!
ये हृदय सुवासित शुष्क विरह
द्रुम खिल जाते तो क्या होता!

किंभूत वेदना रस भरती
किंजल्क करूण विष ये हरती
आलिंद सुमन मकरंद गंध
हिलमिल जाते तो क्या होता!

अब थाम लो वल्गा लो जीवन
रह रह कहता एकांत भ्रमण
सुधियों में विचरते प्राण पथिक
झिलमिल गाते तो क्या होता!

ये मधुर विरह आनंद मदिर
दुख करूण वेदना शुष्क अधर
जीवन मरीचिका में भटके
हिय पंथी पंछी मूक बधिर
सुरलय रव गति यति तोय सुधा
उर्मिल गाते तो क्या होता!


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गीतिका- जेठ जिंदगी

मन के वन को जेठ जिंदगी, सावन बादल तुम साजन।
थकते तन को मरुथल-सा जग, मनभावन जल तुम साजन।

पाँव के नीचे तपी रेत पर, छलके गाँव सभी नाते।
कड़ी धूप में हरा भरा-सा, शीतल अंचल तुम साजन।

आशाओं के शाम सवेरे, दुपहर ढलकी उम्मीदें।
निशा भोर से पंछी कलरव, चंचल-चंचल तुम साजन।

'सुधा' परिस्थियों के काँटे, नागफनी के दंश समय।
हरे घाव पर चंदन हल्दी, रेशम मलमल तुम साजन।

डरे-डरे दो नयन अँधेरों से रस्मों से घबराये।
स्मित अधर सरल आलिंगन, मंचल मनचल तुम साजन।

इक टक लक्ष्यबेध शर लेकर, मैं भूली कर्तव्य सभी।
मेरी सफलता पर खुशियों के, नयना छल छल तुम साजन।


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गीतिका- वालिद के हाथों में ख़ंजर

सोच के देखो जला गाँव घर कैसा लगता है,
मरता नहीं परिन्दा बेपर कैसा लगता है।

जिनको कोई डरा नहीं पाया वो ही राही,
मार दिये गये मंज़िल पर डर कैसा लगता है।

आदमखोर छिपे बस्ती में, अपने अपने घर,
काँप रहे अपनों से थर-थर कैसा लगता है।

अभी शाम को ही तो कंघी चोटी कर भेजी,
नुची हुयी बच्ची का जंफर कैसा लगता है।

इश्क़, मुहब्बत, प्यार, वफ़ा की लाश पेड़ पर थी,
श्यामी का फाँसी लटका वर कैसा लगता है।

चुन-चुन कर सामान बाँधकर रो-रो विदा किया,
जली डोलियों पर वो जेवर कैसा लगता है।

बाबुल का सपना थी वो इक माँ की चुनरी थी,
शबे-तख़्त हैवान वो शौहर कैसा लगता है।

छोटे बच्चे आये बचाने माँ जब घायल थी,
वालिद के हाथों में खंज़र कैसा लगता है।

'सुधा' कहानी कब थी उसकी सुनी-गुनी-जानी,
हुआ बे-क़फन ज़िस्म वो मंज़र कैसा लगता है।


- सुधा राजे
 
रचनाकार परिचय
सुधा राजे

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गीत-गंगा (1)