प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जुलाई 2017
अंक -32

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत-गंगा

गीत- क्या कमी रह गई थी मेरे प्यार में

क्या कमी रह गई थी मेरे प्यार में,
बिन बताए अचानक गए छोड़कर।

सात जन्मों का रिश्ता बहुत दूर था,
साथ में एक पल भी बिताया नहीं।
हर ज़ुबां पे बसे गीत मेरे प्रिये,
जाने क्यों आपने गुनगुनाया नहीं।
दूर हो जाएँगे ग़म सभी आपके,
इक दफ़ा देखिए मुझसे दिल जोड़कर।
क्या कमी रह गई थी मेरे प्यार में,
बिन बताए अचानक गए छोड़कर।।

दिल में जो बात थी आप कहते अगर,
मैं नहीं मानता तो कोई बात थी।
भूल पाता नहीं साथ बीते वो पल,
क्या बताऊँ वो कितनी हँसी रात थी।
आपके ख़त ने फिर मुझको महका दिया,
जो रखा था सिरहाने कभी मोड़कर।
क्या कमी रह गई थी मेरे प्यार में,
बिन बताए अचानक गए छोड़कर।।

खैरियत मैंने पूछी हरेक शख्स से,
जाने क्यों मुझसे जलने लगे हैं सभी।
जब बुलाता कोई दौड़कर मैं गया,
पर मेरे ज़ख्म ना कोई देखा कभी।
आप संयम रखें अपने मन पर ज़रा,
मोती मिल जायेगा देखिए खोजकर।
क्या कमी रह गई थी मेरे प्यार में,
बिन बताए अचानक गए छोड़कर।।


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गीत- चलो प्यार से नाता जोड़ें

चलो प्यार से नाता जोड़ें
जो रिश्ता जितना कड़वा हो,
उतनी मिश्री घोलें।

जब जीवन में ख़ुशी मिलेगी,
तो तुम मत इतराना।
और मिलेगा दर्द तुम्हें फिर,
उससे मत घबराना।
मन भारी गर लगे कभी तो,
आओ थोड़ा रो लें।
चलो प्यार से नाता जोड़ें।।

इस जीवन का नहीं ठिकाना,
कब पंछी उड़ जाए।
काम करो ऐसा कि मन ये,
कभी नहीं पछताए।
माँ की गोद न मिले दुबारा,
आओ थोड़ा सो लें।
चलो प्यार से नाता जोड़ें।।

पाप पुण्य सब यहीं भरा है,
जो चाहो सो ले लो।
फूल-ख़ार सब यहीं मिलेंगें,
जिससे चाहो खेलो।
दिल के दाग़ नहीं मिटते हैं,
आओ मन को धो लें।
चलो प्यार से नाता जोड़ें।।

धन तो बहुत कमाया लेकिन,
त्याग भाव नहीं आया।
सोचो इस नश्वर जीवन में,
किसको गले लगाया।
दाने दाने को तरसें जो,
आओ उनका हो लें।
चलो प्यार से नाता जोड़ें।।


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गीत- बोलो गले लगाऊँ कैसे

झूठे ख्वाब दिखाऊँ कैसे,
दिल को मैं समझाऊँ कैसे!
तुम इतने जो दूर खड़े हो,
बोलो गले लगाऊँ कैसे!

आज हुई है मन में हलचल,
छोड़ मुझे अवसाद गया है।
बिन बारिश मैं भीग गया हूँ,
शायद तुमने याद किया है।
तुम बिन खाली-खाली लगता,
बोलो तुमको पाऊँ कैसे!
झूठे ख्वाब दिखाऊँ कैसे!

मन के मोती बिखर गए हैं,
आओ उनको मिलकर जोड़ें।
जो रस्ते से भटक गया है,
मिलकर उसके रस्ते मोड़ें।
जीवन बिल्कुल उलझ गया है,
बिन तेरे सुलझाऊँ कैसे!
झूठे ख्वाब दिखाऊँ कैसे!

बैरी मौसम बहुत सताए,
हर पल नज़रों में तुम छाए।
कैसे बंद करूँ नयनों को,
हर पल लगता है तुम आए।
मेरे मन में तुम ही तुम हो,
ये विश्वास दिलाऊँ कैसे!
झूठे ख्वाब दिखाऊँ कैसे!

अगणित बैर लिए फिरते तुम,
प्यार तुम्हें क्यूँ रास न आया।
काँटों से है काटी रोटी,
रंग नहीं क्यूँ तुमको भाया।
तोड़ी सब कंदीले तुमने,
तम है घना मिटाऊँ कैसे!
झूठे ख्वाब दिखाऊँ कैसे!


- राकेश नाज़ुक
 
रचनाकार परिचय
राकेश नाज़ुक

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गीत-गंगा (1)