प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2017
अंक -34

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

जो दिल कहे!
किसानों का कसूरवार कौन
 
किसान की फसल जब तबाह हो जाती है
तब सियासत की फसल लहलहा उठती है।
 
'भारत एक कृषि प्रधान देश है।' यह जुमला अब ठीक उसी श्लोक या मंत्र की तरह हो गया है, जिसे उसका अर्थ न जानने वाले पंडे-पुजारी भी धार्मिक अनुष्ठानों के समय गलत-सलत ढंग से उच्चारते रहते हैं और उसे सुनने वाले उपस्थित श्रध्दालुजन यह समझते हैं कि मंत्रोच्चार करने वाला पुजारी काफी विद्वान है। लेकिन इसी तरह जब हमारे नीति-निर्माता, योजनाकार जब मौके-मौके पर कहते हैं कि हमारा देश एक कृषिप्रधान देश है तो उनके मुँह से यह सुनकर न तो हँसी आती है और न ही गुस्सा, बल्कि यह सोचना पड़ता है कि हमारे ये नीति-नियामक या तो मूर्ख हैं या फिर धूर्त। हाँ, भोले तो कतई नहीं।
अगर वे देश के कृषि प्रधान होने के मर्म को वाकई समझते होते तो देश के किसानों का दर्द या उनकी बदहाली को भी शिद्दत से महसूस करते। हमारे ये योजनाकार आए दिन ऊँची विकास दर का हवाला देकर देश की अर्थव्यवस्था की गुलाबी तस्वीर पेश करते रहते हैं और देश के लोगों को सब्जबाग दिखाते हैं। लेकिन ऐसा करते समय वे देश के किसानों की हालत को नजरअंदाज कर जाते हैं। जब देश की दो तिहाई आबादी की आजीविका खेती से जुड़ी हुई हो तो ऐसे में कृषि को अलग करके किया जाने वाला आर्थिक विकास का कोई भी दावा कैसे विश्वसनीय माना जा सकता है?
 
सवाल उठता है कि खेतीबाड़ी पर निर्भर लोग क्यों मौत को गले लगा रहे हैं और यह सिलसिला आखिर क्यों नहीं थम पा रहा है? आधिकारिक तौर(NCRB) पर वर्ष 2001-15 के बीच 2,34,642 किसानों की आत्महत्या की घटनाएँ दर्ज हुईं। दरअसल खेती कभी मुनाफे का धंधा हुआ करती थी, लेकिन अब वह घाटे का कारोबार हो गई है। देश में खेतीबाड़ी की बदहाली हाल के वर्षों की कोई ताजा परिघटना नहीं है, बल्कि इसकी शुरूआत आजादी के पूर्व ब्रिटिश हुकूमत के समय से ही हो गई थी। कोई समाज कितना ही पिछड़ा क्यों न हो, उसमें बुनियादी बुध्दिमानी तो होती ही है।
अंग्रेजों से पहले के राजे-रजवाड़े खेतीबाड़ी के महत्व को समझते थे। इसलिए वे किसानों के लिए नहरें-तालाब इत्यादि बनवाने और उनकी साफ-सफाई करवाने में पर्याप्त दिलचस्पी लेते थे। वे यह अच्छी तरह जानते थे कि किसान की जेब गरम रहेगी तो ही हम मौज कर सकेंगे। उस दौर में देश के हर इलाके में खेतों की सिंचाई के लिए नहरों का जाल बिछा हुआ था।
भारत ही नहीं, कृषि पर आधारित दुनिया की किसी भी सभ्यता में नहरों का केंद्रीय महत्व हुआ करता था। यह भी कह सकते हैं कि यही नहरें उनकी जीवन रेखा होती थीं। भारत में इस जीवन रेखा को खत्म करने का पाप अंग्रेज हुक्मरानों ने किया। जहाँ-जहाँ उन्होंने जमींदारी व्यवस्था लागू की वहाँ-वहाँ नहरें या तो सूख गईं या फिर उन्हें पाट दिया गया।
भ्रष्ट और बेरहम जमींदार पूरी तरह अंग्रेज परस्त थे और राजाओं के कारिंदे होते हुए भी अंग्रेजों को ही अपना भगवान मानते थे। किसानों के दुख-दर्द और समस्याओं से उनका दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं था। उन्हें तो बस किसानों से समय पर लगान चाहिए होता था। समय पर लगान न चुकाने वाले किसानों पर जमींदार और उनके कारिंदे तरह-तरह के शारीरिक, मानसिक और आर्थिक जुल्म ढहाते थे। रही सही कसर सूदखोर महाजन पूरी कर देते थे, जो किसानों को कर्ज और ब्याज की सलीब पर लटकाए रहते थे। तो इस तरह ब्रिटिश हुक्मरानों के संरक्षण में, जालिम जमींदारों और लालची महाजनों के दमनचक्र के चलते भारतीय खेती का सत्यानाश हुआ।
 
बहरहाल हमारे देश में किसानों की आत्महत्या की घटनायें चिंता का विषय तो है पर यह विषय भी महत्वपूर्ण है कि छोटे व्यवसायी तथा मजदूर वर्ग में यह समस्या बढ़ी है। इतना ही नहीं धनिक वर्ग के लोग भी आत्महत्यायें कर रहे हैं। किसानों की आत्महत्याओं की संख्या तो मिल जाती है पर दूसरे वर्ग के लोगों का आंकड़ा पता नहीं चलता। अलबत्ता समाचारों को देखें तो आत्महत्या को उसी तरह किसी वर्ग विशेष से जोड़ा जाता है जैसे कल्याण के विषय को जोड़ा जाता है। कर्ज न चुकाने पर किसान ही आत्महत्या करते हैं यह सोचना भी गलत होगा। यह अलग बात है कि अन्य वर्गों से अनुपात में अधिक होने पर उनकी संख्या भी अधिक हो सकती हैं।
 
मेरा मानना है कि उदारीकरण के चलते अर्थव्यवस्था के बदले रूप के कारण ही हमारे देश में सामाजिक ढांचा गड़बड़ाया है। मकान, गाड़ी, टीवी,फ्रिज और कंप्यूटर के साथ ही अन्य उपभोग की वस्तुऐं क़िस्त(कर्ज) पर मिल रही हैं और लोग ले रहे हैं।  समस्या है उनके भुगतान की।  क़िस्त पर लेने का मतलब यह है कि कहीं न कहीं लोगों के पास बचत की कमी है। बचत की कमी इसलिये क्योंकि उनकी आय कम है।  तय बात है कि कर्ज लेकर उस आय से क़िस्त का भुगतान करना संभव नहीं होता। हमारे यहां ऋषि चार्वाक एक सिद्धांत चर्चित है कि ‘कर्ज लो और घी पियो’।  इसे व्यंग्यात्मक रूप से कहा जाता है।  वरना तो यह माना जाता है कि कर्ज मर्ज की तरह होता है जो बढ़ता ही जाता हैं।  प्रचार माध्यमों के समाचारों से पता चलता है कि बैंकों का ढेर कर्ज डूबत खाते में है।  सुनने में तो यह आता है कि कि बड़े ऋणदाताओं से कर्ज भले ही वसूल न कर पायें पर छोटे के मामले में उनका वैसा पैमाना नहीं है। वैसे कर्ज वसूली में सार्वजनिक बैंक अधिक संकट खड़ा नहीं करते पर  निजी बैंक तथा साहूकारों के कर्जे न चुकाना एक भारी तनाव बढ़ जाता है।
 
महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारे देश में उपभोग प्रवृत्ति में गुणात्मक परिवर्तन आया है जबकि आय के विषय में यह बात नहीं कही जा सकती। स्थिति यह है कि लोगों ने खाने पीने से अधिक आधुनिक सामानों पर व्यय करना शुरु कर दिया है।  किसान, छोटे व्यापारी तथा लघु उद्योगपति की आय के स्वरूप में वैसी प्रगति नहीं हुई पर उपभोग प्रवृत्ति के बदलाव ने उन्हें निम्न वर्ग में ला खड़ा कर दिया है। मूल बात यह है कि समाज को अगर वर्गों में बांटकर हम उनकी आत्महत्याओं की संख्या पर बहस करेंगे तो कहीं निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पायेंगे।  मध्यम वर्ग किसी भी समाज का एक महत्वपूर्ण सहयोगी होता है और वह इस नयी अर्थव्यवस्था में स्वयं को असहाय पा रहा है। इस पर हमारे देश में धार्मिक कर्मकांड, विवाह तथा मृत्यु के अवसर पर अपनायी जानी वाली खर्चीली रीतियों की धारा निरंतर प्रवाहित हैं जो मध्यम वर्ग के लिये संकट का कारण बनी हुई हैं।  किसान फसल आने के पहले ही कर्जा लेते हैं तो छोटे व्यवसायी और अन्य श्रमिक वर्ग आय के मौसम के आधार पर उधार पर खरीददारी करने लगा है।
 
कहने का अभिप्राय यह है कि हमारे देश के आर्थिक, सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक विद्वानों को समाज को एक इकाई मानकर विचार करना चाहिये।  इस देश में भूमिस्वामी तथा मजदूर दोनों ही किसान की श्रेणी में आते हैं। अगर परेशान हैं तो दोनों ही हैं। इतना ही नहीं कृषि से अलग व्यवसाय करने वाले लोग भी कम हैरान परेशान नहीं है। किसानों की आत्महत्या का एक सामाजिक पहलू अवश्य दर्दनाक है कि आमतौर से ग्रामीण क्षेत्रों में इस तरह की घटनायें नहीं होती थीं पर यह भी सच है कि शहरी हवाओं ने अब ग्रामों में बहना शुरु कर दिया है। इसलिये पूरे समाज की स्थिति पर दृष्टिपात करना होगा।
जिस खेत से दहका को मयस्सर नहीं रोटी
उस खेत के हर गोशा ए गंदुम को जला दो !
अल्लामा इकबाल ने जब ये शेर कहा था तब के दौर की यही इन्तहा रही होगी मगर आज इंतिहा अपने हदें पार कर चुकी है। किसानों के नाम पर बेशर्म सियासत का बाजार गर्म है। राजनीतिक दलों ने अपने कोठे सजा लिए हैं। मगर मुल्क के किसान की निगाह में उसका आसरा अब महज रस्सी का वो टुकड़ा ही रह गया है जिसे गले में फंसा कर वो मौत की पनाह में चला जा रहा है।
 

- नीरज कृष्ण