जून 2017
अंक - 27 | कुल अंक - 56
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

ब्रज कूँ होरी की सौगात (ब्रज में होली की सौगात): नटवर लाल जोशी


जैसों रस बरसाने बरसै
सो रस बैकुंठहु मैं नाँहि।
सुर तैतीसन की मति बौरी
तजकें चले सुरग की पौरी
देख-देख या ब्रज की होरी
ब्रह्मा मन पछताँहि।।

ब्रज भाषा का काव्य साहित्य इतना विशद् है कि इसका पूर्ण परिचय देना विशेषज्ञों के लिए भी दुःसाध्य है खड़ी बोली की कविता के विकास और प्रचार के साथ ब्रज-माधुरी के प्रेमियों की संख्या का कम होते जाना खेद की बात है। कारण यह है कि ब्रज क्षेत्र के बाहर के पाठकों के लिए ब्रज कठिन प्रतीत होने लगी है। वे तभी इसका परिचय प्राप्त कर सकते हैं जब उन्हें मालूम हो कि ब्रज भाषा कितने अनमोल रत्नों की खान है। सम्पूर्ण ब्रज के ज्ञान व साहित्य का वर्णन करना असंभव सा प्रतीत होता है अतः हम यहाँ ब्रज के फाग यानी ब्रज की होरी का वर्णन कर रहे हैं।

घरि-घरि आनन्द करि, जीवन जानि असार ।
खाई खेलि हंसि लीजिए, फाग बड़ौ त्यौहार ।। -सूरदास


यहाँ पर फाग साहित्य और कृष्ण-भक्ति साहित्य के पारस्परिक सम्बन्ध को प्रकाश में लाने का प्रयास किया है। बसंत ऋतु सभी ऋतुओं में श्रेष्ठ है इसलिए इसे ऋतुराज कहा जाता है। प्रकृति बसन्त ऋतु के आते ही नूतन श्रृंगार करने लगती है। शीतल, मन्द, सुगन्धित समीर प्रवाहित होने लगती है। पुष्प मकरन्द और आम्र मंजरी चतुर्दिशाओं को सुगंधित कर देती है। इस ऋतु में अनेक उत्सव मनाये जाते हैं जैसे- मदनोत्सव, वसन्तोत्सव, होलिकोत्सव ब्रज में बसन्तोत्सव का अपना महत्व है, यह माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाता है। बसंत पंचमी के दिन ब्रज में होली का डांडा गढ़ जाता है और ब्रज में होली की धूम मचना शुरू हो जाती है।
फागोत्सव से यहां के लोगों में एक नई उमंग देखने को मिलती है। गांव-गांव में ढप, ढोल, मंजीरे और नगाड़ों की थाप सुनाई देने लगती है।
होली के रसियों की मधुर गूंज पूरे ब्रज को गुजांय मान करती रहती है। ब्रज के नर नारी खेतों में काम करते हुए और रात भर होली के रसिया गाते हुए हर पल आनन्दित रहते हैं। ब्रज वनिताएँ रात्रि पर्यन्त नगाड़े तथा ढोलक की थाप पर नृत्य करती रहती हैं। ब्रज में फागोत्सव बसंत पंचमी से प्रारंभ होता है जो फागुन और सारे चैत्र के महीने में चलता रहता है। फाग के बसन्त ऋतु में आने से इसका सौन्दर्य दोगुना हो जाता है। यह ऋतु जन सामान्य में नये उत्साह और उमंग का संचार करती है। ब्रज के फाग का वर्णन ब्रज भाषा के काव्य में, लोक में बड़े ही मनोयोग से किया गया है।


फाग और होली के सम्बन्ध में ब्रज भाषा का विशाल साहित्य उपलब्ध है। जो भक्तिकालीन ‘‘पद’’ और रीतिकालीन ‘‘छन्द’’ दोनों प्रकार की शैलियों में रचा गया है। यों तो होली पर्व की गणना देश के प्रमुख उत्सवों में की जाती है। लेकिन ब्रजभूमि के उत्सवों में इसका स्थान सर्वोपरि है। यही कारण है कि ब्रज भाषा के कवि व साहित्यकारों ने इसका इसका वर्णन बड़ी उमंग और उत्साह के साथ किया है।
फाग अर्थात् होली में गायन, वादन, नृत्य आदि विविध कलाओं के सर्वत्र प्रदर्शन होते रहते हैं। इसके अतिरिक्त रंग बिरंगी गुलाल, अबीर और पिचकारियों की धूम-धाम से ब्रज भूमि सराबोर हो जाती है। होली में समस्त नर नारी लोक लाज को उठा कर ताक पर रख देते हैं, और कहीं कहीं तो आनन्द में मर्यादा का भी उल्लघंन कर बैठते हैं। विधि निषेध की ब्रज में एक कहावत है कि -
फागुन में जेठ कहे भाभी

फाग का प्रधान विषय परम्परा से गोपी-कृष्ण, देवर-भाभी और राधा कृष्ण का होली खेलना ही रहा है। जिसमें अबीर गुलाल और रंग-पिचकारी का विशेष रूप से उल्लेख होता है। जैसे-

आज विरज में होरी रे रसिया
होरी रे रसिया बरजोरी रे रसिया।
उड़त गुलाल लाल भयै बादर
मारत भरि भरि झोरी रे रसिया।।

ब्रज में होली के अवसर पर ‘होली और रसिया’ गीतों का चोली-दामन का साथ होता है। संभवत: ध्रुवपद की शैली का लोग प्रचलित रूप ‘रसिया’ ग्रामीण मुक्तक होने के साथ ही मूलत: संयोग श्रृंगार का लोक गीत है। होली वस्तुत: फसल का त्योहार होने के कारण उत्साह और उमंग का पर्व है, अत: इस अवसर पर गाये जाने वाले गीतों में एक विशेष प्रकार की मादकता रहती है। इस प्रकार होली, फाग और रसिया गीतों का कोई भी विषय हो सकता है, जिसमें ब्रज वासी होली और रसिया के रस में सिक्त होकर मदमस्त हो जाते हैं।


फाग का अर्थ, स्वरूप और क्षेत्र –
कालिका प्रसाद द्वारा सम्पादित वृहत हिन्दी कोष के अनुसार -‘‘फागुन में होने वाला राग रंग होली तथा फागुन में गाये जाने वाला गीत’’।
फाग का अर्थ फागुन मास से लगाया जाता है, और फागुन मास में पूर्णिमा के दिन होली का पर्व बड़ी ही धूम धाम से मनाया जाता है। इस प्रकार फागुन या फाग का दूसरा नाम होली या होरी है। फाग के अन्तर्गत रंगीली होली, रसिया और नृत्य तीनों रूपों को समाहित किया गया है। अतः फाग का शाब्दिक अर्थ होली, रसिया और नृत्य है। इस प्रकार बसन्त पंचमी से लेकर फागुन और होली में गाये जाने वाले समस्त गीत ‘‘फाग’’ कहलाते है।
ब्रज साहित्य का सबसे सजीला स्वरूप यहां की होली में मिलता है ब्रज की होली में वसन्त की महक और फागुन की मस्ती का रसीला वातावरण ऐसा रूप धारण कर लेता है कि ढप, ढोल, चंग, नगाड़े सब साज, सज कर जनमानस की उमंग के साथ बजने लगते हैं, और सब गा उठते हैं।

हरि संग खेलत फागु चलीं।
चोबा, चन्दन, अरू अरगजा, छिरकत नगर गली। हरि ...
रात ही पीरी अंगिया पहरी, नवतन झूमक सारी
मुख तमोल नैनन भरि काजर, देहि, भावती गारी
रितु वसन्त आगम रति नायक जीवन भार भरी
देखत रूप मदन मौहन को नन्द के द्वार खरी। -सूर

 

फाग का स्वरूप-
ब्रज के फाग साहित्य और इसके  होली पर्व का जितना वर्णन किया जाये कम ही प्रतीत होगा इसका कारण इसकी विशालता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार चैत्र मास वर्ष का प्रथम मास होता है। इसी माह की प्रतिपदा को होली का धूलेण्डी त्यौहार मनाया जाता है। घूलेण्डी के दिन रंग और गुलाल सर्वत्र पृथ्वी से आकाश तक उड़ता हुआ दिखाई पड़ता है। नर-नारी वृद्ध और बच्चे सभी रंग की मस्ती में झूम झूम कर एक दूसरे पर रंग छिड़कते हैं, पिचकारी से रंगों की बौछारें लगाते हैं। चिकने चुपड़े गालों पर लाल, हरे, नीले, पीले और तो और काले रंग का भी लेप चढ़ा देते हैं, और कहते हैं ‘‘बुरा ना मानो होली है’’। अब ऐसे में कौन मानेगा और जो बुरा मानेगा वो अपनी दुर्गति ही करायेगा।
होलिका दहन  का पर्व फागुन मास के अन्तिम दिवस अर्थात् पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन गांव, मोहल्ले और सड़कों के चौराहों पर लकडी काट कटम्बर आदि एकत्रित कर के सांय के समय इसमें अग्नि प्रज्ज्वलित की जाती है। इस समय सभी बाल, वृद्ध, और गोपाल एकत्रित होते है। उनके हाथ में बांस से बंधी गेहूं की बालियां होती है। प्रज्जवलित अग्नि की परिक्रमा करते है। गेहूँ, जौ की बालियों को भून कर सभी उनका प्रसाद लेते है। सभी अपने बैर भाव भूलकर गले मिलते हैं।
होलिकोत्सव का वर्णन भविष्य पुराण में भी मिलता है।

अयं पंचदशी शुक्ला फाल्गुणस्य नराधिय ।
शीत कालान्त सम्प्राप्तो प्रातर्मधु भविष्यति ।
अभयं सर्वलोकानाम् दीयतां पुरूषों तम ।
यथा ह्राशंकिता लोका रमंति च हसंति च ।
नाना रंग मयैवस्त्रैः चंदना गुरू मिश्रिर्तेः ।
अबीर गुलाल चमुखे ताम्बुल भक्षणम ।।

अर्थात् राजन शीतकाल का अन्त है, फागुन पूर्णिमा के पश्चात मधुमास होगा , सभी को अभय दीजिए जिससे ये निर्भीक होकर हंसे और खेलें। रंग बिरंगे वस्त्र पहनकर चन्दन अबीर और गुलाल लगाकर पान चबाते हुए एक दूसरे पर रंग डालने के लिए पिचकारियाँ लेकर निकलें, एक दूसरे को गालियां देकर हंसे स्त्रियां नृत्य करें। जिसके मन में जो आये कहें ऐसे शब्दों से तथा हवन से ये पापिनी (होलिका) नष्ट हो जाती है।


फाग यानि होली हुडदंग और मस्ती का त्यौहार है। होली के संदर्भ में कहा जाता है कि होलिका प्रहलाद के पिता हिरण्यकश्यप की बहिन थी। होलिका को वरदान था कि वह किसी को अपनी गोद में लेकर अग्नि की ज्वाला में बैठेगी तो गोदी में   बैठने वाला जलकर भष्म हो जायेगा परन्तु होलिका नहीं जलेगी इस वरदान का सहारा लेकर हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र भक्तप्रहलाद से छुटकारा पाना चाहा प्रहलाद का अपराध ये था कि वह पिता के शत्रु परमेश्वर का जाप करता था जो हिरण्यकश्यप को असह्य था। इस संदर्भ में राधा गोविन्द पाठक की पक्तियां याद आती है-

जब हिरण्याकश्यप कोपकियौ, हरि नाम की बात अवाक सी है गई
लखि कौतुक रौस भयो सुतको बनिके सब बात कटाक्ष सी रह गई
री भगिनि जाई जारि पजारि दे बोली वो भैया खुराक सी है गई।
जो प्रहलाद जरावन आई सौ, ऐसी जरि जर राखि सी है गई।

होलिका की गोद में प्रहलाद को बैठाकर लकडियां चिनी गई और अग्नि प्रज्वलित की गई देखते ही देखते होलिका जलकर स्वाहा हो गई परन्तु प्रहलाद का बाल भी बांका न हो सका प्रहलाद अपने प्रभु के भजन में मग्न था होलिका की समाप्ति के कारण ही होली का नाम होलिका दहन पड़ा । उसी दिन से होली जलाने के त्योहार की परम्परा चली।


ब्रज का फाग –
भारत में सभी प्रदेशों में यह होली का त्योहार एक अथवा दो दिन मनाया जाता है किन्तु ब्रजमण्डल में विशेष रूप से मथुरा जनपद 50 दिन तक मनाया जाता है। वसन्त पंचमी से मन्दिरों में गुलाल की होली शुरू हो जाती है और फागुन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी तक ठाकुर जी गुलाल की होली खेलते हैं। मन्दिरों में पुजारी दर्शनार्थियों पर गुलाल फेंकते हैं और दर्शनार्थी उसे ठाकुर जी का प्रसाद मानकर धारण करते हैं। इस संदर्भ में ‘‘सूरदास’’ जी का पद देखें।

खेलत फागु सुहावनी, भीजि रहयौ सब गाउँ ।
ताल पखाबज बाजहीं डफ सहनाई भेरि ।
स्त्रवन सुनत सब सुन्दरी, झुंडनि आई घेरि ।
इतहि गोप सब राजहीं, उत सब गोकुल नारि ।
अति मीठी मन भावती, देही परस्पर गारि ।
चोबा चन्द छिरकहीं, उड़त अबीर गुलाल ।
मुदित परस्पर खेलहीं हो हो बोलत ग्वाल ।


ब्रज क्षेत्र की होली का अपना अनुपम आनन्द होता है। जहां तक ब्रज क्षेत्र के सीमांकन की बात आती है तो मथुरा के चारों और के क्षेत्र का नाम ब्रज है। ब्रज शब्द का प्रयोग पौराणिक संस्कृत साहित्य में भी मिलता है। इसका अर्थ ‘‘ग्वालों का शिविर’’ या पड़ाव या गौशाला है’’।।इस संदर्भ में उल्लेखनीय ग्रंथ है - हरिवंश विष्णुपुराण तथा भागवत पुराण । ब्रज क्षेत्र में ब्रज 84 कोष का क्षेत्र शामिल किया गया है जिसकी लगभग दूरी  300 किमी के आस-पास मानते हैं।
दोहा -
ब्रज चैरासी कोस में चार गाम निज धाम
वृन्दावन और मधुपुरी बरसानो नन्द गाम।
ब्रज की सीमायें समय-समय पर पौराणिक युग से लेकर आज तक निर्धारित नहीं हो सकी हैं। ब्रज क्षेत्र की सीमाऐं सभी विद्वानों ने अलग अलग बतायी गई है।


ब्रज में होली का आनन्द –
ब्रज की होली में नन्द गांव और बरसाने की होली ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की पहचान बना ली है। यहां होली होलिका दहन से 7 दिन पूर्व की हो जाती है। बरसाने की होली फागुन शुक्ला नवमी को तथा नन्दगांव की होली फागुन शुक्ला दशमी को हो जाती है।
परम्परा यह है कि फाल्गुन शुक्ला अष्टमी को नन्द गांव के हुरियारों की ओर से एक पण्डा बरसाने आकर बरसाने की गोपियों को होली खेलने का निमंत्रण देता है। बरसाने की ओर से यह निमत्रण स्वीकार कर लिया जाता है। और नवमी के दिन बरसाने की होली देखने लायक होती है। गोपियाँ हुरियारों पर लट्ठ बरसाती हैं और लोग गुलाल और रंगों से वातावरण को रंगीन कर देते हैं। अगले दिन दशमी को यही परम्परा नन्दगांव में दोहराई जाती है बरसाने के ग्वाल होते हैं और नन्दगांव की गोपियाँ इस पर्व को आनन्द के साथ मनाते हैं।


ब्रज के तो गांव-गांव में होली के हुरियारे मतवाले हुए घूमते हैं ये फागुन मास तो है ही हर्षोल्लास का कृष्ण काल में गोपियाँ भी कृष्ण से होली खेलने को लालायित रहती थीं और कृष्ण राधा और गोपियों की होली की तो झांकी मन मोह लेने वाली और रंगमयी होती थी। गोपियाँ जो पिछली होली पर कान्हा को रंग न लगा पाई थीं वो सोचती हैं कि अगर अबकी बार श्याम हाथ आ जाये तो मजा चखा दूंगी और पिछला बदला चुका लूंगी। लेकिन गोपी पर श्याम की मोहिनी मूरत का ऐसा असर होता कि वो देखते ही सब सुध बुध खो बैठती है, और कान्हा उसे फिर रंग में रंग डालते हैं इस संदर्भ पर कवि गिरीश जोशी का कवित्त सटीक सा लगता है-

हाथ में गुलाल लाल लेके एक सखी धाई
बापै ही नजर परी मेरे नन्द लाल की
एक बार हाथ में जो श्याम मेरे आय गयौ
कसक निकार लऊंगी परकेऊ साल की
झट्ट हाथ सांवरे ने धर दियौ हाथ पे तो
सुध बुध भूल गई अपनी हुँ चाल की
श्याम रंग ऐसौ चढ्यौ बावरी के हियरा में
मुठ्ठी हुं खुली न फिर बन्द जो गुलाल की।


ब्रज के गांवों में होरी के हुरियारे रंग लगाते हुए घूमते हैं। होलिका दहन के दिन मतवाले हुरियारे होलिका पूजन को जाती हुई नारियों पर रंग की बाल्टी उड़ेल देते हैं बेचारी स्त्रियां देखती रह जाती हैं और मीठी मीठी गाली दे कर निकल जाती हैं हुरियारों को भी गाली खाकर मजा आता है और फिर किसी और को रंग में बिगाड़ने के लिए ताक लगाकर बैठे रहते हैं।
धुलेण्डी के दिन तो हुरियारों पर मानो होली का नशा ही छा जाता है सुबह सभी अपने घरों पर रंग-बिरंगें फटे पुराने अजब गजब तरह की वेश भूषा में अपने घरों से रंग गुलाल के थैले ले लेकर चौराहों पर आ जाते हैं, पहले सभी एक दूसरे को रंग गुलाल लगा कर गले मिलते हैं और बड़ों का आशीर्वाद लेते हैं और फिर होली के रंग में रंग जाते हैं। रसियों की टोली अपने दलों  के साथ ढोलक, झांझ, मंजीरे, नगाड़े सहित आदि साजों के साथ होली गायन करते हुए गांव मे परिक्रमा करते हैं, और मोहल्ले की स्त्रियां ताल से ताल मिलाकर नृत्य करती हैं, जो देखने लायक होता है। हुरियारे तो संग में नाचने को लालायित रहते ही हैं। हुरियारिन तो कमर के ठुमकों से रसिया को घायल कर देती है। हुरियारे- हुरियारिनों को हराने के लिए संग संग नृत्य करते हैं और दोनों की ये होड़ त्योहार के आनन्द को दोगुना कर देती है। होली के दिन की बात ही अजब होती है। कहीं भांग मिली ठंडाई,  कहीं शरबत, दाल बाटी, चूरमा, हुरियारों को जगह-जगह खाने को दिया जाता है। लोग भांग के नशे में झूमते रहते हैं, और होली का भरपूर आनन्द लेते हैं।


कुछ बच्चे तो शरारत के तौर पर चप्पलों की माला किसी व्यक्ति के गले में डाल कर उसका स्वांग बनाते हैं उसको गधे पर बैठा देते हैं। दोपहर में एक झुण्ड हुरियारों का घर घर जाकर नई नवेली ब्याहता स्त्रियों को जो पहली बार ससुराल में होली खेलती है, और शर्म के मारे बाहर नहीं आना चाहती जबर्दस्ती बाहर निकलवा लेते हैं, और रंग भरी बाल्टी उड़ेल देते हैं। ब्रज की बैयरबानी (स्त्रियां) भी फिर कहाँ कम पड़ती हैं। हुरियारों को घेर कर उनको मजा चखाती हैं वो देखने लायक हेाता है। हुरियारों के गालो को दे-दे गुल्चा लाल कर देती हैं कपडे फाड़ कर नंगा कर के भगा देती हैं। ये रंग लगाने की होड़ सांय सूर्य छिपने तक चलती है। रंगों से सराबोर होकर आनन्द को चरम सीमा तक ले जाते हैं, ये ब्रजवासी। ब्रज की होली का आनन्द तो ब्रज में आकर ही लिया जा सकता है।

ब्रज क्षेत्र और होली –

वर्तमान काल में ब्रज की सीमा को बांधते हुए कहते है कि गोकुल ही ब्रज है। तो कुछ कहते है वृन्दावन ही ब्रज है। कुछ गोर्वधन तलहटी के गांव को ही ब्रज मानते है। तो वहीं कुछ पूरे ब्रज 84 कोस को ही ब्रज मानते है। लेकिन जहां जहां तक ब्रज भाषा बोली जाती है वो सारा क्षेत्र ही ब्रज है। अर्थात् अलीगढ़, हाथरस, एटा, इटावा, मैनपुरी, धौलपुर, ग्वालियर, डीग, भरतपुर, बयाना, करौली, अलवर, आदि जिलों में ब्रज भाषा और ब्रज भावना विद्यमान है। हमारा मूल उद्देश्य होली का वर्णन करना है परन्तु इस होली की बहार कहाँ कहाँ तक है बस इसी संदर्भ में क्षेत्र की चर्चा करना आवश्यक हो जाती है। ताकि युवा और आज की पीढी को ब्रज क्षेत्र का संदर्भ प्राप्त हो सके।
होली के रूप में मुख्य पहचान के तौर पर अगर बात करें तो बरसाना, नन्दगांव, मथुरा, गोकुल, दाऊजी,  लोहवन, महावन, कोसी, छाता, वृन्दावन, खेरा ब्राह्मन, कामा, डीग, नौझील, मुख्य तौर पर पहचान बनाये हुए है। फालेन का पण्डा भी होली का अदभूत रूप है।
लेकिन आज होली अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुकी है। कहने का तात्पर्य है कि होली मौज मस्ती मान मनुहार का त्योहार है और इसको सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता ।


होली मिजाज की कुछ पंक्तियां-

‘‘मृगनैनी नार नवल रसिया
बड़ी बड़ी अंखियां नैनन कजरा
तेरी टेढ़ी चितवन मन बसिया

यै कैसो देश निगौरा जग होरी ब्रज होरा
मैं जमुना जल भरन जात हूं देखैं रूप मेरो गोरा
मोते कहैं नैक चल कुंजन में, तनक तनक से छोरा
परै आँखिन में डोरा। कैसों.............



वर्तमान में होली का बदलता स्वरूप
अगर वर्तमान में संदर्भ की बाते करें तो होली का रूप भी बदला है अब लोगों में पहले वाली बात नहीं रही । लोग सिर्फ दो दिन ही रंग गुलाल लगाकर त्योहार की इति श्री कर लेते हैं, वो प्रेम प्रीत नहीं रही जो प्राचीन समय में देवर भाभी एक दूसरे से महीनों पहले होली के त्योहार का आभास रंग लगा कर करा देते थे। धन की लालसा ने लोगो को घरों से बाहर जाने को मजबूर किया है इसके चलते समय नहीं होता और त्योहारों की रौनक कम हो जाती है। कुछ लोग होली के बहाने पुराने बैर भाव से वशीभूत होकर कैमिकल रंगों से नुकसान पहुचाते हैं अश्लील हरकतें करते है इस कारण सभ्य परिवारों में अपनी घर की स्त्रियों को होली खेलने की मनाही की जाती है। इस बदलते परिवेश पर कवि ‘‘गिरीश जोशी’’ की पंक्तियां सही प्रतीत होती हैं -

हर कोई इंसान यहां पर डरा डरा सा लगता है।
चेहरे हैं बेरंग सभी के सूरत से भी मरा मरा सा लगता है
जीवन नीरस बना हुआ है कड़वी सबकी बोली है।
सारे रंग हुए है फीके, फीकी सबकी होली है।
आँखों में है खून उतरता पिचकारी में गोली है
इक चेहरे पर लाखों चेहरे गद्दारों की टोली है।


त्योहार हमारे जीवन को खुशियों से भर देते हैं जिसमें होली का अपना अद्वितीय स्थान है और हम सभी इन त्योहारों की गरिमामयी परम्परा को सुचारू रूप से अपनी आगामी पीढ़ियों को सौंपते चलें, ये ही भारतीयता के परिचायक हैं, इनकी गारिमा बनी रही ताकि हम इनके सानिध्य में जीवन की रसिकता का रसास्वादन कर सकें और सबका मंगल करें। यही मेरी कामना है।

ब्रज में होरी कौ त्यौहार
याकी झटक लेत ब्रजवासी कोऊ ना पावे पार

 


- नटवर लाल जोशी

रचनाकार परिचय
नटवर लाल जोशी

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