अप्रैल 2017
अंक - 25 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

नाटक

नाटक- औकात


प्रस्तावना: यह नाटक समाज के उन चेहरों का पर्दाफाष करता है, जिनकी करनी उनकी कथनी के ठीक विपरीत होती है। ये नाटक बताता है कि अपने-आपको बुद्धिजीवी कहलानेवाले कुछ लोग बातें तो बड़ी-बड़ी करते हैं लेकिन धरातल पर उनका कर्तृत्व नितांत ही विरोधाभासी होता है। यह नाटक ऐसे चेहरे पर से पर्दा उठा कर उन्हें समाज के सामने लाने का एक प्रयास है।

पात्र-परिचय:
1.    अरविंद: मुख्य नायक (लगभग 35-40 वर्ष का)
2.    राजेष: अरविंद का मित्र (लगभग 35-40 वर्ष का)
3.    रौषन: अरविंद का मित्र (लगभग 35-40 वर्ष का)
4.    दिनेष: अरविंद का मित्र (लगभग 35-40 वर्ष का)
5.    दूधवाला (लगभग 30-35 वर्ष का)
6.    भिखारी (लगभग 15-17 वर्ष का)
7.    पत्नी: अरविंद की (लगभग 30-35 वर्ष की)
8.    बच्चा: अरविंद का (लगभग 8-10 वर्ष का)

कुल पात्र:  
पुरुष पात्र - 5
स्त्री पात्र  - 1
लड़का  -   1
बच्चा  -    1


 (1)

(एक बरामदे में चार व्यक्ति अरविंद, राजेष, रोषन और दिनेष अखबार पढ़ रहे हैं)
अरविंद: हद हो गई...आज आदमी इतना बेरहम हो गया!
दिनेष : क्या हुआ? (षेष सभी अरविंद की तरफ देखने लगते हैं)
अरविंद: अखबार लिखता है कि पटना के एक मुहल्ले में पूजा के लिए फूल तोड़ने के कारण एक संभ्रांत व्यक्ति ने एक बच्चे को इतना पीटा कि वह मर गया।
रौषन : फिर, उस आदमी का क्या हुआ?
अरविंद: वह आदमी अभी तक भागा हुआ है।
राजेष : ...और होगा भी क्या, ले-दे के मामला रफा-दफा हो जाएगा।
अरविंद: बात केवल मामले की ही नहीं है। बात तो ये है कि एक संभ्रांत व्यक्ति के द्वारा एक बच्चे के साथ किये गये इस तरह की करतूत से किस तरह का संकेत मिलता है?
दिनेष : तो, इसमें हैरान होनेवाली बात ही क्या है...अरे, आज इंसान है ही कहाँ? हैवान ढँूढिये
। कदम-कदम पर मिलेंगे।

अरविंद: ...अ...अभी आया।

(...कह कर वह साथ के सटे कमरे में चला जाता है)


(2)

(बगल के सटे कमरे में)
अरविंद : क्यों दीपू की माँ, अरे इतनी देर से मेरे संगी-साथी आ के बैठे हुए हैं...और तुम...आज चाय-वाय नहीं पिलाओगी क्या?  
पत्नी   : अपने संगी-साथी की इतनी फिकर है आपको। कभी-कभार घर की फिक्र भी कर लीजिये। चाय-चीनी, आटा-चावल आदि घर में है भी या नहीं, इस पर भी एक नजर डाल लिया कीजिए।
अरविंद: (खीझ कर) तुम क्या समझती हो, ये घर-मकान, ये आये-गये, ये सब क्या अपने-आप टपक जाते हैं...बिना मेरी फिक्र किये...?
पत्नी  : ऐसा तो मैंने नहीं कहा।
अरविंद: और बाकी भी क्या रहा कहने को...बिना कहे सब कुछ कह देना ही तो तुम्हारी खूबी है।
पत्नी  : आपसे कम ही है। एक मरे हुए...पराए बच्चे के लिए इतनी पीड़ा...और अपने घर-परिवार...
अरविंद: ...देखो, तुम मुझे सिरदर्द मत दिया करो...और एक बात सुन लो, हमसब बरामदे में हैं और हमलोगों को चार कप चाय चाहिए...अभी।
पत्नी  : चीनी नहीं है।
अरविंद: चीनी नहीं है...? अभी कल ही तो थी।
पत्नी  : कल नहीं, परसों आई थी और उसी दिन खत्म हो गई...आपकी इसी महफिल में...अब थोड़ा-थोड़ा करके रोज मँगवाइयेगा, तब तो यही होगा न?
अरविंद: (जेब से पैसे निकालते हुए) जब-जब चाय बोलेंगे, तब-तब चीनी आएगी...वाह! (पैसे देकर...इतनी बातें कहते हुए वह वापस लौट जाता है)


(3)

(बरामदे में)
रौषन : क्यों अरविंद बाबू, (चुटकी लेते हुए) ये तो आप हमलोगों के साथ बड़ा अन्याय कर रहे हैं
। हमलोगों को कम और भाभी जी को अधिक समय दे रहे हैं...

दिनेष : लगता है कि हम ही लोग गलत समय पर आ गये हैं।
अरविंद: अरे नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है, वो चाय...
राजेष : ओहो चाय...तो क्या चाय इतनी देर से आप ही बना रहे थे?
रौषन : भाभी जी को आराम देकर...
(सभी ठठाकर हँस पड़ते हैं। उसी समय अंदर से बच्चे के रोने की आवाज आने लगती है। अरविंद बाबू अपने दोस्तों से समय लेकर फिर अंदर चले जाते हैं)
अरविंद: (क्रु़द्ध होकर, पत्नी से) सीधे-सीधे क्यों नहीं कहती हो कि हमलोग यहाँ से उठ कर चले जायें। ये नौटंकी क्यों? हमलोग बातचीत कर रहे हैं और तुम बच्चे से बिरहा सुनवा रही हो...
पत्नी: मैं सुनवा रही हँू? मैं आप लोगों को उठ कर जाने के लिए कह रही हँू? आपको हर समय मुझमें ही खोट नजर आता है। आपको सारी दुनिया अच्छी लगती है, एक मुझे छोड़ के...
अरविंद: हर बात में बहस। अरे, इस लड़के को पीट क्यों रही हो?
पत्नी: इसी से पूछ लीजिए। आधे पैसे की चीनी लाया और आधा पैसा गायब...। अब इसके लिए इस नालायक को पीटा नहीं जाए तो क्या इसे चुम्मा लिया जाए?
अरविंद: (एक लंबी साँस छोड़ने के बाद) फिलहाल, चार कप चाय दिया जाए...
(इतना कह कर वह वापस बरामदे में चला जाता है)


(4)

(बरामदा में आते ही, दरवाजे से सटे एक आदमी को देख कर)
टरविंद : क्या है?
दूधवाला: जी, दूध का पैसा!
अरविंद : दूध का पैसा...या, पानी का...?
दूधवाला: महीना-भर तो दूध ही रहता है मालिक...केवल पैसा माँगते समय वह पानी हो जाता है...वाह!
टरविंद : अरे मँुह लगाएगा...?
दूधवाला: नहीं मालिक, मँुह लगाने का हक तो बस आप ही लोगों का है...हम गरीब तो बस सेवा दे के मूर्ख बनने के लिए हैं।
अरविंद : अरे, तुम लोग मूर्ख बनते नहीं हो, मूर्ख बनाते हो। अभी जाओ, पैसा बाद में लेना।
दूधवाला: इतनी-सी बात! (वहाँ से जाते-जाते) पहले ही कह देना था।
 (अरविंद मन मसोस के रह जाता है। उसके अपनी कुर्सी पर पहँुचते ही उसकी चाय भी वहाँ पहँुच जाती है।)
अरविंद : (सबों से) चाय ली जाए।
      (सभी लोग अपनी-अपनी चाय लेते हैं। एक-एक घँूट लेने के बाद)
अरविंद : चाय कैसी लगी?
दिनेष  : चाय तो चाय है। (थोड़ा मुस्कुरा कर) आखिर, भाभी जी के हाथ की बनी जो है, अच्छी तो होनी ही थी...
रौषन  : खाक अच्छी है...चाय तो बस पानी जैसी लग रही है...
अरविंद : (खुष होकर) यही बात मैं कहना चाह रहा था...और, अभी आपलोगों ने देखा...उस दूधवाले को? दूध का पैसा माँगने आया था। (कुर्सी पर थोड़ा पसर कर) सूअर कहीं का!
राजेष  : क्या कीजिएगा अरविंद बाबू। बात केवल दूध की ही रहती तो और बात थी। यहाँ तो तेल, गोलमिर्च, सत्तू, मिट्टी का तेल...हर चीज में मिलावट ही मिलावट है। कहा भी गया है कि-एक ही उल्लू काफी है, बरबाद गुलिस्तां करने को...हर षाख पे उल्लू बैठा है, अंजामे गुलिस्तां क्या होगा?
सभी   : (मुस्कुरा कर) वाह...वाह, जियो अपने राजेष भाई!
दिनेष  : भाई, दूध की मिलावट से अगर अपने राजेष भाई षायर बन गये तो मैं तो चाहँूगा कि हर चीज में मिलावट हो ही जाए...
(सभी एक बार फिर ठठा कर हँस पड़ते हैं)


(5)

(दरवाजे पर एक भिखारी कटोरा बजाते हुए)
भिखारी: मालिक, कुछ दे दीजिए मालिक!
अरविंद: (खीझ कर) बस, एक तुम्हीं बाकी थे। तुम भी आ गये...एक साध ही रह गई कि जरा स्थिर से हमलोग आपस में बातचीत करते...कभी घरवाली, कभी बच्चा, कभी दूधवाला...और कभी ये  भिखमंगा...। अरे, दूसरा दरवाजा देखो, यहाँ कोई मालिक-वालिक नहीं रहता है।
राजेष: सभी नौकर रहता है...
रौषन: कोई सरकार का तो कोई (अरविंद की तरफ देख कर) बीवी का...।
(एक बार फिर चारों ठठा कर हँस पड़ते हैं)
भिखारी: (पेट पकड़ कर): दो दिनों से भूखा हँू मालिक...
दिनेष : जिन्दा हो, यही बड़ी बात है...वर्ना, यहाँ तो सभी मरे हुए हैं...
रौषन : कोई भूख से...
राजेष : कोई षरम से...
भिखारी: ...तो, कोई जमीर से...
(चारों अचरज से उस भिखारी की ओर देखने लगते हैं)
भिखारी: (बहुत देर तक पागलों की तरह वह ठहाका लगा कर हँसता रहा...अचानक एकदम षांत हो गया और...फिर षांत होने के बाद): बहुत देर से आपलोगों की बातें सुनता रहा। बात-बात पर हँसी...क्या मुझे नहीं हँसना आता है? (अचानक अनचाही हँसी और फिर गुस्से से) अखबार में एक बच्चे के मारे जाने की खबर पर आपलोगों की इतनी पीड़ा...? और, अपनी पत्नी, अपने बच्चे, एक गरीब दूधवाले और मुझ जैसे भुक्खड़ भिखमंगे के लिए जरा-सी भी सहानुभूति नहीं...? सच तो ये है कि आपलोगों के
दिल में किसी के लिए कोई अनुभूति नहीं है। (फिर, रोने लगता है) हाँ, कल अगर मैं भी भूख से मर जाऊँ तो मेरी भी भूख पर, मेरी मौत पर और समाज के इस बनावट-बुनावट पर जरूर बहस कर लीजिएगा...क्योंकि, आपलोगों के दिल में किसी के लिए पीड़ा नहीं है...अगर कुछ है, तो वह है-किसी मुद्दे को लेकर उस पर बहस करने का षौक...बस, और कुछ नहीं
(थोड़ा षांत होकर) मेरी ही गलती थी, जो मैं अपलोगों को पहचान नहीं सका...और, आपलोगों को पढ़ा-लिखा और समझदार जान कर...आपलोगों से जरूरत से ज्यादा उम्मीद लगा बैठा। हँूह, देख लिया आपलोगों के जैसे पढ़े-लिखों की औकात...
 
(पूरा मंच प्रकाष से नहा जाता है। चारों सिर झुकाए नजर आते हैं...फिर धीरे-धीरे मंच पर पूरी तरह अँधेरा छा जाता है तथा वातावरण में गँूजता रह जाता है -
‘‘औकात...औकात...औकात...’’)

 


- डाॅ. गोपाल निर्दोष

रचनाकार परिचय
डाॅ. गोपाल निर्दोष

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