प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2017
अंक -51

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्यांकन

प्रेम कविता की परम्परा में एक नया हस्तक्षेप 'उजली मुस्कुराहटों के बीच': जगन्नाथ दुबे
 

 


'हम बचे रहेंगें' और 'एक देश और मरे हुए लोग' जैसे महत्वपूर्ण काव्य संग्रहों, जिनके माध्यम से युवा कवि विमलेश त्रिपाठी की हिंदी कविता की 21वीं सदी में एक युवा कवि के रूप में अलग पहचान बनीं। एक ऐसे युवा कवि के रूप में जो अपनी जड़ें तो नागार्जुन और त्रिलोचन की काव्य परम्परा में जमाये हुए है, लेकिन अपनी वैचारिकी का निर्माण अपने समय के सामजिक-राजनैतिक सन्दर्भों के आईने में कर रहा है।
कविता के औजार की परम्परा त्रिलोचन और नागार्जुन की है पर कविता की भूमि अपनी निजी। इस अपनी निजी भूमि पर जिसे विमलेश त्रिपाठी का रचना संसार/रचनभूमि कहा जा सकता है, उसमें विमलेश ने अपने समय और समाज के जीवित अनुभवों के बहुत सारे बिंब खींचे हैं। हमें अपने ही समय के अनेक ऐसे बिम्बों से रूबरू कराया है, जिससे हम अछूते रह जाते विमलेश के बिना। यह जो निजता है विमलेश की वह उन्हें हिन्दी कविता के एक हजार साल की प्रतिरोधी चेतना से जोड़ती भी है और संवाद भी करवाती है।


शुरूआती दोनों संग्रहों में विमलेश की कविता के केंद्र में भारतीय समाज, भारतीय लोकतंत्र, भारतीय राष्ट्र-राज्य और भारतीय जनमानस की अनुगूँज काफी मुखर रही है। 'एक देश और मरे हुए लोग' में कई जगह मुक्तिबोध की सत्-चित-वेदना के अक्स उभर कर सामने आते हैं। अपने इन संग्रहों से आगे आकर विमलेश ने अपने नए काव्य संग्रह 'उजली मुस्कुराहटों के बीच' के लिए सर्वथा एक नए क्षेत्र का चुनाव किया है। वह क्षेत्र है प्रेम का। प्रेम करना और उसे निबाहना जितना कठिन है, उससे कम कठिन प्रेम पर कविता लिखना नहीं है। प्रेम कविता लिखना जितना आसान है, उतना ही जोखिम भरा काम भी। यह एक ऐसा क्षेत्र है, जहाँ अनुमान से काम नहीं चलता। हालांकि प्रत्येक महान रचना के पीछे रचनाकार का जीवन संघर्ष उस रचना में अनुष्युत होता है लेकिन प्रेम के मामले में यह और ज्यादा संगीन हो जाता है।
प्रेम एक ऐसा विषय है, जिस पर लिखने के लिए उसमें डूबना लाज़मी है। अपने अध्ययन के सिमित दायरे में जितना कुछ पढ़ समझ पाया हूँ, उसमें मुझे लगता है कि प्रेम कविताएं उन्हीं की ज्यादा मारक रहीं हैं, जिन्होंने उसका ताप खुद झेला हो। बिहारी और घनानंद के ताप में जो अंतर है उसे शुक्ला जी ने बखूबी अलगाया है, उस पर ज्यादा कहने की जरुरत नहीं है। चाहें घनानंद हो या फिर नाज़िम हिक़मत और नेरुदा सबकी अनुभूति ही उन्हें कविता की महान परम्परा में शीर्ष पर खड़ा कर सकने में कामयाब हुई है।


प्रेम एक ऐसा विषय है जिसे बहुत बार लिखा जा चुका है। अब जितना कुछ लेखन हो रहा है उसमें अधिकतर उसी का दुहराव है। विषय की नवीनता के लिए स्थान बहुत कम बचा है। तो सवाल उठता है कि ऐसी स्थिति में बहुत कुछ नया कर सकने का स्थान बाकी न बचा हो तो उस पर लिखने की क्या आवश्यकता? इसका जवाब लीलाधर जगूड़ी यह कहते हुए देते हैं कि "जितने लोग उतने प्रेम।" प्रेम के सारे अनुभव निजी और व्यक्तिगत होते हैं। वह व्यक्तिगत अनुभव जहाँ समष्टि पर पहुँच जाता है वहीं वह साहित्य का अंग बन जाता है। एक शायर ने लिखा है-

एक लफ़्ज़ महोब्बत का इतना सा फ़साना था
सिमटे तो दिल-ए-आशिक फेले तो ज़माना


विमलेश त्रिपाठी के नए काव्य संग्रह 'उजली मुस्कुराहटों के बीच' से गुज़रते हुए हिंदी की प्रेम कविता की पूरी परम्परा याद आ जाती है। भारतीय समाज की सामाजिक संरचना जो भी रही हो, स्त्री-पुरुष के क्या सम्बन्ध रहे हैं। यह किसी से छिपा नहीं है। लेकिन प्रेम एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ आधिपत्य से नहीं समर्पण से काम चलता है। दो प्रेम करने वालों के बीच आपसी समर्पण की होड़-सी लगी रहती है। लेकिन इस होड़ में समाज और सामाजिक सरंचनाएँ क्या भूमिका अदा करती हैं। उनका दबाव एक प्रेमी कैसे झेलता है और उसका क्या परिणाम होता है, इसे देखना है तो उत्तर 'प्रेम' शीर्षक कविता देखने की जरुरत है।

रोटी की बात हम भूल जाएँ
लेकिन दो खून मिलकर जो बना है
एक तीसरा खून
उसे तो हमने ही मारा बहुत धियें
सिर्फ खुद को सही साबित करने की होड़ में।


सारी विभीषिका खुद को सही साबित करने की होड़ में है। आखिर क्यों प्रेम करने के बाद भी इंसान को इन सामाजिक बंधनों से जूझना पड़ता है? प्रेम अपने स्वरूप में चाहे जितना अमूर्तन हो पर होता वह मूर्त से ही है। हम किसी अमूर्त के प्रति श्रद्धा भाव रख सकते हैं पर प्रेम के लिए मूर्त रूप का होना जरुरी है। प्रेम शरीर से मन और मन से शरीर की यात्रा करता है। इस यात्रा में एक तरह का आपसी समर्पण भाव होता है, लेकिन भारतीय समाज व्यवस्था का स्वरूप कुछ इस तरह का है कि वह इसे स्वीकार नहीं कर पाता। इसलिए हर प्रेम करने वाला एक नई दुनिया की तलाश में रहता है, जहाँ वह अकेला रह सके। इस अकेले रहने में प्रेम का अतिरेक जितना महत्व रखता है, उससे कम महत्व अवचेतन में चलने वाला सामाजिक संबंधो का दबाव नही रखता।
'उजली मुस्कुराहटों के बीच' से गुजरते हुए प्रेम, उसमें रह रहे स्त्री-पुरुष के सम्बन्ध और सामाजिक दबाव इन सबों के आपसी अन्तर्सम्बन्धों को समझा जा सकता है। इस संग्रह में प्रेम की विविध छवियाँ अभिव्यक्त हुई हैं। संग्रह के माध्यम से पूरी हिंदी कविता की परम्परा सजीव हो उठी है। प्रेम में होने वाला इंसान सबकुछ के होने का कारण प्रेम को ही मानता है।


तुम मिले हो तो जन रहे हैं शब्द
हो रही है
एक कविता मुकम्मल


काव्य परम्परा में प्रेम के स्वीकृत रूपों में अधिकतम की तरह विमलेश की दृष्टि एकदम साफ़ तरीके से गयी है और उसे व्यक्त भी काफी साफगोई से किया है। प्रेम करने वाला व्यक्ति प्रेम के बारे में जितनी बार और जितने तरीके से कहता है, उसे कम ही लगता है। 'प्यार पर कुछ बेतरतीब बातें' शीर्षक कविता इसी का उदाहरण प्रस्तुत करती है। 'रही सही कह दीनी हिचकीन सों' कहने की परम्परा आज नई नहीं है। जो न कहा गया, वह भी सुन लेना आदि कुछ ऐसे बिम्बों का सृजन किया है विमलेश ने, जो उन्हें हिंदी की प्रेम कविता परम्परा से काफी गहराई से जोड़ता है।
प्रेम में होते हुए जिस स्त्री के प्रति हम पूर्ण समर्पित होते हैं, उसकी हमारे सामाजिक संरचना में क्या जगह है? क्या कारण है कि उसे हम सिर्फ प्रेम में ही समानता का दर्जा दे पाते हैं। अन्य स्थलों पर वह द्वितीयक नागरिक के रूप में ही स्वीकृत है। यह चिंता भी विमलेश के इस संग्रह में साफ़ देखी जा सकती है। संग्रह में कुछ बिम्ब तो इतने नए और ताज़ा हैं की बरबस ही ध्यान चला जाता है।


तुम्हारा प्यार
बुरे दिनों में आई
राहत की चिट्ठियां हैं
× ×  × × × × × × × × × × ×

तुम्हारा प्यार
लहलहाती गर्मी में
एक गुड़ की डली के साथ
एक ग्लास पानी है


विमलेश त्रिपाठी उन युवा कवियों में से एक हैं, जो जोखिम उठाने से नहीं डरते। पुराने और गंभीर विषय को भी अपने ढंग से व्यक्त करना एक तरह का जोखिम उठाना ही है।

2015 का साल हिंदी कविता में प्रेम कविता के लिहाज से काफी समृद्ध साल रहा है। इस वर्ष वरिष्ठों की पीढ़ी के लीलाधर जगूड़ी से लेकर युवाओं में बाबुषा कोहली तक का संग्रह आया, जिसमें प्रेम कविताओं की अधिकता है। 2015 की ही जनवरी में असमय दिवंगत हो गए युवा कवि रविशंकर उपाध्याय का संग्रह 'उम्मीद अब भी बाकी है'  प्रकाशित हुआ। संग्रह में 'समुद्र मैं और तुम' के साथ कई कविताएँ हैं, जो प्रेम को एक नए ढंग से देखती हैं। इन संग्रहों के बीच जब हम विमलेश त्रिपाठी के संग्रह को रखकर देखते हैं तो उसके विषय वैविध्य के प्रति हमारा आकर्षण स्वाभाविक ही बढ़ता है। विमलेश अपनी परम्परा से संवाद करते हुए जहाँ अलग होते हैं वहाँ वे नए बिम्बों का सृजन करते हैं। अपनी बात कहने के लिए विमलेश नए नए बिम्बों का सहारा लेते हैं। काफी हद तक पुनरावृत्ति की पद्दति से वे मुक्त रह सके हैं। अपने सम्पूर्ण रूप में प्रेम की विविध छवियाँ प्रस्तुत करता यह संग्रह पढ़ने योग्य है।





समीक्ष्य पुस्तक- उजली मुस्कुराहटों के बीच
विधा- कविता संग्रह
रचनाकार- विमलेश त्रिपाठी
प्रकाशन- ज्योतिपर्व प्रकाशन, ग़ाज़ियाबाद
मूल्य- 120 रूपये


- जगन्नाथ दुबे
 
रचनाकार परिचय
जगन्नाथ दुबे

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