जून 2015
अंक - 4 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कुण्डलिया छंद

गंगा है पावन सदा, बहती पाहन चीर।
खड़ा हिमालय देश में, बनके देखो वीर।।
बनके देखो वीर, बर्फ की वर्दी पहने।
पीले सरसों फूल, लगे धरती के गहने।
कह दिनेश कविराय, बढ़ाये शान तिरंगा।
पापी तर लो पाप, क्षमा करती माँ गंगा।।


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गाँधी तेरे देश में, कैसा अपना हाल?
नेता भरे तिजोरियाँ, कर जन को कंगाल।।
कर जन को कंगाल, गरीबी और बढ़ाये।
खेल बना अपराध, चोट करते ही जाये।
कह दिनेश कविराय, चले फिर से वो आँधी।
स्वाभिमान का लट्ठ, लिए आ जाओ गाँधी।।


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ग्वाले गुन गुन गा रहे, यमुना तट पर गीत।
मधुर मधुर मुरली बजा, मदन करे संगीत।।
मदन करे संगीत, और गायें रम्भाती।
राधा सुनकर गीत, वहीं तट पर रुक जाती।
कह दिनेश यह बात, किशन के रूप निराले।
करें गोपियाँ रास, नाचते है सब ग्वाले।।


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तन केसरिया धार कर, और कमण्डल हाथ।
बनके ढ़ोंगी संत मैं, हुआ जगत का नाथ।।
हुआ जगत का नाथ, लोग कदमों को चूमें।
समझ मुझे भगवान, दास बन पीछे घूमें।
कह दिनेश इतिराय, हमको हुआ लवेरिया।
अच्छा यार उपाय, पहन लो तन केसरिया।।

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सारे मठ अब हो गये, जोड़ो का ही धाम।
थाल कहाँ अब हाथ में, करते प्रेम तमाम।।
करते प्रेम तमाम, हाथ बाँहों में डाले।
करते मठ बदनाम, फेंक मदिरा के प्याले।
कह दिनेश यह बात, देव भी इनसे हारे।
बेच सभी ये लाज, खेल करते है सारे।।


- दिनेश कुमार देवांगन

रचनाकार परिचय
दिनेश कुमार देवांगन

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