मई 2017
अंक - 26 | कुल अंक - 57
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

छंद-संसार

दोहे


अब पानी के नाम पर, लड़ना पड़ता युद्ध।
पीने का पानी तभी, मिल पाता है शुद्ध।।


पानी की किल्लत बड़ी, गर्मी में चहुँ ओर।
वन्यजीव आने लगे, अब बस्ती के छोर।।


नल की टोंटी तोड़ते, करते जल बर्बाद।
पछताएंगे एक दिन, करके गलती याद।।


जगह-जगह नलकूप से, धरती को नुकसान।
बात बड़ी गंभीर है, समझे हर इंसान।।


भू-जल दोहन कम करें, जल शोधन भरपूर।
पानी की किल्लत तभी, हो पायेगी दूर।।


करतूतें अपनी बनीं, आज गले की फाँस।
दूषित है वातावरण, लेना मुश्किल साँस।।


कुदरत से खिलवाड़ का, झेल रहे हैं दंड।
सूरज आता है नज़र, लेकर रूप प्रचंड।।


गर्मी की शुरुआत में, जन-जीवन बेहाल।
क्या होगा आगे सखे, सबसे बड़ा सवाल।।


धर्मग्रंथ कहते सभी, पेड़ों में भगवान।
फिर क्यों इनको काटता, रहता है इंसान।।


लता पेड़ पौधे सभी, धरती का श्रृंगार।
इनकी रक्षा के लिए, रहना सब तैयार।।


कचरा तो हैं साथियो, फैलाता दुर्गंध।
खाद बनाकर कीजिए, इसका उचित प्रबंध।।


- श्लेष चन्द्राकर

रचनाकार परिचय
श्लेष चन्द्राकर

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