प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जुलाई 2017
अंक -32

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

बाल-सुलभ इच्छाओं से नहीं चलती है दुनिया

बाल-सुलभ इच्छाओं से नहीं चलती है दुनिया
नहीं चलती है ज़िंदगी
नहीं चलता समाज
नहीं चलता देश

अगर आप देखना चाहें तमाम फूल रंग-बिरंगे
और देखते ही रहना चाहें उन्हें घंटे दर घंटे
और चाहें कि आपकी नज़र में ही न पड़े
कोई धूसर गंदी और बदबूदार वस्तु
तो इसे बाल-सुलभ इच्छा ही माना जाएगा

अगर आप बगैर खाने-पीने की चिंता किए
लगातार देखते ही रहना चाहें
छायादार वृक्ष, कोमल हरी पत्तियां, घास के मैदान
रंग-बिरंगी तितलियां
और फुदकते हुए खरगोश
तो हो सकता है कि लोग आप पर हँसे और
इसे भी बाल-सुलभ इच्छा ही माना जाएगा

अगर आप खेलना चाहें
कबूतर से, तोते से,
खरगोश से, हिरण शावक से
तो इसे भी बाल-सुलभ इच्छा ही माना जाएगा

अगर आप चाहें कि
तमाम सारे खिलौने बिखेर दें कमरे भर में
और उनसे दोस्ती कर भूल जाएं सब कुछ
तो इसे भी बाल-सुलभ इच्छा माना जाएगा

अगर आप पढ़ना न चाहें
खून, हत्या, बलात्कार और अपहरण
तो यह भी बाल-सुलभ इच्छा के ही अंतर्गत आएगा

वह आदमी जो बैठा था आपके पास
चाय पीता हुआ
आप चाहें कि वह और आप इसी तरह
ज़िंदगी भर पीते रहें चाय रोज़-रोज़
लुटाते रहें आत्मीयता एक-दूसरे पर
तो इसे बाल-सुलभ इच्छा ही माना जाएगा

वह जो आया है परदेश से
उसे आप बगैर किसी शक के बगैर डरे
अपने घर ले जाना चाहें भोजन पर
तो इसे बाल-सुलभ इच्छा ही माना जाएगा

अगर आप सब कुछ को भूल
डूब जाना चाहें प्रेयसी की बाँहों में
तो इसे भी बाल-सुलभ इच्छा ही माना जाएगा

क्या ऐसा नहीं हो सकता
कोई एक आकर कहे
चलो यार, ऐसी ही इच्छाओं से चलाई जाए दुनिया
और सबके सब तैयार हो जाएं झटपट


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निवेदन

बहुत तेजी से सूखता जा रहा
आँखों का पानी

निवेदन है कि इसे
सूचना क्रांति के इस युग में
महज़ एक सूचना की तरह न लिया जाए

हो सकता है कि
कल यह एक प्रागैतिहासिक तथ्य बन जाए
या कि किंवदंती
जैसे कि सतयुग में कभी मौजूद थी
अन्तःसलिला सरस्वती

या फिर हो सकता है कि
ज्ञात इतिहास के ही सैंकड़ों साल पीछे के
एक तथ्य की तरह
हो उसकी चर्चा
जैसे कि राजा हर्ष के काल में
लोग नहीं लगाते थे घरों में ताले

कुछ है
भयावह कल्पनातीत
जे लगातार देता है दस्तक
दहलीज पर


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काल्पनिक दुनिया

क्या ऐसा नहीं हो सकता
हम सुबह उठें तो पाएँ कि
अखबार से हिंसा की ख़बरें ग़ायब हों

टी.वी. चैनल बता रहे हों ब्रेकिंग न्यूज़
कि समाज अब अहिंसक
और मानवीय हो गया है

कि एक लड़की सुरक्षित है
कहीं और कभी भी जाए
कि अब लड़की खाप पंचायत से भी
बेखौफ होकर कर सकेगी
अपनी पसंद के लड़के से प्रेम

कितना अच्छा हो
भुखमरी एक प्रागैतिहासिक घटना बन जाए

कितना अच्छा लगता है
काल्पनिक दुनिया का निर्माण


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हाँं, बचा ले आया हूँ

हाँं, बचा ले आया हूँ
थोड़े-से पूजा के फूल
थोड़ी-सी धरती
थोड़ा-सा आकाश
एक छोटी-सी पगडंडी
तुम्हारे लिए

हाँं, बचा ले आया हूँ
थोड़ी-सी गर्मी
थोड़ी-सी सर्दी
थोड़ी-सी बारिश
तुम्हारे लिए

हाँं, बचा ले आया हूँ
खुशियों के थोड़े से कबूतर
और हंस

हाँं, यह भी
होठों की थरथराहट
और आखों में नमी
घास की पत्ती में ओस की मानिंद

यह भी बचा ले आया हूँ
तुम्हारे लिए


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गौरैया

बढ़ता जा रहा है
पालतू पशु-पक्षिओं का बाज़ार
सबके ड्राइंग रूम में बढ़ती जा रही
प्लास्टिक और मिट्टी की रंग-बिरंगी
चिड़ियों की तादाद

पर ग़ायब होती जा रही गौरैया
हमारी आपकी जिंदगी से

हो सकता है आने वाली पीढ़ियाँ
न देख पाएं गौरैया को
तब बच्चों को बताया जाएगा
कभी एक चिड़िया होती थी गौरैया
भूरी-सफेद
बिखेरती रहती थी आँगन और छत में
ढेर सारा संगीत

हो सकता है फिर काफी दिनों तक
बच्चे पढ़ें
उसके बारे में पाठ्यपुस्तकों में
और फिर वहाँ से भी ग़ायब हो जाएगी
वह एक दिन

और शब्दकोश या इतिहासकोश
भर में सिमट जाएगी

जब हम कभी अकेले पाएंगे खुद को
बेहद अकेले
किसी बियाबान चैराहे पर
और नहीं सूझेगा कोई रास्ता अंधेरे में
तब हम पलटेंगे
इतिहासकोश के पन्नों को


- विकास द्विवेदी
 
रचनाकार परिचय
विकास द्विवेदी

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कविता-कानन (1)