जून 2015
अंक - 4 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविताएँ

हारे हुए सपनों की सनक

सपनों की लुगदी बनाओ
और चिपका लेना ज़िन्दगी का फटा पन्ना
उसने कहा था
और मैंने ब्रह्म्वाक्य मान किया अनुसरण

आज हारे हुए सपनों की भीड़ में खड़ी
पन्ना-पन्ना अलग कर रही हूँ
तो हर पन्ना मुंह चिढ़ा रहा है
मानो कह रहा है
सपने भी कभी सच होते हैं

और मेरे हारे हुए सपनों की सनक तो देखिये
अनशन पर बैठ गए हैं

जबकि जानते हैं ये सत्य सपनों के आकाश कभी नीले नहीं हुआ करते


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नींद के प्रवासी सम्मेलन

नींद के प्रवासी सम्मेलनों में
ढोलक की थाप-सी होती हैं आहटें
कुछ सोच की
कुछ ख्याल की
कुछ सवाल की
कुछ जवाब की
और दिलो-दिमाग के जंतु
करते हैं गुफ्तगू

बिना मंजीरों के बढ़ता शोर
जब कोलाहल में बदलता है
तब कोलाहल से उपजी
बेचैनी के कीट पतंगे
नींद के मुहाने पर
करवटें बदलने लगते हैं
और शुरू हो जाता है
एक लोकसभा का सत्र
जहाँ सब सिर्फ
हंगामों की भेंट चढ़ाना चाहते हैं
हर सोच की कंदराओं में उगे
कुछ खुराफाती बिलों को
क्योंकि
समाधान की ड्योढ़ी पर तो
जाने कितने जननायक
आंदोलन के लिए बैठे होते हैं
ऐसे में हल न निकलने लाज़िमी हैं

और नींद का प्रवासी सम्मलेन
सफल सम्मेलनों का खिताब पा
अग्रिम पंक्ति में खड़ा
मुस्कुरा रहा होता है अपनी जीत पर

हाँ....अपनी जीत पर
क्योंकि
प्रवासी तो प्रवासी होते हैं
वो कब अपनी जमीन को
अपना समझते हैं
सिर्फ दाना चुगने आते हैं
दाना चुगकर चले
मानो ब्याह करने को दूल्हा
सुदूर पार आया हो
और दुल्हन को विदा कराने के बाद
चल पड़ा हो मंज़िल की तरफ
अब मुड़ कर देखने की कवायद कौन करे
वैसे भी प्रवासी शब्द का जुड़ना ही
पृथक कर देता है
दिल को धड़कन से
फिर कैसे संभव है
करवट बदलती बेचैनियों द्वारा
प्रगाढ़ निद्रा का आलिंगन

हाँ....नींद तुम भी प्रवासी हो जाती हो

जब तुम्हारे सम्मेलनों में
शामिल हो जाती हैं
सारे जहान की
दुश्वारियां, बेचैनियां, बदकारियाँ
और समस्या के समाधान पर
खड़ा होता है अहम
हवा का रुख खुद की तरफ मोड़ने का आग्रह लिए!!!


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लौटना है मुझे एक दिन

छोड़ आयी  हूँ
अपनी धरा की संवेदना
अपने आकाश की विशालता
और अपने अंतस की
सारी कलुषता, सारी उज्ज्वलता
सारी मानवता, सारी नृशंसता
करके खुद को मुक्त
आत्म विवेचना से
लिखना है नया अध्याय
जिसमें न रीतिकाल हो न छायाकाल
न भूत, न भविष्य
बस वर्तमान की ड्योढ़ी पर
जलाकर विवशताओं, बेचैनियों,
हताशाओं की मशाल
करनी है रौशन अब हर बुलंद इमारत

सृष्टि का चक्र हो या जीवन
लौटकर आना नियति है उनकी
फिर कैसे संभव है
मेरा कविता में स्थिर निवास
इसलिए
करके आखिरी प्रणाम
प्रयाण से पहले
लौटना है मुझे एक दिन
कविता से वापस खुद की ओर


- वन्दना गुप्ता

रचनाकार परिचय
वन्दना गुप्ता

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