प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2017
अंक -52

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

लघुकथा- लाइक


"तुम ह्वाट्स एप, फेसबुक क्यों नहीं चलाते? इतना कीमती टच स्क्रीन मोबाईल तो ले रखा है?" अपने हाथ में मोबाइल लिए,गर्लफ्रेंड से चैटिंग करते हुए अनुराग ने अपने दोस्त रोहित से पूछा।
"यार, पता नहीं क्यों, ये सोशल मीडिया के सरंजाम.....ह्वाट्स एप, फेसबुक, ट्वीटर, इंस्टाग्राम आदि.... मुझे कतई अच्छे नहीं लगते।" रोहित ने अनुराग की
ओर देखते हुए कहा।
"क्यों? क्या बुराई है इनमें?" अनुराग ने चौंकते हुए पूछा।
"पूछो, अच्छाई ही क्या है इनमें?" रोहित ने प्रतिप्रश्न किया।
"तुम्हीं बताओ?" अनुराग अब उसका जवाब जानने को उत्सुक हो उठा था।
"मैंने अपना फेसबुक एकाउंट बनाया था। ह्वाट्स एप पर भी था। सबके पोस्ट पढ़ता था। लाइक करता था। ह्वाट्स एप मैसेजेज भेजता था। मगर जब मेरे पोस्ट को कोई लाइक नहीं मिलता था, तो कोफ्त होने लगती थी। जिसने लाइक नहीं किया, स्माईली नहीं भेजे या निगेटिव कमेंट किया, तो उससे चिढ़ होने लगती थी। मुझे लगा कि इस अंतर्जालीय आभासी दुनिया में भले ही हम एक-दूसरे के नजदीक आ गये हों, मगर इस लाइक-डिसलाइक के चक्कर में तो आपसी संबंध ही खराब हो रहे हैं। एक-दूसरे के प्रति हम गलत धारणाएँ पालने लगे हैं। इससे भले तो हम अपनी वास्तविक दुनिया में ही थे, जहाँ हम दूर भले ही थे, मगर जुड़े हुए तो थे! आपस का प्रेम तो जिंदा था!" अनुराग ने रोहित के कंधे थपथपाते हुए अपने मन में उमड़-घुमड़ रहे विचारों को तार्किक रूप से रखने की कोशिश की।
रोहित ने भी सहमति में सिर हिलाया और अपना मोबाइल चुपचाप जेब में रख लिया।


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लघुकथा- बड़े भाई


उस दिन जब वह ऑफिस आया, तो वहाँ अफरा-तफरी मची हुई थी। सभी हैरान-परेशान थे। पुलिस व प्रशासन के उच्च अधिकारियों ने ऑफिस में रेड की थी।
एक-एक फाइल खंगाली जा रही थी। उसके बॉस अकेले, चुपचाप एक ओर खड़े थे। वह उनके पास गया। मौन इशारों में बातें हुईं। वह दंग था.....जो व्यक्ति इतनी ईमानदारी और निष्ठापूर्वक अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन कर रहा था, उसके खिलाफ शिकायत आखिर की किसने?
शाम हो गई। अंधेरा घिरने लगा था। पुलिस की गाड़ियाँ देख, ऑफिस के चारों ओर भीड़ भी जमा हो गई थी। जब रात होने लगी, तो बॉस ने उसे घर चले जाने को कहा। मगर- "थोड़ी देर में चला जाऊँगा" कहकर वह रुका रहा।
उसका एक दोस्त बड़ी देर से उसे बॉस के पास खड़ा देख रहा था। उसने उसे अपने पास बुलाया और कहा- "ऑफिस टाईम खत्म हो गया है। अब तुम क्यों
बे-मतलब इन लोगों के साथ खड़े हो? परेशान हो रहे हो? ये कौन हैं तुम्हारे?
तुम्हारी कौन-सी सरकारी नौकरी है? तुम तो कॉन्ट्रेक्ट पर काम कर रहे हो।
तुम्हारी क्या टेंशन है? ये सब इनका मामला है। ये देखेंगे। झेलेंगे। तुम घर जाओ। आराम करो यार!"

उसकी बातें सुन, वह थोड़ा और पास आया और उसके कंधों पर अपने दोनों हाथ मजबूती से रखते हुए कहा- "देख यार..! ठीक है कि मैं उनका कोई नहीं हूँ।
वे मेरे कोई नहीं हैं। मेरी  कॉन्ट्रेक्ट  की  नौकरी है। दस से पाँच बजे तक.....ऑफिस आवर में मि.वर्मा मेरे बॉस हैं। लेकिन.....पाँच बजे के बाद....वे मेरे बड़े भाई हैं। समझा तू....??"
उसने महसूस किया...मि. वर्मा  ने शायद उसकी बात सुन ली थी। वे चश्मा उतार कर अपनी आँखें पोंछ रहे थे।


- विजयानंद विजय
 
रचनाकार परिचय
विजयानंद विजय

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