मई 2017
अंक - 26 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन

नारी और वृक्ष

 

नारी जैसे वृक्ष,
खुशी हो तो दोनों
फूलों से सजते हैं
दोनों ही बढ़ते
छँटते हैं
इनकी छाँव में कितने लोग पलते हैं

देना ही नियति है
औरों की झोली भरना प्रकृति
धूप-वर्षा सहना पेड़ की शक्ति है
दुःख सह लेना
नारी की भक्ति है

नारी से पेड़ का
एक अबूझ रिश्ता है
पेड़ चाहता है कुछ पानी, कुछ खाद
नारी चाहती है
सिर्फ प्यार और सम्मान


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नदी

नदी का जल
बादल की बूँद बन
बहता है घने जंगल की डालियों पर
मुग्ध होता है वह
एकाकार हो
जंगल झाँकने लगता है उसमें

साफ़ परिदृश्य
पाखी, तितली, हिरण
और अनछुई बदली
छू लेती है नदी का अंतर्मन

जब नदी बर्फ हो
बूँद-बूँद बन उड़ रही थी
तो भी नदी का रंग
श्वेत ही था
उड़ती भाप-सा

नदी हमेशा से पाक
पवित्र थी
जब गाँव-गाँव भटकी
जब शहर घूमी
जब समुद्र से मिली
या फिर बादल बन ढली

बचा सको नदी का रंग
बदरंग होने से
तो नदी बनना होगा
तर्पण करना होगा

अपने आँख की
बहती अश्रु-धारा बचानी होगी
जहाँ से फूटते हैं
सभी आत्मीय स्त्रोत।


- मंजुल भटनागर

रचनाकार परिचय
मंजुल भटनागर

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कविता-कानन (1)