जून 2017
अंक - 27 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

लेख

कृष्ण भक्ति की वर्तमान समय में प्रासंगिकता: डाॅ. नीता अग्रवाल


धर्म परम्परा अध्यात्म, धार्मिक विश्वास, जन कल्याण, जन आस्था आदि अवधारणाएँ भारतीय समाज एवं संस्कृति की एक प्रमुख पहचान हैं। धार्मिक विश्वास जन कल्याण एवं जन आस्था पर टिका हुआ है। इसी धार्मिक विश्वास के अधार पर देवताओं की पूजा न सिर्फ उनके मंदिरोें मेें होती है, बल्कि सीधे सादे भक्तों के हृ्रदय में भी इनकी पूजा होती है।
भारतीय समाज की संस्कृति एवं परम्पराओं में देवता अपना विशेष स्थान रखते हैं। यह जन समूह की शारीरिक मानसिक सामाजिक अपि प्राकृतिक, अधि व्यक्तित्व आदि विविध परेशानियेां एवं समस्याओं का निराकरण एवं समाधान प्रस्तुत करके उन्हें शांति एवं सुखी जीवन प्रदान करते हैं। देवताओं के प्रति विश्वास लोगों को मानसिक एकता एवं एकीकरण के सूत्र में बांधता है। इनके माध्यम से हमारी लोक परम्पराएँ एवं संस्कृति आगे की ओर  संचारित होती हैं। इन्हीं विश्वास एवं आस्था की श्रंृखला में कृष्ण भक्ति, कृष्ण संदेश की वर्तमान में आवश्यकता महती है।


कृष्ण जनमानस के हृ्रदय में प्रेम के परिचायक हैं। प्रेम चाहे मित्र या सखा से हो प्रेम अपनी माता के प्रति हो अपने भक्तों के प्रति, गोपीयों के प्रति अपने परिवार से पशु-पक्षियों के प्रति किसी रूप में हो प्रेम के लिए कृष्ण का नाम सर्वोपरि हैं।  
कृष्ण ने अपने व्यवहार एवं आचरण से समझाया कि पे्रम निस्वार्थ है प्रेम जो आत्मिक है प्रेम जो सहज है प्रेम जो दायित्व बोध है प्रेम जो दमन का तिरस्कार करता है, प्रेम जो समदर्शी है, प्रेम जो आनन्ददायी है, प्रेम जो कण-कण में व्याप्त है, प्रेम की कथा अटल है।  प्रेम जो गूंगे के लिए मिठाई जैसी है जिसे खाकर वह प्रसन्न तो होता है किन्तु व्यक्त नहीं कर सकता, वही कृष्ण प्रेम मानव मात्र के लिए उदाहरण स्वरूप है।


कृष्ण जाति, वर्ण, वर्ग और पंथ से दूर रहकर मानवता के लिए पूजनीय हैं प्रेम के सूत्र से बंधे बिना, मानव जाति का, समाज का, राष्ट्र का कल्याण असंभव हैं।
कृष्ण भक्ति की प्रासंगिकता उनके आचरण एवं संदेश में जन मानस को कई तरह से प्रेरित करती है। कृष्ण ने विभिन्न योगों के बारे में बताया चाहे वह कर्मयोग, भक्ति योग, ज्ञान योग हो, योग के द्वारा कर्म करने के लिए मानव को उचित मार्ग दिखाया। कर्म करो फल की इच्छा रखे बिना। आत्मा अमर है, अजर है। यह एक शरीर से निकलकर दूसरे शरीर में प्रवेश करती हैं। यह संदेश मानव मात्र को दुख भय चिन्ता से ऊपर उठकर जीवन की सत्यता को इंगित करता हैं।
कृष्ण का विश्वरूप दर्शन ये अहसास कराता है कि ईश्वर सर्वत्र है आवश्यकता है उसे पहचानने की। ईश्वर हमारे अन्दर है और हम उसे वस्तुओं में मंदिर एवं मस्ज्दिों में ढूँढ़ते हैं। कभी अपने मन के अन्दर जाकर ईश को ढूँढ़ने का हम प्रयत्न नहीं करते हंै। मन जो हमें सही राह पर सत्कर्म करने के लिए प्रेरित करता हैं। कृष्ण भक्ति न केवल मानव, बल्कि गौ संरक्षण गौ हत्या को रोकने के लिए भी प्रेरित करती है। गौ जिसे हिन्दू समाज माता स्वरूप पूजता है। हमंे गौ हत्या नहीं करनी चाहिए। उसे मारकर या गौमांस का सेवन नहीं करना चाहिए। गौ सेवा नारायण सेवा के समकक्ष पूजना चाहिए।


आज मानव से लेकर विश्व की विराट इकाई तक अनाचार उत्श्रंृखलता एवं अराजकता का दृश्य चारों ओर दिखाई दे रहा है। मनुष्य अपने परिवार में सामजस्य बना नहीं पा रहा है, संयुक्त परिवार टूट रहे हैं। समाज का एक वर्ग अन्य वर्गाे से द्वेष ईष्र्याा की अग्नि में झुलस रहा है। इसके लिए श्रीमद भागवत गीता में पुराणों में आत्म शांति हेतु मोक्ष हेतु भक्ति का मार्ग अपनाने का आग्रह मिलता है।
भागवत-पुराण के अनुसार नवधाभक्ति, श्रवण, कीर्तिन, स्मरण, पादसेवन, अर्चना, वन्दना व आत्म निवेदन के रूप में जो लक्ष्ण प्रकट होते हैं वे सब लक्षण भक्ति के हैं। भागवत में कहा गया है यद्यपि कलयुग दोषों से युक्त है फिर भी इस युग में एक महान गुण है केवल कृष्ण के नाम के कीर्तन द्वारा व्यक्ति भौतिक बंधन से मुक्त हो जाता है।
 

सामाजिक समरसता का नितान्त अभाव होता जा रहा है ऐसे में ईश्वर भक्ति के द्वारा जगदीश्वर से प्रार्थना की गई हैः- हे जगदीश्वर आप हमें ऐसी बुद्धि दंे हम परस्पर मिलकर हल निकाल कर एक साथ चले। एक समान मधुर वाणी बोले, एक समान ह्रदय वाले होकर स्वराष्ट्र में उत्पन्न धन धान्य और सम्पत्ति को परस्पर समान रूप से बांटकर उपभोग करें। हमारी हर प्रवृति राग द्धेष रहित परस्पर प्रीति बढाने वाली हो।
वल्लाभाचार्य  जी के अनुसार श्री कृष्ण ही परम ब्र्रह्यन है जो दिव्यगुणों से सम्पन्न होकर पुरूषोŸाम कहलाते हैं। पुरूषोŸाम श्री कृष्ण की सभी लीलाए नित्य है परम ब्र्रह्यन का ज्ञान होने के पश्चात् द्धैषभाव नष्ट हो जाता है इसके नष्ट होते ही मानव मात्र के प्रति श्रद्धा, प्रेम, विश्वास जैसे उदाŸा भाव स्वतः जाग्रत हो जाते हैं। फिर विषमता की स्थिति का अस्तित्व कैसे रह पाएगा, इस तरह भक्ति के लिए चिन्तन आवश्यक है।


मानवतावादी कृष्ण का संदेश आज भी प्रासंगिक है युगों-युगों तक प्रासंगिक रहेगा जब जब इस धरती पर धर्म की हानि अधर्म की वृद्धि होती है तब तक कृष्ण अपने स्वरूप को रचते हंै तथा साकार रूपों से लोेगों के सम्मुख प्रकट होते हैं। यह कथन स्वयं श्री कृष्ण ने गीता में कहा है कि

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्
धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।

 


- डाॅ. नीता अग्रवाल

रचनाकार परिचय
डाॅ. नीता अग्रवाल

पत्रिका में आपका योगदान . . .
आलेख/विमर्श (1)