प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2015
अंक -43

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

चिट्ठी-पत्री

आज़र ख़ान (शोधार्थी, हिंदी विभाग ,अलीगढ़ मुस्लिम विस्वविद्यालय, अलीगढ़) - 'हस्ताक्षर' पत्रिका के तीन अंक सफलता पूर्वक निकल चुके हैं इसके लिए हस्ताक्षर परिवार को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं। जिस मेहनत और लगन से पत्रिका की पूरी टीम काम रही है उसी तरह करती रही तो पत्रिका एक दिन अवश्य ही बुलंदियों पर पहुंचेगी। इंटरनेट पत्रिकाओं का जितना विस्तार क्षेत्र होता है उतना मुद्रित पत्रिकाओं का नहीं हो पाता। इंटरनेट पत्रिकाओं के माध्यम से हमारी बात, हमारे सन्देश को पूरे विश्व में फैलाया जा सकता है। आज के इंटरनेट के युग में नई पीढ़ी इंटरनेट पर अपना समय ज़्यादा दे रही है उनके लिए ये वेब पत्रिकाएं वरदान साबित हो सकती हैं। साहित्य और साहित्य से इतर लोग भी इन पत्रिकाओं को घर बैठे, रास्ते पर चलते हुए, सफर करते हुए पढ़ सकते हैं और किसी भी बात के पक्ष या विपक्ष में अपनी बात भी रख सकते हैं।
जहाँ तक 'हस्ताक्षर' पत्रिका की बात है तो इसके तीन अंक सफलतापूर्वक इंटरनेट पर प्रकाशित हो चुके हैं। यह नई पत्रिका कई स्तंभों में बंटी है जिसमें सम्पादकीय, कविता-कानन, ग़ज़ल-गाँव, गीत-गंगा, कथा-कुसुम, आलेख/विमर्श, छंद-संसार, जो दिल कहे, ख़ास-मुलाक़ात, स्मृति, मूल्यांकन, जन-मत, चिट्ठी-पत्री, ख़बरनामा आदि को देखा और पढ़ा। इसमें नए और पुराने लेखकों, कवियों, शायरों और आलोचकों की रचनाओं से काफी प्रभावित हुआ और अंदर ही अंदर एक उत्साह भी बढ़ा इन लेखकों जैसा बनने का, कुछ करने का। करीम पठान अनमोल जी का मैं ह्रदय से आभारी रहूँगा जिन्होंने मुझे 'हस्ताक्षर' पत्रिका से जोड़ा और इतने कम समय में हमे कुछ सीखने के लिए प्रोत्साहित किया। पत्रिका मंडल के साथ सहकर लेखकों, कवियों आदि की भावनाओं से जुड़ा और सहृदय को पहचाना, समाज के शोषित-पीड़ित वर्ग को जाना। इस पत्रिका के माध्यम से समाज का हर तबका भेदभाव भुलाकर आपस में जुड़े यही आशा करते हैं।



यासीन अहमद (शोधार्थी, हिंदी विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ) - ‘हस्ताक्षर’ पत्रिका के बारे में जानकारी आज़र भाई से मिली। मैंने इसको पढ़ा, पढ़ने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि ये वेब पत्रिका नए रचनाकारों को एक मंच उपलब्ध करवाती है तथा साथ ही प्रतिष्ठित रचनाकारों, कवियों की रचनाओं से नए रचनाकार प्रेरणा ग्रहण करते हैं। पत्रिका में छपे लेख कवितायेँ ग़ज़ल आदि ने बहुत प्रभावित किया। पत्रिका टीम को बहुत बहुत बधाई।


नीलोफ़र उस्मानी (शोधार्थी, हिन्दी विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़)- हस्ताक्षर मई, 2015 का अंक-3 पढ़ा। इस छोटी-सी ई-पत्रिका में साहित्य की सभी महत्त्वपूर्ण विधाओं जैसे कविता, ग़ज़ल, गीत, कहानी, आलेख, साक्षात्कार, पुस्तक-समीक्षा, बाल-कहानी एवं पत्र-लेखन का समाहार किया गया है। प्रीति अज्ञात जी का सम्पादकीय लेख ‘उम्मीद की लौ’ बहुत ही मर्मस्पर्शी और यथार्थता को उजागर करने वाला है। इस लेख की यह पंक्ति "यहाँ आगे बढ़ने के लिए मात्र प्रतिभा नहीं जुगाडू प्रथा में पारंगत होना भी पहली शर्त है" मुझे बहुत पसंद आयी, जो आधुनिकयुग की मुख्य विडंबना को प्रदर्शित कर रही है। आज जहाँ प्रत्येक कवि अपने भावों और विचारों को मुक्त छंद में अभिव्यक्त कर रहा है, वहीं सत्यवान सौरभ और नवीन गौतम का दोहे और घनाक्षरी जैसे छंद में सृजन करना सराहनीय कार्य है। डाॅ. शशांक शुक्ल का आलेख ‘साहित्य में कथानक का प्रश्न’ ज्ञानवर्धक है। रोनी ईनोफाइल ने बिटिया के नाम एक पत्र के माध्यम से सम्पूर्ण मानव जाति को संदेश दिया है। यह बहुत ही रूचिकर और व्यंग्यात्मक पत्र है। हिन्दी-साहित्य के जगत में हस्ताक्षर जैसी ई-पत्रिका का निकलना हिन्दी की समृद्धि और विकास के क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण कदम है, इसके लिए हस्ताक्षर की पूरी टीम को बधाई। मैं पत्रिका के उज्ज्वल भविष्य की कामना करती हूँ।


अर्शिया रसूल (शोधार्थी, हिंदी विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़)- हस्ताक्षर पत्रिका का मई 2015 अंक 3 प्राप्त हुआ। अंक में जितने भी रचनाकारों की रचनाएॅ शामिल की गई है, सभी अपने साहित्य के द्वारा समाज के प्रति अपने योगदान को दर्शा रहीं हैं। सभी कविता, कहानी, ग़ज़ल, आलेख , साक्षात्कार प्रेरित एवं प्रभावित करती हैं और किसी न किसी दृष्टिकोण से हमें बहुत-सी ग़लतियों को सुधारने का मौका प्रदान करती हैं। ‘मालकिन‘ कहानी के माध्यम से सेराज अहमद ने आज की युवा पीढी़ की मानसिकग्रसता, अलगाव, दुर्व्यवहार को चित्रित किया है, किस तरह वे अपने माँ-बाप जैसे पवित्र रिश्ते की कद्र नहीं करते, उनके साथ अपमानजनक व्यवहार करते हैं। रोनी इनोफाइल की कविता ‘शीतल स्पर्श’ को पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि कवि ने माँ के प्यार का, उसके एहसास, अपनापन का वर्णन किया है। माँ शब्द इतना विशाल है कि यह शब्द ही अपने आप में सम्पूर्ण कविता है। प्रीति 'अज्ञात' जी का संपादकीय लेख ‘उम्मीद की लौ‘ में समाज के मौजूदा हालात को बयान किया है, उन्होंने बताया कि गुनहगार सिर्फ वो नहीं हैं जो अपना ईमान बेचकर उन्नति कर रहे हैं बल्कि उससे ज़्यादा कमी उन लोगों में है जो सब जानते हुए इन कामों को अंजाम दे रहें हैं।
सभी रचनकारों को इतनी बेहतरीन रचनाओं को पाठकों के समक्ष रखने के लिए बधाई। पत्रिका में मौलिक रचनाओं के साथ-साथ शोध-पत्रों का भी समावेश होना चाहिए, उम्मीद है संपादक इस विषय पर विचार करेंगे।


- सुरेन बिश्नोई