प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2017
अंक -50

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

यादें

नथ

 
उस दिन हमारे बैंक से नोटिस आया कि बैंक की शाखा का स्थानांतरण हो रहा है अतः जिन ग्राहकों के लॉकर हैं, वे उसे खाली कर दें। पतिदेव लॉकर से सारा सामान उठा कर घर ले आये। वैसे तो उसमे हमारे जैसे वेतन याफ्ता, पेंशन प्राप्ता, साठ- सतर वर्षीय बूढ़े  के लॉकर में कुछ फिक्स डिपोजिट के कागज़ तथा दो बेटियों के विवाह उपरान्त कुछ बचा खुचा, गहनों के नाम पर टूटे कंगन, कान का एक बुन्दा या फिर चांदी के सिक्के इतना ही पड़ा था। भला हो अंग्रेजों का, उन दिनों टिन के बने टॉफी के डिब्बे आया करते थे और वे बड़े उपयोगी सिद्ध होते थे। हमारे पूजनीय पिताजी तथा जेठ आदि सबके शेविंग का सामान उन्ही डिब्बों में सदियों रखा जाता रहा है। आज भी जंग लगे उन डिब्बों से बिछुडना उन्हें पीड़ा पहुंचा  जाता है और इन्ही डिब्बों में सुरक्षित रखा जाता था गहना -जेवर। वैसा ही डिब्बा जिसमे सफ़ेद रुई, जो अब पीली पड गई थी और लाल पतंगी कागज (फटा हुआ) गुदड़ी में लाल मुहावरे को चरितार्थ करता हुया, जब घर लाया गया, तब हमने अपनी जायदाद के मनोहारी दर्शन किए ।  एक अदद गले की हँसिया, जिसमे सोना कम पीतल ज्यादा था।  सुनार ने बेईमानी करी थी। दो कान के झुमके अलग अलग भांत के, एक आध चूड़ी, कुछ दो चार अजीबो गरीब दिखने वाली अंगूठियाँ और अचानक दिखी नौ नगीनों जड़ित नाक की समूची नथ ;  
 
“अरे ये तो वो ही नथ है जिसे रश्मि भाभी ने मेरी शादी पर पहनाया था!” 
अपनी हथेली पर उसको  बड़े दुलार से  लिटाया , उसका सौंदर्य निहारा। अनुपम रूपमती नथ ! उस डिब्बे की एकमात्र शोभा! अचानक यादों की बारात हमारी अपनी बरात के साथ, बैंड बाजे के साथ, मानस पर उमड़ पडी। याद आया वो दिन जब हमें  दुल्हिन बनाया जा रहा था, नाते रिश्तेदारों से घर भरा था।  'दादी जी ' तो रहीं नही थी अतः घर की सबसे बड़ी या यूँ कहिये चौधराहट छाटने वाली बड़ी ताई जी, पुरखों के गांव से स्पेशली बुलाई गई थी क्योकिं उनकी सबसे छोटी देवरानी यानी कि हमारी अम्मा को तो शादी ब्याह करने की अक्ल नही थी!  सात बच्चो को जन्म देने वाली, उन्हें उच्चतम  शिक्षा से पारंगत करने की क्षमता तो अम्मा कर सकती थी, किन्तु शादी- ब्याह में ऊँच -नीच का उन्हें क्या ज्ञान धरा था?  रस्मों की भरमार , दिन भर में पच्चीसों रस्में, उन रस्मों में तो जैसे ताईजी ने पी. एच .डी. कर रखी थी और मजाल की उनकी बात कोई टाल दे। अच्छे  भले शिक्षित पिताजी जो भौतिक शास्त्र के प्रौफैसर थे, न कोई देवी देवता को मानते थे न किसी प्रपंच में पड़ते थे किन्तु उस समय बेटी के ब्याह पर जैसा ताई जी ने उन्होंने भी वैसा ही किया, शायद शिष्टतावश किन्तु २१ वर्षीय, अंग्रेजी में एम्. ए पास मॉडर्न कन्या ,यानि (करेला और नीम चढ़ा) उसे ताई जी की  कोई बात फूटी आँख नही सुहाती थी । गौर पूजा के समय ताई जी ने हुक्म लगाया 
" सिर धो कर नहाइयो  और सीधा बिना किसी को छुए ,आँगन में बनी वेदी के पटरे पर बैठ जइओ”| 
 
 कन्या ने विद्रोह किया, शोर  मचाया। 
"कल ही सिर  धोया था"( सर्दी का मौसम था तिस पर उसे भयंकर जुकाम हो गया था ), परन्तु ताई जी ने उसकी एक नही सुनी, अम्मा सिर  पर पल्ला रखे उसे घूर रही थी ,मानों कह रही हो ( मेरी इज्ज़त का फालूदा मत बना ) झक मार कर उसे दोबारा सिर धोना पड़ा , और सफ़ेद तौलिया बालों में लपेट कर आज्ञाकारी पुत्री का सा रोल अदा करने आँगन में बिछे पटरे ( पटरा बड़ा महत्वपूर्ण बना हुया था , उन दिनों ,उसके नीचे आटे से चित्रकारी की गई थी ) पर बैठने का उपक्रम करने लगी, अभी आधी बैठी थी की ताई जी ने छपट कर उसके सिर पर बंधा तौलिया खींच कर खोल दिया ,
"अरे ! घोर अपशगुन! सिर पर सफ़ेद कपड़ा बाँध कर क्यों बैठ गई?”
काटो तो खून नही, क्रोध से भुनभुनाती हुयी कन्या वेदी से उठ खडी हुई ;
“नहीं करनी मुझे ऎसी शादी, ये भी कोई तरीका है, कोई मैनर्स नहीं हैं? एक हज़ार टोने टोटके लगा रखे हैं, तंग कर दिया" 
 
रिश्तेदारों में फुसफुसाहट शुरू हो गई ;
"हाय कैसी बेहया  लड़की है", चाची, बुआ, पड़ोसिनों में यह घटना  'ब्रेकिंग न्यूज' की भांति करंट सी दौड गई | बड़ी मुश्किल से मौसी ने समझा बुझा कर गौरी पूजा की रस्म करवाई, सिर के गीले बालों पर गुलाबी दुपट्टा ड़ाल कर। ऐसा लग रहा था जैसे सफ़ेद तौलिया बाँधने मात्र से वो विधवा हो जाएगी। रीति-रिवाज़ विवाहित जीवन में मंगल लाने वाली 'इन्शोरंस कम्पनियाँ' है और अगर प्रीमियम नहीं भरा तो विवाह टूट जाएगा। तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं को मनाना क्या इतना सरल होता? कभी चंद्रमा जी को प्रसन्न किया जाता, कभी पुरखों को, कभी दीवार पर थापे, कभी गेहूं, हल्दी, चावल की शामत आती, शुभ -अशुभ नेग! पता नहीं कौन सी किताबों में ये सब लिखा था? और ताई जी को इतना याद कैसे रहता था? गाँव से ताई जी के साथ बड़े बड़े पतीले ,कढ़ाई ,ढ़ेरों बर्तनों के साथ रिक्शा पर लदकर आईं थीं, मिसरानी जी!  जिनका काम रसोई में चूल्हा मैनेज करना था और दूसरा उनका परम प्रिय काम था, जहाँ  कोई शगुन का समय आया, वहाँ वो बेसुरी ढोलक बजाने बैठ जातीं! वे अपनी  सफ़ेद किनारी वाली धोती का पल्ला मुँह में दबाकर इतना  बेसुरा गातीं, इतना बेसुरा गातीं  कि उपस्थित श्रोता हँसी नही दबा पाते। मिसरानी जी से मज़ा लेने के लिए युवा वर्ग के लड़के लड़कियाँ अपना मनोरंजन करने की खातिर उनसे फरमाइश करते ;  
“मिसरानी जी, वो वाला गीत गाना”  ले दे के उन्हें एक ही तो 'बन्नी ' आती थी और वे बड़ी ‘खुस’ हो कर राग अलापने लगतीं;
“ पटरे पे बैठी लाडो भजन करे  ----” और सब का हँस-हँसकर बुरा हाल हो जाता। आखिर ‘लाडो’ अपनी शादी पर भजन क्यों कर रही होगी? कोई सोचे  वो क्या संन्यास लेने जा रही थी ?
 
आखिर  बारात आने का समय हुया। दुल्हिन का इंस्पेक्शन करने ताई जी तथा पूरा प्रपंची स्त्री समाज हमें नख से शिख तक बारीकी से जाँच करने हमारे  कमरे में आया | बड़े यत्न से हमारी  प्रिय सखी ने हमारा श्रृंगार किया था, कहीं कोई कसर नही छोडी थी किन्तु उसे क्या पता था कि 'कमी' किस कोने से टपक पड़ेगी, देखते ही  ताई जी गरजीं-
“नथ कहाँ है? नाक सूनी क्यों है?  मामा के यहाँ से नथ आनी चाहिए थी?” अब तो मानो कोहराम छिड़ गया। एक बार फिर ,खुसुर –पुसुर होने लगी; 
“ हाय! नथ नही आई भात में?”
 
अम्मा के पीहर वालों को नीचा दिखाने का इससे बढ़िया मौक़ा और क्या हो सकता था, भला! बेचारी अम्मा का चेहरा फक पड गया। अपनी सास को संकट में देखकर, रश्मि भाभी भाग कर अपनी नथ ले आईं और दुल्हिन को यानि हमें पहना दी।  सबने राहत की साँस ली, उधर बैंड - बाजे की आवाज़ कानों में पड़ते ही सबके सब बारात देखने भाग खड़े हुए। जैसे- तैसे ब्याह पूर्ण हुआ और बिदाई के ग़मगीन वातावरण के चलते जिसे देखो  वही टसुए बहा रहा था। हमारे यहाँ लोगों को झूठ- मूठ  का रोना खूब आता है । क्षण भर में रोने लगते हैं, क्षण भर में हँसने!  विदा होती कन्या ने भी कुछ आँसू ताई जी के डर के मारे अपने नेत्रों से टपकाए। सोचा, रोना तो पड़ेगा वरना ताई जी कहेंगी, कैसी  बेशर्म है। जब बिदाई की तमाम रस्में खत्म हो चुकीं  और हमारे पैर घर की दहलीज़ पार करने ही वाले थे कि एक क्षीण सी आवाज़ में किसी ने टोका ;
“रश्मि की नाक की नथ तो निकाल लो।”
ओह! सुनते ही  ताई जी एकदम मैदाने -जंग में आ खडी हुई और बोलीं-
“इस नथ में मुन्नी के भाँवर  पड़ गए है, अब ये इसकी नाक से नहीं उतारी जा सकती।”
किसमें इतना दमखम था कि हिटलरी ताई जी की अवज्ञा कर सकता। अतः मुन्नी की विदाई उसी नथ में हो गई। 
 
आज नथ को देखते ही 'मुन्नी' को पूरी की पूरी 'दास्ताने नथ' याद हो आई। 
व्यंग्य करते हुए हमने अपने पति से कहा-
“वाह रे ताई जी, वाह! आपका तर्क! इसी नथ में तो रश्मि भाभी के भी फेरे हुए होंगे, तब उसे पहनाने में उन्हें  कोई आपत्ति नहीं हुई?"
पति उवाचः,"होती भी क्यों? रश्मि भाभी तो बहू ठहरी! बहू का जेवर बेटी को पहनाने में उन्हें क्यों और कैसे एतराज़ होता?”
“उफ़! ये डबल स्टैण्डर्ड"
उसे अपने पर क्रोध आया। क्या वो भी इन  दकियानूसी अंधविश्वासो से ग्रसित थी? उसने क्यों  विरोध नहीं किया और क्यों नही नथ वापिस की? ढेरों प्रश्न उसे विचलित करने लगे। विवाह को आज लगभग सैतालीस  वर्ष हो गए हैं, आज उस नथ का ख्याल आया? आज वो चेती है? अपने को धिक्कारते हुए निश्चय किया कि अगली बार जब रश्मि भाभी को मिलेंगीं  तब उनकी नथ उन्हें लौटा देगी। 
 
कथा का समापन पतिदेव ने यूँ कह कर किया-
“पिछले सेंतालीस वर्षों से रश्मि भाभी का और तुम्हारा,'सुहाग' बैंक के घटाघूप छोटे से 'लॉकर' में बंद पड़ा है!”

- मधु
 
रचनाकार परिचय
मधु

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