मई 2017
अंक - 26 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

जीवन वाद्य

हाँ, संभव है
संभव है, सितार के
किसी एक तार के टूट जाने के बाद भी
स्वर निकाल पाने की सम्भावना

जीवन वाद्य है यह मन मेरा भी
संभावनाएं बहुत हैं इस वाद्य पर
जीवन के स्वर राग बजाने की
पर, सच कहूँ तो
मन के तारों के टूटने का सिलसिला
बदस्तूर जारी है

इतर इसके
कोशिश है कि गाँठ पड़े तारों से
ख़ुशी की स्वरलहरियां निकाल पाऊँ मैं
हाथ छलनी होने लगें हैं
अस्पष्ट निकलते 'स्वर' पलटकर घूरतें है मुझे
एक सवाल देखता हूँ मैं उनकी आँखों में
उपहास उड़ाते हैं वो अब
मेरे मन की रागिनी का

सबकी तरह अब सितार नहीं हूँ मैं
टूटते टूटते जीवन साज की महफ़िल में
महज़ इकतारा बन रह गया हूँ
निराश नहीं हूँ, चिंतित हूँ
इकतारे का एक तार भी कहीं.....??


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रोटियाँ अब भी उसकी पहुँच से दूर थीं

चोरी..???
कब की उसने
एक कोशिश भर थी
अपने बच्चों की भूख मिटाने की

कब से खोद रही थी
अँधेरे में
ढाबे की कच्ची दीवारों को
किसी ने न देखा
बस्स्स्स उजाले में
कुछ लोगों ने
उसके बाल पकड़, धक्का दे
भूख के बदल दिए थे मायने

चस्पा हो गयी
अख़बारों में उसकी
मासूम-सी सूरत
कि चोरी की है इसने
बीती रात
रोटियों की

रोटियाँ अब भी
उसकी पहुँच से दूर थीं
न अखबार में
न हाथों में
और
न बच्चों के पेट में
न जाने क्यूँ......??


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चश्मे के भीतर से झांकती आँखों को सब पता है

सुनो....??

सहज नहीं है आजकल
मुँह फेरकर जी लेना
चश्में के भीतर से
झांकती इन आँखों को सब पता है
पता है कि
घर की बालकनी के
कोने में रखे गमले में
तुलसी के पौधे संग
उग आयें हैं चुपचाप
कुछ तल्ख मिर्च के पौधे भी

और
गुलाब के उस पौधे की बात क्या करू मैं!
ज़िक्र जिसका, मेरी कविताओं में
अक्सर तुम्हारे ज़िक्र संग होता आया है
काली/लाल चींटियों ने
ज़बरदस्ती घर अपने बना लिए है उसमें

इन दिनों
सूखते उस पौधे में
पानी डालने से डर लगता है
बेचारी चींटियाँ मर न जाएँ कहीं
पौधे का क्या.....?
बर्दाश्त होता होगा उसको यूँ चुपचाप सूखना
पर इधर
सहज ज़रा भी नहीं है तुम्हारी यादों से
मेरा यूँ ''मुँह चुरा लेना''

अक्सर
सुबह सुबह बातें होती हैं घर में
चाय-पत्ती और शक्कर की
ज़िक्र होता है चाय की चुस्कियों संग
घर की बाक़ी तमाम बातों का
सच
कितना मुश्किल-सा हो गया है ना जीना?
(सूकून से कोई 'किसी' को याद भी नहीं कर सकता)

रोज़
गली में खेलते शरारती बच्चे
हवा निकाल जातें है
मेरी साईकिल के पहियों की
घुटनों में दर्द है
दौड़ा नहीं जाता है मुझसे
तुम बिन किससे कहूँ?
सच्ची!!
खिसियाकर बच्चों के सामने
फूट-फूटकर
रोने को जी करता है

बेबस नहीं हूँ
पेंशन अभी आती है
सबकुछ तो है घर में मेरे
बस्स, चिड़ियाएँ ही अब नहीं आतीं
घोंसला बनाने
सहज नहीं है आजकल जीना
भीतर से चश्मे के
झांकती आँखों को सब पता है!
सुना तुमने??


- मदन सोनी

रचनाकार परिचय
मदन सोनी

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