प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2017
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

कृष्ण-भक्ति में अनुरंजित मीराँ की संवेदना: डाॅ. अंजु


‘मेरे तो गिरधारी गोपाल दूसरो न कोई’ पद की अमर गायिका मीराँ कृष्ण के प्रेम और भक्ति में आकण्ठ डूबी रही। मीराँ ने वीरभूमि राजस्थान में कृष्ण भक्ति का अजस्रस्रोत प्रवाहित किया जो युगों-युगों तक कृष्ण भक्तों के चित्त को शान्त, निर्मल और प्रेम के रस से सरोबार करता रहेगा। ’’राजस्थान में मीरां का वही स्थान है जो गंगाघाटी में भक्त शिरोमणि सूरदास तथा गोस्वामी तुलसीदास का है। उनका व्यक्तित्व त्याग, तपस्या तथा ईश-समर्पण की पवित्र त्रिवेणी था। चैतन्य महाप्रभु के समान वे कृष्णमयी थी। उन्होंने राष्ट्र के इस क्षेत्र में अलौकिक प्रेम के मार्गदर्शन का महती कार्य सम्पन्न किया।’’1
 

मीराँ की कृष्ण भक्ति में उनके आत्म समर्पण, अनन्यता, एकनिष्ठता, तन्मयता को देखकर लगता है कि मीराँ कृष्ण-प्रेम और भक्ति की मानो पर्याय हो गई। मीराँ का नाम लेते ही कृष्ण की साँवली-सलोनी मूरत स्वतः ही स्मरण हो आती है। मीराँ श्रीकृष्ण को पति रूप में स्व्ीकारती है। उनकी भक्ति माधुर्य - भाव की है। मीराँ की प्रत्येक श्वास में ध्वनित होते हैं कृष्ण, रोम-रोम में बसते हैं कृष्ण। जिस प्रकार जल बिन मीन की कल्पना नहीं की जा सकती, उसी प्रकार कृष्ण से अलग मीराँ की कल्पना नहीं की जा सकती। मीरा की कृष्ण-भक्ति को उनकी आत्मा की अतल गहराईयों से जोड़ते हुए ओशो कहते हैं, ’’मीराँ के लिए कृष्ण कल्पना नहीं, कृष्ण बाहर भी नहीं है। मीरा के लिए कृष्ण उसके अंतर्तम में विराजमान हैं।’’2
तभी तो मीराँ कहती है,
        आली री मेरे नयनन बान पड़ी।
        चित्त चढ़ी मेरे माधुरी मूरत, उर बिच आन अड़ी।।3
मीराँ के नेत्रों और हृदय-मंदिर में श्रीकृष्ण का अद्भुत रूप-सौन्दर्य बसा है। मीराँ ने अनेक पदों में कृष्ण के रूप-सौन्दर्य के प्रति सहज आकर्षण को भावविभोर हो अभिव्यक्त किया है। ’’मीराँ की साधना में आरम्भ से अन्त तक अक्षीण और अखण्ड सौन्दर्य की उपासना रही है.......................।’’4 मीराँ कृष्ण-सौन्दर्य के आकर्षण के लिए कहती है-
        मीराँ प्रभु के रूप लुभानी, गिरधर नागर नट के।5
मीराँ के काव्य में कृष्ण के प्रति एकनिष्ठता, अनन्यता, तन्मयता, पूर्ण समर्पण के भावों का एक साथ दिग्दर्शन होता है। यह सारे भाव ही उनके प्रेम-तत्व का प्राण है और कृष्ण प्राणाधार-
हरि! मेरे जीवन प्राण-आधार।
और आसिरों नाहिन तुम बिन, तीनूँ लोक मंझार।।6

 

कृष्ण प्रेम में अनुरक्त मीराँ कृष्ण लीलाओं में उनकी सहचरी बन हृदय में बसे गोपी भाव को यदा-कदा वाणी देती है। डाॅ. भगवती उपाध्याय ने मीराँ के गोपी भाव पर प्रकाश डाले हुए लिखा है, ’’उनका गोपीभाव उच्छृंखल आवेश-प्रदर्शन के रूप में कहीं नहीं दिखाई पड़ता, प्रत्युत यह भाव हृदय से निःसृत प्रेम के आह्लाद से प्रेरित और समन्वित है। वह वस्तुतः मर्यादित एवं ज्ञान संयुक्त है। मीराँबाई स्वयं स्त्री और प्रियतम श्रीकृष्ण को पति रूप में वरण कर चुकी है। अतः माधर्युभाव की सभी स्त्रीसुलभ बातें उनके काव्य में स्वतः आती गयी है।’’7
‘‘गहे द्रुम-डार कदम की ठाडो, मृदु मुस्क्याय म्हारी ओर हँस्यो’’ कृष्ण की यही मृदु मुस्कान मीराँ को अलौकिक प्रेम के चिरबंधन में बाँध लेती है। अमृत साधना के अनुसार, ’’कृष्ण ने गंभीरता को हटा दिया और सहजता से जीना सिखाया। अपने आचरण से दिखाया कि प्रेम जिंदगी का रस है, खूब छककर पीयो।’’8 मीराँ ने इस प्रेम के रस को हृदय की सूक्ष्म और आन्तरिक अनुभूतियों के साथ पीया और जिया भी। प्रसिद्ध समालोचक रामस्वरूप चतुर्वेदी के शब्दों में, ’’मीराँ का काव्य उन विरल उदाहरणों में है जहाँ रचनाकार का जीवन और काव्य एक-दूसरे में घुल-मिल गए हैं, परस्पर के संपर्क से वे एक-दूसरे को समृद्ध करते हैं।’’9

 

कृष्ण का सामीप्य लाभ प्राप्त करने के लिए मीराँ उनकी लीलाभूमि वृन्दावन में वास की इच्छा व्यक्त करती है -
    आली! म्हाने लागे बृन्दावन नीको।
    घर-घर तुलसी ठाकुर पूजा, दरसण गोबिंद को।।
.................कुंजन-कुंजन फिरत राधिका, सबद सुणत मुरली को।10

मीराँ कृष्ण साहचर्य प्राप्त करने के लिए उनकी सेविका बनने को भी तत्पर रहती है ’चाकर राखो जी श्याम म्हानै चाकर राखोजी।’

मीराँ को इस संसार का भौतिक ऐश्वर्य, कृत्रिम-सौन्दर्य, वैभव-विलास सब कुछ कृष्ण-प्रेम के आग निस्सार और निष्फल लगते हैं। उनके लिए तो इस सम्पूर्ण सृष्टि का एक ही सारतत्व है और वो है कृष्ण। मीराँ ने अनेक पदों में अपनी मानवीय दुर्बलताओं को सहजता से स्वीकारते हुए अपनी अकिंचनता और गुणहीनता को दर्शाते हुए श्रीकृष्ण की उदारता और महानता का वर्णन किया है-
        तुम गुणवंत, बड़े गुणसागर, मैं हूँ जी औगणहारा।
        मैं निगुणी, गुण एकौ नाहीं, तुम हो बगसण हारा।।11

 

प्रभु-दर्शन की लालसा व्यक्त करते हुए कृष्ण से उनके सारे दोषों और अपराधों को विस्मृत कर देने की विनती करती है-
        किरपा कर मोहिं दरसण दीयो, सब तकसीर बिसारी।12
अपना सर्वस्व कृष्ण को समर्पित कर इस भवसागर में निरालम्ब न छोड़ देने की प्रार्थना करती है-
        मीराँ कहै मैं भई रावरी, छाँड़ो नाहिं निराट।13
भक्त भगवान पर अपना पूर्ण अधिकार स्थापित कर लेता है। कृष्ण द्वारा मीराँ पर ध्यान न दिए जाने पर स्वयं को उपेक्षित महसूस करते हुए मीराँ अपने आराध्य को उपालम्भ देने से भी नहीं चूकती-
        पत्थर की तो अहिल्या तारी, बन के बीच पड़ी।
        कहा बोझ मीराँ में कहिये, सौ पर एक धड़ी।।14


मीराँ के काव्य में कृष्ण-दर्शन की तीव्र लालसा, मिलन की उत्कट आतुरता और विरह की मार्मिक पीड़ा उनके हृदय की अतल गहराईयों से निष्कलुषता और उद्दाम आवेग के साथ प्रस्फुटित हुई है। जहाँ वे कहती है -
        तनक हरि चितवौ जी मोरी ओर।
        हम चितवत तुम चितवत नाहीं, दिल के बड़े कठोर।15
मीराँ भावविभोर हो कृष्ण-भक्ति में डूब अपने आराध्य के भजन गाती है। डाॅ. प्रेमशंकर के शब्दों में, ’’मीराँ न किसी कथा का आश्रय लेती है, न दर्शन का, वे अपने भावलोक के सहारे कृष्णभूमि के गीत गाती है। यह सहज भावनामयता उनकी क्षमता है क्योंकि सब कुछ अंकुठित भाव से कहा गया है। उनके वियोग भाव में वैसा ही समर्पण भाव है, जैसा जीव विधाता के अभाव में अनुभव करता है। यहाँ वे कबीर से आगे निकलती है, भाव-विह्वलता में। कोई रचनाकार सीमित पूँजी के सहारे भी सार्थक यात्रा कर सकता है, मीराँ का काव्य इसे प्रमाणित करता है। सघन भाव-प्रवणता, सहज प्रेम भाव, अकृत्रिम अभिव्यक्ति से उन्होंने इस संभव किया, लोक को संबोधित करते हुए। उनका उपासना भाव उच्चतम धरातल पर पहुँचता है।’’16


मीराँ के पदों के अत्यन्त मर्मस्पर्शी विरहानुभूति का भी स्वाभाविक चित्रण हुआ है। इस विरह वेदना में भाव-सौन्दर्य की उत्कृष्टता देखने को मिलती है। डाॅ. सुमन राजे के अनुसार, ’’वियोग की एकान्त संवेदना मीरा के काव्य की प्राणधारा है। विविध रागों में बँधकर वह शतधा होकर व्यक्त करती है।’’17 मीराँ के विरहजन्य अनुभव अनेक रूपों में साकार हो उठे है -
        लागी सोही जाणै कठण लगण दी पीर।
        विपद पड्याँ कोई निकट न आवै, सुख में सबको सीर।
        बाहरी घाव कछू नहिं दीसै, रोम-रोम दी पीर।’’18
मीराँ को कृष्ण-विरह में यह सारा संसार खारा लगता है-
        म्हाँरे घर आज्यो प्रीतम प्यारा, तुम बिन सब जग खारा।19

कृष्ण विरह ही मीराँ की भक्ति की कसौटी है। आठों याम, रात-दिन कृष्ण ध्यान में डूबी मीराँ एक क्षण को भी कृष्ण को विस्मृत नहीं करती- ’बाण विरह का लग्या हिय में, भूलूँ न एक घड़ी।’ अपने आराध्य प्रियतम की प्रतीक्षारत मीराँ की अगुँलियाँ तक दिन गिनते-गिनते धँस जाती है -

        गिणता-गिणता धँस गई रे, म्हाँरा आँगलियाँ री रेख।
        .......... दासि मीराँ राम भजि कै, तन मन कीन्हौं पेस।।20


मीराँ कृष्ण को बार-बार स्मरण कराती है कि उनका प्रेम इस जन्म का नहीं पूर्वजन्म का है- ’मीराँ के प्रभु हरि अबिनासी, पूरब जनम को कंत।’, ’जन मीराँ नै मिलो कृपा करि, जनमि-जनमि मितराईजी!’

मीराँ स्वयं के और कृष्ण के मध्य कोई भेद नहीं मानती। वह तो कृष्ण को मीराँ और मीराँ को कृष्ण सहज भाव से स्वीकारती है-
        तुम बिच हम बिच अन्तर नाहीं, जैसे सूरज घामा।
        मीराँ के मन अवर न माने, चाहे सुन्दर स्यामाँ।।21
मीराँ कृष्ण की कृपा दृष्टि प्राप्त न होने पर मीठा उलाहना भी देती है-
        म्हारी आसा चितवनि तुमरी, और न दूजी दोर।
        तुमसे हमकूं तो तुम ही हो, हम सी लाख करोर।22
सीधे-सीधे कृष्ण को बता देती है कि मेरे लिए आप एकमात्र आप ही सर्वस्व है और आपके तो मेरी जैसी लाख करोड़।


अहर्निश कृष्ण-भक्ति में डूबी मीराँ को अपने प्रियतम कृष्ण के दर्शन न होने पर अपने हृदय में विद्यमान सांसारिक कामनाओं को दोष देती हुई कहती है-
        काम-कूकर, लोभ-डोरी, बाँधि मोह-चंडाल।
        क्रोध-कसाई रहत घट में, कैसे मिले गोपाल!23
कृष्ण-भक्त मीराँ कृष्ण को पूर्व में अपने निश्छल भक्तजनों पर की गई कृपा दृष्टि का स्मरण कराती है। कृष्ण भक्त-वत्सल प्रभु है जो मानव से लेकर हाथी जैसे जीव के समक्ष संकट उपस्थित होने पर प्राणिमात्र के प्रति समदृष्टि रखते हुए उसे संकट से तत्काल उबारकर प्राण-रक्षा करते हैं। संकेतार्थ में मीराँ कृष्ण से निवेदन करती है कि आप अपनी कृपादृष्टि से मुझे भी उपकृत कीजिए-
        बूडते गज ग्राह मार्यो, कियो बाहर नीर।
        दासी मीराँ लाल गिरधर, दुख जहाँ तहाँ पीर।24


मीराँ ने एकपक्षीय विरह का वर्णन ही नहीं किया है बल्कि अल्प मात्रा में ही सही प्रभु मिलन के परमानन्द का भावपूर्ण अंकन भी किया है। जो कृष्ण-भक्ति में विरही मीराँ के हृदय के उत्साह और उमंग को ध्वनित करता है-
        सजि सोलह सिणगार, पहिरि सोनै राखड़ी।
        साँवलिया सूँ प्रीत, औराँ सूँ आखड़ी।
        पतिबरता की सेज प्रभूजी पधारिया।
        गावै मीराँबाई, दासी कर राखिया।।25

कहीं मीराँ भावविभोर हो गा उठती है-
        अँसुवन जल सींचि-सींचि प्रेम-बेल बोई।
        अब तो बेल फेलि गई, आणँद फल होई।।26


 मीराँ की भक्ति अद्भुत है, तभी तो कृष्ण-भक्ति में डूबी मीराँ भक्तिकाल में चल रहे अनेक सम्प्रदायों, मत-मतान्तरों का अनुसरण न कर कृष्ण प्रेम में डूब स्वयं पंथ, मतों से निरपेक्ष कृष्ण-भक्ति की नींव रखती है।’’ मीरा का काव्य उनकी निजी अनुभूतियों का काव्य है। उनके आराध्य और उनके बीच कोई कथा नहीं है।.......... मीरा का काव्य अन्तप्र्रान्तीय रूप से विकसित और प्रसारित काव्य है, इसीलिए उनकी अनुभूतियों में सगुण-निर्गुण एक साथ पैबस्त दिखते है।’’27    
मीराँ के अनेक पदों को पढ़ने पर लगता है कि मीराँ सगुण-निर्गुण के बंधनों से बहुत ऊपर उठ गई है। यहाँ भी मीराँ का स्वतंत्रचेता व्यक्तित्व मुखरित हो उठता है। कहीं तो वो ’जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई’ का गायन कर लौकिक पति भोजराज को पति रूप में अस्वीकार करती है तो दूसरी और ’जोगिया से प्रीत कियाँ दुख होइ।’ का करूण गायन करती है एक रूप सगुण तो दूसरा निर्गुण। मीराँ अपनी माधुर्य भक्ति-भावना से परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाली विचारधाराओं का सुन्दर मेल मीराँ की भक्ति की श्रेष्ठता का उच्च मानक है।


मीराँ सांसारिक पति, सास-ससुर, भाई-आदि परिजनों, लौकिक रिश्तों-नातों, राजसी सांसारिक ऐश्वर्य को और मन की समस्त सांसारिक कामनाओं को भगवान श्रीकृष्ण के एकनिष्ठ प्रेम में समर्पित भाव से लय कर देती है और परमानन्द के चिरसुख की सहभागी बन जाती है।
’राम रतन धन पायो; की गायिका मीराँ ने कृष्ण रूपी रत्न को पानेके लिए राजसी वैभव, भोग व ऐश्वर्य के सहज उपलब्ध समस्त साधनों को तिलांजलि देकर कृष्ण-भक्ति में घर-परिवार, समाज की तिस्कृत दृष्टि, लांछनाओं को सहा, पर भक्ति के मार्ग से तनिक भी विचलित नहीं हुई। क्योंकि मीराँ के अनुसार तो-
        सब जग कूड़ो, कंटक दुनिया, दरद न कोई पिछाणै हो।
        मीराँ के पति आप रमैया, दूजो नहिं कोई छानै हो।28
मीराँ सपाट शब्दों में अपने हृदय-उद्गार व्यक्त करती है। डाॅ. प्रभात का यह कथन द्रष्टव्य है, ’’मीरा के काव्य में चिरन्तर नारीत्व की आशा-आकांक्षा और व्यथा का स्वर तो है ही,युग की नारी का मूक विद्रोह भी ध्वनित है। उसमें कबीर का पुरुष-ओज, तुलसी की तम-विभेदक सजगता और सूर की रससिक्तता न हो, पर करूण-माधुर्य क वह स्निग्धता अवश्य है, जो विरोध को आघात से झुकाती नहीं, स्पर्श से विगलित कर देती है।’’29


मीराँ ने मध्यकाल के सामंती परिवेश में राजवधू होते हुए भी बार-बार मर्यादा के नाम पर लगे पारिवारिक बंधनों को तोड़ते हुए अभिव्यक्ति और स्वेच्छा से जीवन जीने की स्वतंत्रता का शंखनाद किया। प्रेमशंकर के अनुसार, ’’मीरा को मध्यकालीन नारी-अस्मिता के रूप में देखा जाना चाहिए और समजादर्शन की दृष्टि से वे एक विशिष्ट स्वर का प्रतिनिधित्व करती है।’’30 मीराँ मानती है कि -
        हरी हितु से हेत कर, संसार आसा त्याग।
        दासि मीराँ लालगिरधर! सहज कर वैराग।।31
मीराँ ने पर्दा-प्रथा, स्त्री-स्वातंत्र्य पर लगे बंधन, विचाराभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बंधनों को तोड़ते हुए साधु-संतों की सत्संगति में ईश आराधना करते हुए हृासोन्मुख हो चली मानवीय मनोभूमि को स्वतंत्रता और समानता की मशाल जला समाज को ’नई दिशा देने में महती भूमिका का निर्वाह किया। राजपरिवार के सदस्यों के कपटपूर्ण आचरण, शारीरिक व मानसिक प्रताड़नाओं को समाज को सामने प्रस्तुत कर खुली चुनौती दी।
        सास लड़ै मेरी ननद खिजावै, राणाँ रह्यो रिसाय।
        पहरों भी राख्यौ चैकी बिठार्या, ताला दियो जुड़ाय।।32
चाहे राणा द्वारा विष प्याला भेजना हो या सर्प पिटारा या शैय्या पर शूल बिछाना। यह प्रताड़नाएँ मीराँ ने कृष्ण-भक्ति के मार्ग में स्वजनों द्वारा झेली और कृष्ण-प्रेम के मार्ग पर आगे बढ़ने की इनकी लालसा इन अवरोधों और व्यवधानों से दृढ़ से दृढ़तर होती चली गई। राणाजी थे जहर दियो म्हे जाणी’, ’विष का प्याला राणाजी ने भेज्या, पीवत मीराँ हाँसी रे।’

 

मीराँ को कृष्ण-कृपा कर पूरा विश्वास है-
        साँप पिटारा राणा भेज्या, मीराँ हाथ दियो जाय।
        न्हाय धोय जब देखण लागी, सालिगराम गइ पाय।
        ..... सूलसेज राणा ने भेजी, दीज्यो मीराँ सुलाय।
        साँझ भई मीराँ सोवण लागी, मानो फूल बिछाय।
        मीराँ के प्रभु सदा सहाई, राखे बिघन हटाय।33

मीराँ राणाजी से कहती है- ’थाँरे रूस्याँ राणा! कुछ नहिं बिगड़ै, अब हरि कीन्हाँ महर।’
मीराँ ने साधु-संतों और सद्गुरू के प्रति अनेक पदों में पूज्य भाव प्रकट किया है, जो उनके सद्व्यवहार और चारित्रिक उत्कृष्टता का प्रमाण है। तुच्छ सांसारिक बंधन मीराँ को भक्ति के मार्ग से विचलित नहीं कर पाए। मीराँ ने आत्मा की स्वतंत्रता के माध्यम से प्रभु प्राप्ति के मार्ग में सफलता पाने का लक्ष्य निर्धारित करते हुएउसका अनुसरण किया था। वर्तमान समय में स्त्री-सशक्तिकरण के इस दौर में भी हम इतने क्रान्तिकारी  कदम नहीं उठा पाते हैं, जितने मीराँ ने सामन्ती परिवेश और राज्यों के आपसी संघर्षों के समय निडर होकर उठाया। रामस्वरूप चतुर्वेदी के शब्दों में, ’’आधुनिक नारी सशक्तिकरण युग के बहुत पहले मीराँ के अपने आप को स्वयं सशक्त बना लिया था, व्यक्तिगत जीवन में भी और उससे जुड़ी काव्य-रचना में भी।’’34


 जब पारिवारिक बंधन असह्य हो गए तो मीराँ ने उन्हें त्यागकर द्वारका में भगवान रणछोड़ के मन्दिर में शेष जीवन पूर्ण निष्ठा से ईश-भक्ति में व्यतीत किया। यही उनके जीवन और भक्ति की उत्कृष्टता है। अपने समकालीन भक्त कवियों में मीराँ का यह क्रांतिकारी कदम स्त्री-स्वातंत्र्य के पक्षधरों के सामने अनूठी मिसाल पेश करता है। मीराँ का गृह त्याग पारिवारिक बंधनों, वर्जनाओं से पलायन न होकर पूर्णरूपेण कृष्णमयी बन जाने का कर्मयोगी संदेश है, जो उन्होंने इस समाज के समक्ष प्रस्तुत किया। मीराँ कृष्ण प्रेम मंे डूबकर आन्तरिक व बाह्य दोनों मोर्चों पर संघर्षरत रही और अन्त में विजय उनके कृष्ण-प्रेम की ही हुई।
मीराँ ने यह समझाया कि ’’कृष्ण की केवल पूजा ही न करें, उन्हें जीना शुरू करें, यही कृष्ण का पुनर्जन्म है। कृष्ण-वृत्ति फैल जाए तो दुनिया के बहुत से उपद्रव बंद हो जाएंगे। दुनिया ज्यादा शांत, आनंदमय होगी।’’35


मीराँ के अध्ययन से बार-बार यही ध्वनित होता है कि मीराँ स्वतंत्र व्यक्तित्व की धनी थी। जो परिवार, समाज, क्षेत्र, मत-मतान्तरों, भाषा, बोली के इन संकीर्ण बंधनों को तोड़कर सर्वात्म की एकता अद्भुत मानवता की अनूठी मिसाल पेश करने को अवतरित हुई।
अपनी भक्ति के श्रेष्ठता से सदियों तक मीराँ का नाम चिरस्मरणीय रहेगा। मीराँ के उल्लेख के बिना स्त्री-विमर्श की चर्चा तो अधूरी है ही कृष्ण और उनकी भक्ति भी अधूरी है।



संदर्भ-

1.    राजस्थान की भक्ति-परम्परा एवं संस्कृति-दिनेश चन्द्र शुक्ल ओंकार नारायण सिंह, पृ. 54
2.    ओशो वल्र्ड-ओशो-लेख ’मीरा के लिए कृष्ण एक आंतरिक सत्य’ से उद्धृत, फरवरी 2002, पृ. 35
3.    मीराँ पदावली - लेखक-सम्पादक - डाॅ. शम्भुसिंह मनोहर, पद संख्या 9, पृ. 104
4.    मीरा का सौन्दर्यबोध-प्रधान सम्पादक - डाॅ. रणजीतसिंह गठाला - डाॅ. कृष्णचन्द्र शास्त्री के आलेख-’मीरा के पदों में लौकिक सौन्दर्य की अभिव्यक्ति’ से उद्धृत, पृ. 53
5.    मीराँ पदावली - लेखक-सम्पादक - डाॅ. शम्भुसिंह मनोहर, पद संख्या 6, पृ. 101
6.    उपरिवत्, पद संख्या 3, पृ. 100
7.    भक्त मीराँबाई (भक्तिकालीन परिप्रेक्ष्य में) डाॅ. भगवती उपाध्याय, पृ. 64
8.    जीवन में उतरेंगे कृष्ण-अमृत साधना-राजस्थान पत्रिका परिवार परिशिष्ट, 28अगस्त 2013, पृ. 21
9.    भक्ति काव्य-यात्रा (कबीर-जायी-सूर-तुलसी-मीराँ के संर्दा में) रामस्वरूप चतुर्वदी, पृ. 91
10.    मीराँ पदावली - सं. चुन्नीलाल शेष, पृ. 73
11.    मीराँ पदावली - लेखक-सम्पादक - डाॅ. शम्भुसिंह मनोहर, पद 74, पृ. 174
12.    उपरिवत्, पद 75, पृ. 175
13.    उपरिवत्, पद 91, पृ. 198
14.    उपरिवत्, पद 80, पृ. 187
15.    उपरिवत्, पद 4, पृ. 100
16.    भक्तिकाव्य का समाजदर्शन-प्रेमशंकर, पृ. 77
17.    हिन्दी साहित्य का आधा इतिहास-डाॅ. सुमन राजे, पृ. 150
18.    मीराँ पदावली-लेखक-सम्पादक - डाॅ. शम्भुसिंह मनोहर, पद 97, पं. 201
19.    उपरिवत्, पद 74, पृ. 174
20.    उपरिवत्, पद 79, पृ. 185
21.    उपरिवत्, पद 76, पृ. 176
22.    उपरिवत्, पद 4, पृ. 100
23.    उपaरिवत्, पद 100, पृ. 202
24.    उपरिवत्, पद 37, पृ. 137
25.    उपरिवत्, पद 101, पृ. 203
26.    उपरिवत्, पद 10, पृ. 105
27.    हिन्दी साहित्य का आधा इतिहास - डाॅ. सुमन राजे, पृ. 149
28.    मीराँ पदावली - लेखक-सम्पादक - डाॅ. शम्भुसिंह मनोहर, पद 45, पृ. 144
29.    मीराबाई - डाॅ. प्रभात, पृ. 482
30.    भक्तिकाव्य का समाजदर्शन - डाॅ. प्रेमशंकर, पृ. 77
31.    मीराँ पदावली - लेखक-सम्पादक-डाॅ. शम्भुसिंह मनोहर, पद 100, पृ. 202
32.    उपरिवत्, पद 25, पृ. 122
33.    उपरिवत्, पद 23, पृ. 121
34.    भक्ति काव्य-यात्रा (कबीर-जायसी-सूर-तुलसी-मीराँ के संदर्भ में) - डाॅ. रामस्वरूप चतुर्वेदी, पृ. 94
35.    जीवन में उतरेंगे कृष्ण-अमृत साधना- राजस्थान पत्रिका, परिवार परिशिष्ट, 28 अगस्त 2013, पृ. 02


- डाॅ. अंजु
 
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डाॅ. अंजु

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