प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2017
अंक -50

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

लघुकथा- परवरिश

आईएएसबी में चयन होने के बाद प्रसन्नता से अमित डरते-डरते दादी के चरण स्पर्श को झुका ही था कि अश्रुपूरित अवरुद्ध कंठ से दादी बोली, "आ मेरे लाल, तूने वो कर दिया, जो मेरा बेटा नहीं कर पाया। तेरे आईएएस दादाजी......कहते कहते कुछ रुकी दादी, फिर उसी जोश से "तूने अपने दादाजी का सपना पूरा कर दिया, मेरा आईएएस पोता।" गले ऐसे लगाया, जैसे छूट न पाए।
दादी के स्नेह से वंचित अमित आश्चर्य से माँ-पिता की ओर देख रहा था। "काश! तेरे दादाजी ज़िन्दा होते।" दादी स्नेह की अविरल धारा के साथ बोले जा
रही थी। इस दृश्य को देख अश्रुपूरित नेत्र लिए नेहा किचन में और अजय अख़बार पढ़ने में अपनी व्यस्तता प्रदर्शित कर, ख़ुद की भावनाओं को छिपाने का प्रयास करने लगे।

माँ नेहा के आगे सत्ताईस वर्ष पहले का वह दृश्य घूम गया। जब वह अमित को अपनी ममता का आकार देने के लिए लाई थी। माँ-बाबू जी कितना
नाराज़ हुए थे। ख़ानदान, खून, धर्म, जाति सबका हवाला दिया था।
नाराज़ होते हुए ख़ानदान के ही किसी बच्चे को ममता देने को कहा था। इन सबसे परे इन दोनों ने भी अच्छी परवरिश को ही आधार माना था। नाराज़गी के बीच आज उनकी परवरिश और 'बाल सदन' (अनाथालय) से आये अमित की मेहनत ने पिछले सत्ताईस सालों से माँ जी की आँख पर बंधी ख़ानदान, खून, धर्म, जाति की पट्टी खोल दी थी।


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लघुकथा- एक सौ पचास रुपए

रमा आज स्वयं में बहुत प्रसन्न एवं करुणा से युक्त थी। बार-बार ईश्वर से उसके स्वस्थ होने की कामना कर रही थी। तभी फोन की घण्टी ने उसकी तन्द्रा भंग की। फोन उठाते ही उसने कहा, "अच्छा हुआ विभा तुमने फोन किया। आज मैं बहुत दुखी हूँ और खुश भी।
विभा- ऐसा क्या हुआ?
रमा- क्या बताऊँ यार! आज मै बैंक से लौट रही थी, एक आदमी फ़ोन पर किसी से बात कर रहा था कि अब ना बचा पाइब लरिकन की अम्मा का, बप्पा। चार हजार का खून चढ़ाई गवा, अब डॉक्टर कहत हैं सुई लगिह, ग्यारह सौ पचास की सुई होत है, हमरे पास बस हजार रूपया बाटे। दुकानदार सुई
नाहीं देत है, अब का करि बप्पा, अब ना बचिहै उई।
यह सब सुनकर मैंने उसे रोका और......
फ़ोन के दूसरी ओर से विभा बोली- कहीं तुमने उसे रूपये तो नहीं दे दिए।
"हाँ, एक सौ पचास रुपये दिए, तुम्हें कैसे पता, अस्पताल का नाम भी पूछा पर वो बहुत खुश हुआ और दुआएं देते हुए निकल गया। इतने कम रूपये के लिए कोई मर जाता, मैं स्वयं को माफ़ नहीं कर......
"चलो एक सौ पचास रूपये ही दिए। हम और दर्शिका तो हज़ार से ज़्यादा दे चुके हैं। बाद में पता चला कि ये चरस गांजा पीने वालों का गिरोह है, जो लोगों की भावनाओं के साथ खेलता है।
रमा- क्या!! हे भगवान, किस पर विश्वास करें। उसका कभी भला न हो। मेरी गाढ़े पसीने की कमाई!!!


- तनु श्रीवास्तव
 
रचनाकार परिचय
तनु श्रीवास्तव

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कथा-कुसुम (2)