मई 2017
अंक - 26 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

संस्मरण

तेरी यादें


अवधेश अपने में एक ही था। वही बातें जो दूसरों को मना करता स्वयं न जाने कब कर जाता, उसे इसकी ख़बर कानो-कान न होती। आज भी यही बात हुई। एक फीका-सा विषय लेकर, न जाने क्या हो गया था उसे, बहका तो बहकता ही चला गया। फिर उसी बात का समर्थन करता रहा था, काफी समय तक। और मैं मन ही मन हॅंसता रहा था। बी.ए. के दो वर्षों, प्रेम के दो वर्षों में असफल होकर अनुभवों का गट्ठर लादे, जब तब उत्तेजित हो, हम सब को अपनी बातों की गोली मारा करता। उसे न जाने क्या सूझी, अपने सबसे सुनहरे समय में जो न करना चाहिये था, कर बैठा।
ऐसा कार्य जिसका कोई परिणाम निकले न निकले असंतुष्टि एवं पश्चाताप की प्राप्ति तो होती ही है। भारतीय संस्कार और दूसरे के प्रति आकर्षण क्या था, उसे सांसारिक अनुभव जरुर दे गया था। जब कभी उसकी याद जैेसे ही आती मन न जाने कैसा कैसा हो जाता। यह उसकी समझ से बाहर था। क्या मालूम वह उसे चाहती भी थी या वह उसे गलत समझ बैठा था, भगवान जाने! एक दिन भरे मन से यह खबर दी थी, "उसकी शादी किसी मेजर के साथ हो रही है।" चेहरे पर निराशा मुॅंह खोले साफ झाँक रही थी।


एक दिन उसने स्वयं यह कहा था जैसे बहुत बड़ा दर्शनशास्त्री हो, उस बीस वर्ष की उम्र में, "नारी का भरोसा करना भी आस्तीन का सांप पालना है।"
"क्यों, क्या हुआ?" मैंने स्वभाविक प्रश्न किया।
"क्या बताऊँ, आज उसके भाई का स्थानान्तरण हो गया है, बता रही थी।"
कॉलेज बन्द हो गये थे। परिक्षाएँ समाप्त हो चली थीं, उस दिन नितिशा मिली थी, परन्तु वह भी नहीं जानती थी कि उनकी आखिरी मुलाकात होगी और वे कब जाएँगे। अवधेष किसी कारणवश दो दिन न मिल सका था, उसके घर पहुॅंचा, उसके घर पर लगा ताला आॅंखों के सामने भारत नाट्यम करता नज़र आया था। और जैसे सारी की सारी फिल्म समाप्त हो जाने पर झटके से जागा हो- खड़ा रह गया था।


"बिना बताये चली गई, अच्छा! मुझ पर इतना भी भरोसा नहीं कि मिली थी, कह देती। हूँ: इतनी घमंडी तो न थी, ये कैसे हो गया, अचानक! क्या उसके भाई को पता लग गया था। परन्तु वे तो जानते न थे........न.....वे कहाॅं जानते थे। मैंने तो बताया नहीं, उसने बताया हो, पता नहीं। मैं, मैं क्या करुॅं, कहाॅं चली गई? अगर जा ही रही थी तो कम से कम पता तो दे जाती। हो न हो ज़रुर कहीं घूमने-घामने गई होगी।" यही भावना बनाये, "भगवान करे ऐसा ही हो।" सोच लौट आया था।
दो दिनों तक बड़ी बेताबी से इन्तजार कर देखा, शायद आ गई हो, उस सड़क पर कई-कई चक्कर मार आने पर भी निराशा ने ही स्वागत किया। बड़ी़ तनावपूर्ण स्थिति को झेलता रहा वह काफी समय तक।


उन दिनों के क्रियाकलाप आज याद आने पर कितना हॅंसता हूँ अपने आप पर, क्या वे मेरे द्वारा किये गये अनुभव थे। क्या अब दुबारा वह सब कर सकूॅंगा, क्या दिन थे वे भी, आह! अब तो वही सब कितना हास्यास्पद लगता है। अब मैं स्वभिमानी हो गया हूॅं अथवा शायद अब पहले से अधिक समझदार हो गया हूँ। वह सब भी सच था, क्या नहीं! अब वह बेजारी नहीं रही, जो किसी समय रहा करती थी। अधिक बुद्धिमान नजर आने लगा हूॅं। देखूॅं, दिखता तो हूॅं। हाॅं, एक बात है, अब उतनी फुरसत तो नहीं दी जा सकती अपने आप को, रोटी का चक्कर कहाॅं करने देता है वह सब और समय भी बदला-बदला सा लगता है।"
अब तो भूख दब गई है रोटी की तमन्ना के दबाव से, अन्तस में डूबी आवश्यकता उभर कर अपने नुकीले दाॅंत दिखा, टीसन देती रहती है लगातार। अन्दर से भयभीत ऊपर से खुशमिजाज होने का मुखौटा ओढ़े 'काम' की खोज में कहीं सेटल होने की चिन्ता बटोरे घूमता रहता हूॅं। किसी से मिलने तक 'यह' कछुए की गरदन हो जाती है, समय मिलते ही दाॅंत निकाल बन्दर घुड़की देती रहती है। अपना स्वाभिमान भी तो नहीं छोड़ सकता हूँ, कभी-कभी लोग 'सुपीरियटी काॅम्पलेक्स' में सना होना कहते हैं।


रमन की शादी हो रही है, वहाॅं जाना एक तरह से ज़रुरी ही है। आज फिर न जाने क्या क्या सोचता रहा सारा दिन, कहीं जाने का मन नहीं किया, किताब खोल, सारा शरीर ढीला छोड़ कुछ पुरानी यादों की खोज में निकल पड़ा। बहुत कोशिश करने के बाद भी कहीं भूल-भुलईयों में भटकता रहा-भटकता रहा..........। पता ही नहीं चला कब सो गया, लगभग चार घंटे खूब गहरी नींद में सोया, अब सोकर उठा हूॅं, कहाँ जाऊं, क्या करुॅं? चलो दुबे के घर चलता हूँ। कपड़े पहन कर तैयार हो बाहर निकलने को होता हूँ, किसी काम से अन्दर जाता हूँ, पाता हूॅं शरीर के कपड़े न जाने कब उतरकर अलगनी पर लटके रिरिया रहे हैं। और मैं थककर सोफे पर पसर जाता हूॅं, शायद कपड़े ही नहीं जाने देना चाहते, चाहते हैं, यहीं पड़े रह कर इतना सोचो, इतना सोचो की दिमाग की नसें फट जाएँ और मैं पागल हो जाऊं। आह! ये कपड़े! कितना बेबस हूॅं मैं इनके सामने।

आज फिर पुराने को भूल, नये को पाना चाहता हूॅं। क्या मैं दूसरों की तरह लोगों को करने को कहता हूॅं, स्वयं नहीं कर पाता हूॅं। चलो आज से सबकुछ भूल कर नई सुबह के लिये, किसी के लिये न सही अपने लिये ही शुरू कर दूॅं। अपने लिये कुछ करना भी तो बहुत बड़े त्याग का काम है, कर सकूॅं तो है।
बहुत दिन हुए नितिशा मिली थी। भोपाल में रास्ते में खड़ा सोच रहा था, न जाने क्या? एक रिक्शेवाला हाॅंफता-सा अपने रिक्शे की भद्र सवारी की आज्ञा से शायद कुछ देखने जा रहा है, मैं उसे बड़ी तृष्णा से देख रहा हूॅं- वह काम काजी है। ये 'कामकाजी' आज भी मेरी पीठ पर बैठा, बुरे दिनों का अहसास कराता रहा है।
"आपको बीबी जी बुला रही हैं"- अपने रिक्शे की ओर इशारा करता है। सुनकर चौंक जाता हूँ। रिक्शे के ऊपर यूॅं ही जबरदस्ती लापरवाही जताते हुए नजर जाती है, लापरवाही न जाने कहाॅं गुम हो जाती है, ठगा-सा खड़ा रह जाता हूँ- फिर जैेसे पता नहीं क्यों मुड़ता हूँ और विपरीत दिशा में चल देता हूॅं।


बहुत समय बाद की बात है, उसे सफलता ने अपना मुॅंह दिखाया। वह बाटा में काम करने लगा था लेकिन यह नौकरी उसे रास नहीं आई और छः माह बाद ही अक्षर प्रकाशन में काम करने लगा था। यह नौकरी भी अधिक दिन उसे बाॅंध नहीं सकी। हाॅं, उसे यह लाभ अवश्य हुआ कि अक्षर प्रकाशन के मालिक श्री राजेन्द्र यादव से परिचय हुआ और उन्हीं की प्रेरणा से उसने पत्रकारिता की लाइन पकड़ ली। स्वतंत्र लेखन शुरू किया।
एक दिन सुबह दस बजे मेरे कार्यालय आया। बड़ा उत्तेजित था,आते ही एक चेक मेरी टैबिल पर रख दिया- बोला, "दुबे, यह मिला है मनोहर कहाॅंनियाॅं से। मैंने देखा पाँच सोै का चैक था। उसे विश्वास नहीं हो रहा था- "कही वापस तो नही ले लेगें।" मेैंने कहा जब तुम्हारा नाम लिखा है तो इसे बैंक में जमा करो और अपनी पहली कमाई अपनी माँ के हाथ में रखो, वे बहुत ख़ुश होंगी। हम दोनों ने चाय पी और बड़ी देर तक गप्पें करते रहेे थे। यह उसकी मेहनत और पागलपन का नतीजा जो उसे पुरस्कार स्वरूप प्राप्त हुआ था। इस बात की प्रसन्नता सभी मित्रों को हुई थी। दूसरोें की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी देखना भी तो एक कला है, जो हरेक को दर्शन नहीं देती।


हम लोगों की मुलाकात लगभग हर रोज होती, सुबह, दोपहर, शाम कभी भी। जी.आई.सी. में साथ पढ़ने के अतिरिक्त रेलवे क्वार्टर, सेवाराम आईल मिल, पुराना चार्लीगंज और अन्त में खातीबाबा के मकानों का मैं साक्षी रहा हूॅं। उसका जीवन संघर्षपूर्ण रहा। हाॅं, परिवार के किसी भी सदस्य की कोई शिकायत उसके मुँह से कभी नहीं सुनी- परिवार में माँ-पिताजी, एक छोटा भाई और माॅं-पिताजी की दो पुत्र-वधु। एक दिन ऐसे ही बताने लगा, "यार तुम तो मज़े में हो, मैंने तो कई-कई रातें प्लेटफार्मों पर गुजारी हैं, गाड़ियों के इन्तज़ार में। उसकी जिन्दगी में एक ही बड़ा हादसा हुआ था, जब वह किसी गाड़ी से उतरकर दिल्ली में सुबह अपने डेरे पर जा रहा था। हाथ में छोटा-सा ब्रीफकेस था जिसे देखकर मोटा आसामी समझकर दो लोगों ने उसे लूटना चाहा। बोला, "गाड़ी से उतर कर नई दिल्ली स्टेशन के बाहर चाय पी और सोचा, चलो पैदल चलतें हैं- पास ही तो है कमरा,  कुछ ही दूर ही चल लूँगा। किसी ने पूछा- "बाबूजी माचिस है?" मैंने कहा- नहीं, मैं सिगरेट नहीं पीता। मेरे कहते ही उनमें से एक ने मेरे पेट पर चाकू टिका दिया। सीधे हाथ से मैंने चाकू का फल पकड़ा और उसे पेट से हटाने का प्रयत्न करने लगा। उल्टे हाथ में ब्रीफकेस था। दूसरे ने मेरा ब्रीफकेस छीन लिया और मैं पहले वाले से भिड़ गया। वह भी हाथ छुड़ा कर भाग गया। मैं लगभग एक किलोमीटर दौड़ता हुआ पास के थाने में पहुँचा ओैर मौखिक घटना की जानकारी दी। एक सिपाही मुझे टू व्हीलर में बैठाकर अस्तपताल ले गया। डॉक्टर ने मेरी हथेली में पटटी बाँध दी, तो मैंने पूछा- "मैं जाऊं" अभी आप लेटे रहिये, अपने घर पर खबर कर दीजिये, आपके पेट में बड़ा गहरा घाव है। मैंने घर पर फोन किया फिर मुझे दो दिन बाद होश आया।

जब भी मिलता साहित्यिक गतिविधियों से अवगत कराता। उसके मुँह से ही स्व श्री राजेन्द्र यादव, श्री शेलेन्द्र सागर, कमलेश्वर आदि के बारे में मुझे जानकारी मिलती रहती। वह अनेक बाहरी साहित्यकारों एवं साहित्यक गतिविधियों की जानकारी का स्रोत था। उन्हीं दिनों मैत्रेयी पुष्पा जी से मेरा परिचय हुआ। उस समय तक उनकी दो तीन कृतियाॅं ही प्रकाशित हुई थीं। स्थानीय आयोजनों में तो हमारा साथ अनिवार्य था। कहानी गोष्ठियों में उसने भी कई कहानियाॅं पढ़ीं। लेकिन शुरुआत में उसकी आय का ज़रिया सत्य कथाएँ ही थीं। धीरे-धीरे उसकी रचनाएँ हिन्दी की सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी थीं। रानी सिंन्धया जी जो बीजेपी की सांसद थीं, का इन्टरव्यू लेने के लिए अवधेश को बहुत कठिन प्रयास करना पड़ा था। मेरे पिताजी, अपने पिताजी और अन्य टी.टी.आई. का इन्टरव्यू, मेरा सपत्नीक इन्टरव्यू, रेलवे से सम्बन्धित समस्याओं का इन्टरव्यू लिया था, जो धर्मयुग में प्रकाशित हुआ था।

एक दिन सुबह उसके घर गया तो मेरे साथ ही आ गया। ताॅंगा स्टेंड के पीछे हम रुक गये। मेरे गले लगकर फूट-फूट कर रोने लगा। बड़ी देर बाद बताया कि माताजी की तबियत खराब है- मैंने पहली बार रोते देखा, सुनकर मैं भी भावुक हो गया। कुछ दिन बाद माताजी का स्वर्गवास हो गया।
एक दिन उसके छोटे भाई का फोन आया कि बडे़ भाई अस्तपताल में भर्ती हो गये हैं। मैं अस्तपताल पहुँचा। वहाॅं जाकर पता लगाा कि गर्म पानी से पैर धोने के कारण फफोले पड़ गये थे। इस कारण एक नर्सिंग होम में भर्ती कराना पड़ गया। मैं काफी देर बैठा रहा, बहुत-सी बातें हुईं। उस समय तक मानसिक रुप से पूर्ण स्वस्थ्य था। उसका कहना था, "यार दुबे, मैं यहाँ से घर वापस आऊँगा तो बहुत से काम करने हैं।" मैंने समर्थन किया- "हाॅं अवश्य।"
"यार ये बताओ, मेरी रचनाएँ धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, सारिका, निहारिका, सरिता-मुक्ता, माया, मनेाहर कहानियाॅं, कादम्बनी, श्रीवर्षा, दिनमान, रविवार में छपी हैं, लोग मुझे याद रखेंगे या नहीं?" ये बड़ा कठिन प्रश्न था मुझसे। दूसरों की मैं केैसे बता सकता हूँ, मैं अवश्य याद रखूँगा।"


इस वार्तलाप के बाद मैं किसी कारण उससे मिलने नहीं जा सका। उस समय तक मुझे एहसास तक नहीं था कि आख़िरी बार मिल रहा हूँ। मेरे कार्यालय मेरे एक मित्र का फोन आया कि अवधेश चर्तुवेदी का स्वर्गवास हो गया है। यह 2006 का वर्ष था। बहुत समय तक उसे मन ही मन में डाॅंटता रहता था- बिना बताये चला गया। उसकी याद बहुत गहरे तल मे समाई हुई है- शायद ही निकल न पाये!


- अजय कुमार दुबे

रचनाकार परिचय
अजय कुमार दुबे

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