जून 2017
अंक - 27 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

कृष्ण भक्ति काव्य का प्राणतत्व ब्रजभाषा: शाईस्ता सैफ़ी


भक्ति भावना का स्वरूप भारतीय साहित्य में अधिक प्राचीन है। धर्म की तीन धाराओं-ज्ञान, कर्म और भक्ति में भक्ति का प्रमुख स्थान है। ईश्वर की परम अनुरक्ति ही भक्ति है। भक्ति में लीन हो जाने पर मनुष्य न किसी वस्तु की इच्छा करता है और न ही किसी वस्तु में आसक्त होता है। सांसारिक मोह-माया से उसका संबंध टूट जाता है और वह निस्पक्ष-भाव से प्रेम में लीन हो जाता है। कृष्ण भक्ति का प्रमुख आधार प्रेम है। ‘‘सब सम्प्रदायों के कृष्ण भक्त में वर्णित कृष्ण की ब्रजलीला को ही लेकर चले क्योंकि उन्होंने अपनी प्रेमलक्षणा भक्ति के लिए कृष्ण का मधुर रूप ही पर्याप्त समझा।’’1
कृष्ण भक्ति काव्य प्रधानतः ब्रजभाषा में लिखा गया है। हिंदी साहित्य में भाषाओं का विकास आरम्भकाल से ही देखने को मिलता है। संसार में लगभग तीन हजार भाषाएँ बोली जाती है, जिनमें अनेक साहित्यिक भाषा अपने शिखर पर पहुँची उनमें से एक ब्रजभाषा भी है। हिन्दी साहित्य में प्रमुख रूप से अवधी, खड़ीबोली, राजस्थानी, पूर्वी, पश्चिमी हिन्दी काव्य की परम्परा रही है, जिसमें ब्रज काव्य की परम्परा का अपनी सजीवता, कोमलता, रागात्मकता, संगीतात्मकता आदि विशेषताओं के कारण अधिकाधिक प्रसार हुआ। ब्रजभाषा का संबंध शौरसेनी के अपभं्रश रूप से है। ब्रजभाषा साहित्य के इतिहास को हम आदिकाल, भक्तिकाल और आधुनिक के रूप में देख सकते है। इसमें रीतिकाल को ब्रजभाषा का स्वर्ण युग कह सकते है। क्योंकि रीतिकाल तक ब्रजभाषा अपने उच्च शिखर पर थी।


ब्रजभाषा अपने साहित्य और धार्मिक महत्त्व के कारण भारत के एक बहुत बड़े भाग में काव्य एवं संस्कृति का माध्यम बन गई। हिन्दी का प्रायः समस्त प्राचीन काव्य ब्रजभाषा में लिखा गया है। डाॅ॰ रामस्वरूप चतुवेदी लिखते है- ‘‘एक सीमा के बाद तो ब्रजभाषा में लिखने का अर्थ हो गया राधाकृष्ण संबंधी काव्य की रचना। और राधाकृष्ण संबंधी लालित्य भाव का ब्रजभाषा के ध्वन्यात्मक लालित्य से अभेद हो गया।’’2
साहित्य प्रयोग की दृष्टि से यदि ब्रजभाषा को देखा जाए तो पता चलता है कि इसका प्रयोग बल्लभ संप्रदाय के प्रभाव स्वरूप हुआ। मध्यकाल में ब्रजभाषा को उच्च श्रेणी पर पहुँचाने का श्रेय कृष्ण भक्त कवियों को है। उन्होंने कृष्ण काव्य को अपनी भक्ति का माध्यम बनाया। मध्यकाल में कृष्ण भक्त कवियों ने सर्वाधिक ब्रजभाषा का प्रयोग किया तथा अनेक साहित्यिक ग्रंथो की रचना भी की। कृष्ण भक्त कवियों में अष्टछाप के कवियों ने माधुर्य भाव में कृष्ण की लीला का गान किया है। जिसमें सूरदास, नंददास, कुम्भनदास, परमानंददास, छीतस्वामी, चतुर्भुजदास और कृष्णदास आदि है।


अष्टछाप के कवियों में सूरदास अपनी भाषा प्रयोग के लिए प्रसिद्ध है, उन्होंने ब्रजभाषा का रम्य और मोहक रूप अपने काव्य में प्रयुक्त किया है। कृष्ण भक्ति की धारा को प्रवाहित करने कृष्ण भक्त कवियों में सूर का स्थान अप्रतिम है। सूर ने ब्रजभाषा के माध्यम से सबकुछ कह दिया। चाहे वह प्रकृति के प्रति अगाध भक्ति हो। सूरदास ने ब्रजभाषा का ऐसा सहज और सरल रूप प्रस्तुत किया है कि उसको पढ़कर जीवन की सरलता का अनुभव होता है सूरदास का एक पद दृष्टत्य है-

जा पर दीनानाथ ढरै।
सोई कुलीन बड़ौ सुन्दर सोइ जा पर कृपा करै।
सूर पतित तरि जाय तनक में प्रभु नेक ढरै।।

अष्टछाप के कवियों में नंददास सूरदास के समकालीन थे। नंददास ने ब्रजभाषा का प्रांजल रूप अपने काव्य में प्रयुक्त किया है। नंददास बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे इसीलिए नंददास को जडि़या भी कहा जाता है। नंददास ने भागवत पुराण पर आधारित रचनाओं में अपनी मौलिकता का परिचय दिया है। भाषा में मधुरता होने के कारण कृष्ण की सभी लीलाओं और सेवाओं का वर्णन भी उनके पदों में मिलता है। कृष्ण के रूप सौन्दर्य का एक पद देखिए-

दीपक ले चलि बाट-बाट मैं वरों कर डाल।
फेरि आवै नंद-द्वार बायरे को देती गार।।
नंददास नंदनंदनु संुहो लागे नयनां
पलक की ओट मानु री बिते जुग चार।।3


ब्रजभाषा का संबंध माधुर्य से है और यह भावों के द्वारा अनुप्राणित होती है। जब हम परमानंददास कृत ‘परमानंद सागर’ को देखते है तो उसके पदो में हमें माधुर्य भाव, वात्सल्य, बालभाव और भक्तिरस के दर्शन होते है। मूलचंद जी ने परमानंददास के विषय में लिखा है-‘‘परमानंद जी ने कृष्ण की बाल्यावस्था के स्वाभाविक चित्रण के साथ-साथ प्रेम की संयोग और वियोग स्थितियों का प्रस्तुतीकरण भी अत्यंत सजीव और सरस किया है। इनका काव्य भाव, भाषा, मधुरता आदि सभी दृष्टियों से उत्कृष्ट बन पड़ा है।’’4 परमानंद सागर का एक पद-

कहा करौ बैकुंठहि जाय?
जँह नहिं नंद, जँहा न जसोदा, नहिं जँह गोपी ग्वाल न गाय।
जँह नहिं जल जमुना को निर्मल और नहीं कदमन की छाँय।
परमानंद प्रभु चतुर ग्वालिनी, ब्रजरज तजि मेरी जाय बलाय।।


अष्टछापी कवि कुंभनदास में कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम की भावना देखने को मिलती है। इनके काव्य की भाषा भी ब्रज क्षेत्र की ही रही। जो साधारण ब्रजभाषा कही जा सकती है। अकबर के निमंत्रण पर वह सीकरी गए और कृष्ण के अनन्य भक्त होने पर ब्रज क्षेत्र के बाहर उनको कष्ट की अनुभूति हुयी तब उन्होंने ये पद कहा-

भक्तन को कहा सीकारी सों काम।
आवत जात पन्हैया टूटी बिसरि गयौ हरिनाम।।
जाको देखे दुःख लागै ताकौ करन परी परनाम।
कुम्भनदास लाल गिरिधर बिन यह सब झूठो धाम।।

इन सभी कवियों ने ब्रजभाषा में इतनी मनोरम और हृदयग्राही रचना की है कि ब्रजभाषा को शीर्ष पर पहुँचा दिया है। इसी प्रकार रीतिकालीन कवियों ने भी ब्रजभाषा की ही काव्य रचना के लिए उपर्युक्त समझा। ब्रजभाषा का सबसे अधिक विकास इसी काल में हुआ। वस्तुतः रीतिकाल काव्य भाषा की दृष्टि से ब्रजभाषा का सर्वोत्कृष्ट काल कहा जा सकता है। जहाँ ब्रजभाषा का सम्पूर्ण लालित्य अपने चरम पर दिखाई दिया। कृष्ण भक्त काव्य में जो माधुर्य, लालित्य और मनोरमता है वह ब्रजभाषा की ही देन है। कृष्णभक्त कवियों ने अपने काव्य में ब्रजभाषा की ही प्रमुखता दी और उसको इतना मनोरम और हृदयग्राही बना दिया कि ऐसा चित्रण अन्यत्र देखने को नहीं मिलता। काव्य सृजन के लिए रीतिकालीन कृष्णभक्त कवियों जिसमें केसव, सेनापति, भिखारीदास, पद्माकर आदि ने ब्रजभाषा को अपने काव्य का माध्यम बनाया।


रीतिकाल के बाद आधुनिककाल के प्रथम चरण तक ब्रजभाषा अपना वर्चस्व बनाये रही। साहित्य की रचना ब्रजभाषा में निरन्तर होती रही। भारतेंदु, हरिश्चंद, राधाकृष्णदास, प्रतापनारायण मिश्र आदि लेखकों का मानना था कि जो बात ब्रजभाषा में कही जा सकती है वह किसी अन्य में नहीं।
कृष्णभक्ति काव्य और ब्रजभाषा एक दूसरे के पूरक है। कृष्णभक्ति कवि ने होते तो ब्रजभाषा का जो विकास दिखाई देता है, वह शायद न होता। मन्दिरों, सत्संगों, ग्रामीण लोक जीवन की लोकोक्ति, गीत-संगीत आदि ब्रजभाषा में ही गाते बजाते दिखाई पड़ते है। ब्रजभाषा की काव्यात्मकता इस बात में भी है कि इसमें गाये गए गीतों में लयात्मकता होती हैं, जो पाठक और जन को आकर्षित करती है। जब कृष्ण भक्ति और कृष्ण की बाल्यवस्था से लेकर अंतिम अवस्था तक का चित्रण ब्रजभाषा में हो तो गोपियाँ सारा काम-काज छोड़ कृष्ण की लीला में मग्न हो जाती हैं, भक्तगण मूर्छित हो जाते हैं। रामचंद्र शुक्ल अपने हिन्दी साहित्य के इतिहास में स्पष्ट शब्दों में लिखते हैं- ‘‘हम नहीं चाहते और शायद कोई नहीं चाहेगा, कि ब्रजभाषा काव्य की धारा लुप्त हो जाए।’’5





सन्दर्भ-

1.    शुक्ल, रामचन्द्रः हिन्दी साहित्य का इतिहास, प्रकाशन संस्थान, पृ॰-127
2.    रत्नाकर, जगन्नाथदासः उद्ववशतक, भारत प्रकाशन दरियांगज, दिल्ली, पृ॰-32
3.    झारी, कृष्णदेवः मध्यकालीन कृष्णकाव्य, हिन्दी साहित्य संसार दिल्ली, पृ॰-85
4.    गुप्ता, मूलचंदः हिन्दी कृष्ण काव्यः ब्रज संस्कृति और कला, शलभ पब्लिशिंग हाऊस मेरठ, पृ॰-45
5.    शुक्ल, रामवचन्द्रः हिंदी साहित्य का इतिहास, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी, 34 वां संस्करण संवत्-2056 वि॰, पृ॰-357


- शाईस्ता सैफ़ी

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शाईस्ता सैफ़ी

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