प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मई 2017
अंक -38

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव

ग़ज़ल-

चाहिये असबाब कितना उम्र-ए-फ़ानी के लिए
बोझ कंधो पर बहुत है इक जवानी के लिए

हो फ़क़त लंबी ज़ुबां इतना यहाँ काफ़ी नहीं
हौसला भी लाज़मी है हक़-बयानी के लिए

इस जूनून-ए-इश्क़ को बहता हुआ पानी समझ
चीर देता है पहाड़ों को रवानी के लिए

सैंकड़ों इंसान की लाशों पे इसकी नींव है
बस लहू दरकार है इस राजधानी के लिए

जलवा-ए-महबूब की कैसे सताइश कर सकूँ
चाहिए दीवानगी उन लफ़्ज़-ओ-मानी के लिए

किस तरह महबूब शाहों के कसीदे पढ़ सके
वो तो बस पैदा हुआ है न'अत ख्वानी के लिए


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ग़ज़ल-

ग़म को आता है यहाँ भेस बदल कर आना
तुम रहे इश्क़ में ऐ दोस्त! संभल कर आना

सर बुलंदी का तो मफ़हूम फ़क़त है इतना
लाश के ढेर को पैरों से कुचल कर आना

इत्तेफाक़न तो नहीं है कि तेरा ही चर्चा
मेरे हर शेर के अंदाज़ में ढल कर आना

अपनी बेटी को बड़ा होते हुए जब देखूँ
मौज-ए-दरीया सा लगे उसका मचल कर आना

लोग सब क़ैद हैं ज़िन्दान-ए-अना में महबूब
इतना आसां भी नहीं खुद से निकल कर आना


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ग़ज़ल-

जहाँ सर पीटता है आदमी अपनी ज़रूरत पर
करे विश्वास कोई किस तरह अच्छे मुहूरत पर

यहाँ हर शख्स की आँखों में बस आँसू ही आँसू है
मगर हर शख्स हँसता है किसी रोते की सूरत पर

तेरे पहलूनशीं होकर दुआ-ए-मर्ग माँगी थी
मगर आई नहीं कमबख्त अच्छे से मुहूरत पर

ये कैसा दौर है भूखों को दाना मिल नहीं पाता
मगर पकवान चढ़ते है यहाँ सोने की मूरत पर

हमें रब ने बनाया था सभी से प्यार करने को
मगर इंसान तो चलता रहा राह-ए-कुदूरत पर

मेरे महबूब गर बच्चा कोई स्कूल जाता है
नज़ाकत से निकल जाते हैं उसके खूबसूरत पर


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ग़ज़ल-

"ग़मों का तोड़ है तावीज़" कह कर बेचने वाला
है खुद ही मुब्तिला ग़म से मुक़द्दर बेचने वाला

जो पुरखों की निशानी थी, वही घर बेचने वाला
बहुत मज़बूर था बाज़ार आ कर बेचने वाला

तिज़ारत के नए पहलू हमेशा खोज लेता है
जो अपने रंजो-ग़म है मुस्कुराकर बेचने वाला

मुझे तकलीफ़ कम देती है अब ये नौकरी मेरी
झुलसता धूप में देखा है चादर बेचने वाला

ख़ुदा ही जानता है राज़, प्यासा क्यूँ मरा होगा
बसों में बोतलें पानी की दिनभर बेचने वाला

समझ पाता नहीं कोई भी इस अंदाज़-ए-दुनिया को
दुआएं अम्न की देता है खंजर बेचने वाला

उसे मेहमां नवाज़ी की अदा हर रस्म करनी थी
बड़ा खुद्दार था घर के कनश्तर बेचने वाला

मेरे महबूब मैं तक़दीर पे उसकी बहुत रोया
हुनर मज़बूरियों में था सुखनवर बेचने वाला


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ग़ज़ल-

कोई जब हुस्न दिलकश शायरी के देख लेता है
नये अंदाज़ भी वो ज़िंदगी के देख लेता है

फ़रिश्ते चूम लेते हैं अदब से उसकी आँखों को
कोई जलवे अगर मेरे नबी के देख लेता है

गुज़र जाता है ग़म की आँधियों से हँस के वो लेकिन
बहुत रोता है गर आँसू किसी के देख लेता है

न  जाने क्यूँ शिकायत है बहुत एहबाब को उससे
तअज्जुब है कि वो ग़म अजनबी के देख लेता है

ग़मों के दौर में महबूब घबराता नहीं है वो
सँभलता है, ज़माने जो ख़ुशी के देख लेता है


- मेहबूब सोनालिया
 
रचनाकार परिचय
मेहबूब सोनालिया

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