अप्रैल 2017
अंक - 25 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

प्राचीन और नवीन ज्ञान के समन्वय से दूर होगा ‘आलोचना का संकट’ : डॉ. बृजेन्द्र कुमार अग्निहोत्री

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी आलोचकों को उनके कर्तव्यों से परिचित कराते हुए कहते हैं- "समालोचक का कर्तव्य है कि वह इस बात पर विचार करे कि किसी पुस्तक या प्रबंध में क्या लिखा गया है, किस ढंग से लिखा गया है, वह विषय उपयोगी है या नहीं, उससे किसी का मनोरंजन हो सकता है या नहीं, यही विचारणीय है।"
आचार्य श्यामसुन्दर दास ‘आलोचना’ को परिभाषित करते हुए कहते हैं- "यदि साहित्य को जीवन की व्याख्या मानें तो आलोचना को व्याख्या की व्याख्या मानना पड़ेगा।" तात्पर्य यह है कि सर्जना की सर्जना करने के कारण आलोचक पुनर्सर्जक होता है। स्पष्ट है कि रचना को स्थापित करने का दायित्व आलोचक का होता है।
वर्त्तमान परिप्रेक्ष्य में आलोचना का जो स्वरूप दिखाई पड़ता है, उसमें प्रवंचना के साथ आत्म-मुग्धता से आलोचक में जन्मा ‘अहम’ भाव प्रायः समाहित होता है। अधिकांश लेखक स्वयं को स्थापित करने के लिए आलोचक बनने को लालायित रहते हैं। ऐसे लेखक ही कथित ‘गठबंधन’ करके ‘आलोचना का संकट’ खड़ा कर देते हैं। एक-दूसरे की मानक-विहीन आलोचना करके ‘आलोचक’ की गरिमा को धूमिल करते हैं।


‘आलोचना के संकट’ का प्रमुख और महत्वपूर्ण कारक संबंधित कृति के अध्ययन, चिंतन और मनन में कमी भी है। ऐसे अनेक कथित आलोचक मिल जायेंगे, जिन्होंने आलोचना हेतु एक निर्धारित प्रारूप बना रखा होगा। इस प्रारूप में कृति को ढालकर तत्काल कृति की आलोचना कर देते हैं। हालांकि ऐसी आलोचना और आलोचक, दोनों का प्रभाव अल्प समय तक ही रहता है। ऐसे आलोचकों के लिए डॉ. अनिल कुमार जैन (उज्जैन) की निम्न पंक्तियों पर ध्यान देना चाहिए-
 

है बहुत आसान मौजों का तमाशा देखना
गहरे पानी पैठ जाना, किसके वश की बात है

 

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के पूर्व भी ‘आलोचना का संकट’ लगभग ऐसा ही था। न कोई आदर्श, न कोई सिद्धांत। न कोई आग्रह, न कोई धारणा। आलोचक अपने व्यक्तिगत पूर्वाग्रह के कारण किसी भी रचनाकार को श्रेष्ठ या हीन सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं। काफी हद तक यही परंपरा पुनः दृष्टिगत हो रही है, जिसके कारण ‘आलोचना’ पर घने काले बादल छाते जा रहे हैं। ऐसे कथित आलोचकों (जो स्वयं आलोचना के संकट बन गये हैं) की मनःस्थिति को ग़ज़लकार धीरज चौहान (नई दिल्ली) के शे’र से समझा जा सकता है-
 

दुनिया के दस्तूर निभाने की खातिर
रोज़ नए किरदार को गढ़ना पड़ता है


हिंदी साहित्य में शुक्ल जी ने आलोचना के नवीन मानदंडों की स्थापना की और आलोचना पद्धति का सुनिश्चित पथ निर्मित किया। आचार्य शुक्ल युगीन परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में ही किसी कृति की आलोचना पर बल देते थे। उनके प्रयासों से उस समय 'आलोचना का संकट' कम हुआ और  पं. कृपाशंकर शुक्ल, बाबू श्यामसुन्दर दास, विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, रमाशंकर शुक्ल, पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी, आचार्य नंददुलारे वाजपेयी, डॉ. नगेन्द्र, बाबू गुलाबराय, रामविलास शर्मा, अमृतराय, शिवदान सिंह चौहान, अज्ञेय, इलाचंद्र जोशी और नामवर सिंह अनेकों विज्ञ आलोचकों ने हिंदी आलोचना को समृद्धता प्रदान की। इस समृद्धता में नित होते क्षय ने पुनः ‘आलोचना का संकट’ खड़ा कर दिया है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि जिस आलोचना के कारण बड़े-बड़े रचनाकार संकट में आ जाते थे/ हैं; आज हिंदी साहित्य की वही विधा ‘आलोचना’ के संकट के दौर से गुजर रही है।


साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है और आलोचना को साहित्य का दर्पण। समाज में हो रहे नैतिक मूल्यों का ह्रास साहित्य में दिख रहा है और साहित्यिक मूल्यों में आ रही गिरावट ‘आलोचना’ में दृष्टिगत हो रही है। हिंदी साहित्य से ‘आलोचना के संकट’ को दूर करने के लिए पुनः आचार्य शुक्ल जैसे मनस्वी या मनस्वियों की आवश्यकता है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ऐसे आलोचकों की आवश्यकता है, जिनमें सहृदयता, निष्पक्षता, सहज-प्रतिभा, विस्तृत ज्ञान और अभिव्यंजना-कौशल जैसे गुण विद्यमान हों। उनकी आलोचना में कृति के गुण-दोषों के उद्घाटन के साथ कृति का मूल्यांकन कर कृतिकार के उद्देश्य को स्पष्ट किया जाना आवश्यक है।
आलोचना का यह संकट तभी दूर होगा, जब रचनाकार प्राचीन और नवीन ज्ञान के समन्वय को स्वीकार कर निष्पक्ष भाव से सृजन करे और आलोचक उसी भावभूमि पर जाकर कृति की आलोचना करे। विष्णु प्रभाकर जी के शब्दों में- “आलोचक को किसी रचना की आलोचना करते समय उस भाव-भूमि पर पहुँचना अनिवार्य है, जिस भाव-भूमि में उस रचना का सृजन हुआ हो।"

 

जिस तरह रात के बाद दिन आता है, उसी तरह आलोचना के संकट के उपरान्त आलोचना के नए कीर्तिमान स्थापित होंगे, इस बारे में आशान्वित भी हूँ और आश्वस्त भी। दुष्यंत कुमार की इन पंक्तियों के साथ अपनी बात समाप्त करूंगा-
 

वे मुतमईन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेकरार हूँ, आवाज़ में असर के लिए




संदर्भ-
1. अनुकाल- डॉ. ओउमप्रकाश अवस्थी, साहित्य रत्नालय, कानपुर
2. भारतीय इतिहास- डॉ. प्रमिला अवस्थी- ज्ञानोदय प्रकाशन, कानपुर
3. समीक्षा की धार- डॉ. अश्विनीकुमार शुक्ल, मधुराक्षर प्रकाशन, फतेहपुर
4. हिंदी- डॉ. अशोक तिवारी, साहित्य भवन, आगरा
5. शब्द प्रवाह (त्रैमासिक)- सं. संदीप सृजन, अक्टूबर-दिसंबर 2013 अंक, उज्जैन


- डाॅ. बृजेन्द्र कुमार अग्निहोत्री

रचनाकार परिचय
डाॅ. बृजेन्द्र कुमार अग्निहोत्री

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