प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2017
अंक -44

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत-गंगा

बादल आषाढ़ के

बादल बरसे आषाढ़ के,
कजरारे घूंघट काढ़ के।

फिर आ गईं जामुनी घटाएँ,
कड़कायें, बिजलियाँ गिराएं।
हृदय को चीरकर पहाड़ के।

सूरज ने खूब तपाया था,
लू ने हर बार रुलाया था।
देखें वे अब आँखे फाड़ के।

धरती पर पड़ गई दरारें,
पर वर्षा की जब पड़ी फुहारें।
दिन फिर आये जैसे लाड़ के।

लो देखो छाई हरियाली है,
पुरवाई बजा रही ताली है।
ताक रहे वृक्ष सभी ताड़ के।


*************************


गीतों की नगरी में

गीतों की नगरी में मन की एक पंक्ति अर्पित है।

ऊँचे महल यहाँ शब्दों के,
अर्थ नींव-सी नीची।
लगे पहल करने हैं सारे,
किसने रेखा खींची।
उलझे-सुलझे प्रश्न बहुत हैं पर उत्तर हर्षित है।

कंचन की तो बात और है,
सपन कहाँ चाँदी के।
किसी तरह जी कर काटे दिन,
अब तक आजादी के।
बहुत मिला हल, खेत न जुता झूठ कहाँ वर्जित है।

झरते फूल कहाँ पानी के,
अम्बर से हम जाने।
मिले बहुत पैगम्बर हमको,
किस किसको पहचानें।
अलग-अलग है सबका चोला किन्तु रूप गर्वित है।

वे मेले जो कभी लगे थे,
शायद किसी मज़ार पर।
हम तो बस चीखें सुनते हैं,
ठहरे किसी कगार पर।
आई आंधी खड़ा है गाँधी देश रहा चर्चित है।


****************************


हमने हाथ बढ़ाये

हमने हाथ बढ़ाये आगे आग के,
जंगल जलने लगे भरे अनुराग के।

गलियों-गलियों धूल भीषण सन्नाटा,
सूरज ने जड़ दिया गाल पर है चांटा।
चाँद दुबक बैठा बरगद के कोने में,
हब्शी मौसम ने इतना जमकर डांटा।
किसका दामन यहाँ दिखा बिना दाग़ के।

बारहमासी फूल नहीं है माली है,
संसद से सड़कों तक कुर्सी खाली है।
संविधान में लटक रहा गणतंत्र है,
आजादी जिसकी एक सूखी डाली है।
कौन करे रखवाली हरदम जाग के।

आश्वासन के झोंकों में सब झूम रहे,
और गुलाब की सूखी टहनी चूम रहे।
जो कपोत उड़ गए शांति के बादल में,
चक्रवात में फंसे हुए सब घूम रहे।
बड़े भाग से दिन फिर आए काग के।

विष जैसा विश्वास है जब तक आपका,
ऐसा कोई मन्त्र नहीं है जाप का।
सारा शासनतन्त्र हुआ है आपका,
प्रायश्चित्त है कठिन सुरक्षित जाप का।
अपनी ढपली पीटो राग-विराग के।


********************************

ज़िंदगी खुली किताब

ज़िंदगी खुली किताब पढ़ रहे हैं लोग,
शब्द-शब्द हाशियों में गढ़ रहे हैं लोग।

जिसके पृष्ठ-पृष्ठ पर लिखा ही दर्द है,
कल्पना में बात सोचना भी व्यर्थ है।
फिर भी नित नवीन जिल्द मढ़ रहे हैं लोग।
शब्द-शब्द हाशियों में गढ़ रहे हैं लोग।।

चाँदनी की बात चाँद को न ज्ञात हो,
उस चकोर की भले ही जो बिसात हो।
असम्भवी संभावनाएं जड़ रहे हैं लोग।
शब्द-शब्द हाशियों में गढ़ रहे हैं लोग।।

दर्द क्या है, दुःख क्या है, और क्या है ग़म
एक-एक पाठ ये किसे पढ़ाएँ हम।
अजनबी ये सीढियाँ हैं चढ़ रहे हैं लोग।
शब्द-शब्द हाशियों में गढ़ रहे हैं लोग।।

इतना ही देखकर मुझे तो ऐसा लग रहा,
आदमी ही आदमी का खून पी रहा।
‘शील’ बात-बात पर बिगड़ रहे हैं लोग।
शब्द-शब्द हाशियों में गढ़ रहे हैं लोग।।


- श्रीधर आचार्य शील
 
रचनाकार परिचय
श्रीधर आचार्य शील

पत्रिका में आपका योगदान . . .
कविता-कानन (1)गीत-गंगा (2)