प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2017
अंक -38

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

संपादकीय
फेसबुकिया रचनाकार!
 
'फेसबुकिया रचनाकार', इस तख़ल्लुस से हम सभी भली-भाँति परिचित हैं। दुर्भाग्य यह है कि इसका प्रयोग रचनाकारों द्वारा ही, नए रचनाकारों के उपहास के लिए किया जाता है। निश्चित रूप से यहाँ बहुत से ऐसे लिखने वाले हैं, जिनका लिखा वे स्वयं भी नहीं समझ पाते होंगे पर उन पर कोई टिप्पणी करने से पहले यह जान लेना भी आवश्यक है कि क्या वो अपने लिखे को 'साहित्य' के दावे की तरह पेश कर रहे हैं? क्या वह किसी प्रतियोगिता के लिए प्रेष्य प्रविष्टि है? यदि है, तो बेशक खुले दिल से समीक्षा करें! बल्कि परस्पर संबंधों के आधार पर प्रकाशित करने वालों को भी आड़े हाथो लें। लेकिन सामान्य तौर पर, सोशल मीडिया फेसबुक, ट्विटर या ब्लॉग ये सब अपनी बातों को एक मंच पर रखने का, उनकी अभिव्यक्ति का सुलभ साधन भर हैं। यहाँ हर प्रकार के मनुष्यों की उपस्थिति उतनी ही है जितनी कि किसी अन्य क्षेत्र में।
 
लेखन को लेकर एक अलग ही तरह का युद्ध छिड़ा हुआ है। सबके अपने-अपने समूह हैं, जो किसी रचना का अच्छा या बुरा होना उनके सुनिश्चित मापदंडों के आधार पर तय करते हैं। सोशल साइट्स पर छपे हुए लेखन को वो अति अहंकारी भाव से नकारने में ज़रा भी गुरेज़ नहीं करते। 'फ़ेसबुकिया रचनाकार' का टैग लगाते समय ये लोग भूल जाते हैं कि रचना फ़ेसबुकिया कभी नहीं होती। किसी ने कुछ भी लिखा और उसके फूटे भाग्य से वो लेखक हुआ तो क्या उसके हर शब्द को साहित्य के तराजू में तौला जायेगा? क्या रचनाकार एक सामान्य इंसान की तरह हंस-बोल नहीं सकता? आखिर हर हाल में उसका गंभीर होना इतना अनिवार्य तत्व क्यों लगता है? क्या प्रत्येक घटना पर भौंहें चढ़ाकर बोलना या तलवार निकालकर ललकारना ही सच्चे लेखक की निशानी है? लेखन; हमारे हृदय के भावों की सरल, तरल अभिव्यक्ति ही तो है। यह कोई युद्ध नहीं! जब जो जैसा महसूस हुआ, लिख दिया जाता है। कभी वह गद्य के रूप में होता है, कभी लयात्मक, कभी किसी तस्वीर के या गीत के ज़रिए भी होता है। अपने भावों को शब्दों के माध्यम से सामान्यत: ऐसे ही तो व्यक्त किया जाता है! परेशानी न उस इंसान को है और न ही उसकी पोस्ट पर आने वालों को, पर फिर भी सबसे ज़्यादा कष्ट उन लोगों को होता है, जो स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझकर हरेक की रचना को हेय दृष्टि से देखना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं। किसी को सीधे ही नक़ार देना, सामने वाले के बड़प्पन से कहीं अधिक उसकी कुंठा का परिचायक है। वो यह भूल जाते हैं कि जो प्रतिभावान है वो चमकेगा ही और जो किसी के कंधे पर चढ़ आगे बढ़ने को अपनी उन्नति मानता है, उसका गिरना भी सुनिश्चित है। लेकिन स्वयं को जज समझ, सही या गलत का निर्णय देने वाले आख़िर हम होते कौन हैं? बल्कि यह तो प्रसन्नता का विषय है कि जो लोग कई दशकों से लेखन कार्य में जुटे हैं, अब उन्हें इसे अन्य लोगों तक पहुंचाने का एक उचित एवं सरल माध्यम मिल गया है। जिसे न पढ़ना है, न पढ़े....कोई बाध्यता नहीं!
 
सूरज अपने प्रकाश का बख़ान नहीं करता और न ही चाँदनी अपनी सुंदरता पर इतराती है। फूलों की ख़ुश्बू से वातावरण अपने-आप महकता है और ठंडी हवा की शीतलता स्वयं ही चित्त में ताज़गी भर देती है। प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या!
सोशल मीडिया पर आज हर बड़े-से-बड़े कलाकार, नेता, न्यूज़ चैनल, अख़बार, उद्योग एवं विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोगों की उपस्थिति है। हम कभी भी उन्हें फेसबुकिया नेता, अभिनेता कहकर उनका मज़ाक नहीं बनाते तो फिर लेखक वर्ग से ही बैर किसलिए? आश्चर्य यह है कि इस जुमले का प्रयोग भी इसी क्षेत्र के व्यक्तियों द्वारा सर्वाधिक किया जाता है।
ये साइट्स, सुविधा ही तो हैं। निस्संदेह ऐसे भी हैं जिन्होंने पढ़-पढ़कर ही लिखना प्रारम्भ किया है। पर सीखने में बुराई क्या? बल्कि यह तो हर्ष का विषय है कि आपका लेखन किसी के लिए प्रेरणा बना। जिसकी लेखनी में शक्ति होगी वह टिका रहेगा, शेष स्वयं ही अन्य क्षेत्रों में मंज़िलें तलाश करेंगे। लेकिन इन नयों को लेकर किसी में 'असुरक्षा' की भावना होना अत्यंत हास्यास्पद और निंदनीय है। ऐसे इंसानों को उन प्रतिष्ठित और स्थापित साहित्यकारों से सीख लेनी चाहिए जो कि इस नई पीढ़ी को रौशनी दिखाने में ज़रा भी असहज महसूस नहीं करते। 
 
कुकुरमुत्तों की तरह उगते समूह, उन्हीं में से चुने गए विजेता और उन्हीं के पैसों से आयोजित तथाकथित भव्य पुरस्कार-वितरण समारोह आपत्ति का विषय हो सकते हैं। किसी साझा-संग्रह में रचनाओं का छप जाना और फिर उन रचनाकारों को महान साहित्यकार कहकर सम्मानित करना भी बेहद हास्यास्पद है। लेकिन इन सब बातों से भी किसी को इतना कष्ट नहीं होना चाहिए। घरेलू कार्यक्रमों की, विवाह की, बच्चों की उपलब्धि, यात्रा की और तमाम तस्वीरें पोस्ट की ही जाती हैं। तो, इन आयोजनों को भी इसी तरह से स्वीकार किया जाना चाहिए। हर बात को तूल देना एक वर्ग विशेष की कुंठा का ही परिचायक है, जिससे अब इन्हें भी बाहर निकलकर अच्छे साहित्य को रचे जाने के लिए प्रयासरत रहना चाहिए। किसी की बुराई करने से हमारा भला नहीं होता, बल्कि हम ऐसे उदाहरण प्रस्तुत करें कि लोग सीखने को बाध्य हो जाएँ। इस बात में कोई दो राय नहीं कि पुरस्कार का सीधा सम्बन्ध प्रतिभा से ही होना चाहिए और जो संस्थाएँ ये पारदर्शिता अपनाती हैं वे निस्संदेह बधाई की पात्र हैं। विश्वास कीजिये, हम बताएं या न बताएं....रचनाकार को स्वयं इस बात का पूरा अनुमान होता है कि वो कितने पानी में है। इन लोगों पर अपनी ऊर्जा व्यय करने से बेहतर है कि हम कुछ सार्थक रचें!
 
यदि कोई इंसान बुरा है तो भी, 'बुरे इंसान के साथ बुरा व्यवहार करके, हम उसकी बुराई नहीं बल्कि अपनी अच्छाई को ही ख़त्म कर देते हैं!' उसके सुधरने की कोई उम्मीद नहीं, अपने लिए क्या करना है; यह हमें ही तय करना होगा! यूँ भी दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुँचाए बिना जीने का मज़ा ही कुछ और है!
हर समय दिमाग़ लगाने की आवश्यकता नहीं होती, कुछ लोग दिल से भी लिखते हैं! :)
 

- प्रीति अज्ञात
 
रचनाकार परिचय
प्रीति अज्ञात

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