प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अप्रैल 2017
अंक -44

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कहानी- कबीरदास

यह काल्पनिक कहानी नहीं है, सच्ची घटना है। पिछले साल गर्मी की छुट्टियों में मैं अपने मामा के यहाँ रहने के लिए आया। वहीं मामाजी ने मुझे यह सत्य-कथा सुनाई। पिछले कई सालों से शहर के इलाक़े रामपुरा शरीफ़ में एक अर्द्ध-विक्षिप्त बूढ़ा भटकता हुआ दिख जाता था। वेश-भूषा और हरकतों से वह कोई पागल भिखारी लगता था। कोई नहीं जानता था कि उसका नाम क्या था या वह कहाँ से आया था। कोई कहता कि वह एक स्वतंत्रता-सेनानी था, जिसके बहू-बेटों ने बुढ़ापे में उसे घर से बाहर निकाल दिया था। इसी सदमे से वह पागल हो गया था। किसी का कहना था कि वह हिन्दी का एक समर्थ कवि और कहानीकार था, जिसकी रचनाओं को हिंदी साहित्य के खेमा-बद्ध आलोचकों ने कोई महत्त्व नहीं दिया था। धीरे-धीरे वह अर्द्ध-विक्षिप्त हो गया था। उसके घरवालों ने उसका इलाज कराने की बजाए उसे घर से बाहर निकाल दिया था। कुछ लोगों का यह भी कहना था कि 1947 में देश के विभाजन के समय हुए दंगों में उसके माँ-बाप मारे गए थे । दिसम्बर 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद हुए दंगों में उसके बीवी-बच्चे मारे गए थे। इसी सदमे की वजह से वह अपना मानसिक संतुलन खो बैठा था। सच क्या था, कोई नहीं जानता था।

 

इलाक़े के लोगों ने उसका नाम 'कबीरदास' रख दिया था। मैले-कुचैले चिथड़े, बिखरे हुए बाल और आँखें लाल- यही कबीरदास का हुलिया था। सर्दी हो, गर्मी हो या बरसात, कबीरदास हवा को घूरता हुआ, अदृश्य लोगों से बातें करता हुआ, कभी हँसता, कभी रोता हुआ अक्सर इलाक़े की गलियों में भटकता हुआ दिख जाता था। उसके पास एक पोटली होती थी, जिसे वह सीने से चिपकाए रहता था। कोई नहीं जानता था कि उस पोटली में क्या था। हालाँकि कबीरदास इलाक़े के बच्चों को कुछ नहीं कहता था पर वे उससे डरते थे। दरअस्ल इसमें कबीरदास का कोई दोष नहीं था। हमारे यहाँ पागलों और हिजड़ों से डरने का रिवाज़ है। इलाक़े की माँएँ जब अपने ज़िद्दी और उद्दंड बच्चों को नियंत्रित नहीं कर पातीं, तो वे कबीरदास का नाम लेकर अपने बच्चों को डराती थीं। बिल्कुल फ़िल्म 'शोले' के गब्बरसिंह के नाम की तरह। हालाँकि उनमें कोई साम्य नहीं था। इलाक़े के शोहदे जब कबीरदास को छेड़ते तो वह किसी 'एंग्री ओल्ड मैन' की तरह उन पर पत्थर फेंकने लगता। लेकिन जल्दी ही वह शांत हो जाता।
पर इलाक़े के लोगों के लिए हैरानी की बात यह थी कि कभी-कभी कबीरदास के ज़हन पर छाई पागलपन की काई हट जाती थी। तब वह सयानों जैसी बातें करने लगता था। एक बार नत्थू के ढाबे पर लोग देश में जगह-जगह हो रहे दंगे-फ़सादों के बारे में बातें कर रहे थे। कबीरदास वहीं पास में बैठा लोगों की बातें सुन रहा था। अचानक वह अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ और गम्भीर आवाज़ में बोला-

 

ना हिंदू बुरा है, ना मुसलमान बुरा है
बुराई पर जो उतर आए, वो इंसान बुरा है

 

फिर वह ताली बजा-बजा कर हँसने लगा। एक पागल के मुँह से ऐसी बातें सुनकर लोग दंग रह गए।
इसी तरह एक बार और नुक्कड़ के पान वाले गनेशी की दुकान पर जब लोगों के बीच साम्प्रदायिकता पर बहस छिड़ गई, तब वहीं मौजूद कबीरदास अचानक बोल पड़ा-

 

कोई बोले राम-राम, कोई ख़ुदा-ए
कोई सेवै गोसैयाँ, कोई अल्लाह-ए

 

यह सुनकर लोगों के हैरानी की सीमा नहीं रही।
इन्हीं घटनाओं के बाद लोगों ने उस पागल बूढ़े को 'कबीरदास' कहना शुरू कर दिया।
एक बार मास्टर रामदीन और दर्ज़ी लियाक़त मियाँ किराने की दुकान खंडेलवाल स्टोर्स के बाहर खड़े होकर देश की राजनीति पर बातें कर रहे थे। कबीरदास भी पास में ही खड़ा हवा को घूर रहा था अचानक वह कॉलेज के किसी हिंदी प्रोफ़ेसर के अंदाज़ में बोल उठा-

 

न कोई प्रजा है
न कोई तंत्र है
यह तो
आदमी के ख़िलाफ़
आदमी का
खुला-सा
षड्यंत्र है।

 

मास्टर रामदीन ने धूमिल को पढ़ा था। पागल कबीरदास के मुँह से धूमिल की पंक्तियाँ सुनकर वे भौंचक्के रह गए। पर मास्टर रामदीन कबीरदास से कुछ पूछ पाते, इससे पहले ही वह किन्हीं अदृश्य लोगों को गालियाँ बकता हुआ वहाँ से चला गया। इस बीच एक दिन शहर में बड़ा हादसा हो गया। लाल, सूजी आँखों वाली एक सुबह आतंकवादियों ने शहर में कई जगह बम धमाके कर दिए। इन विस्फोटों में बहुसंख्यक वर्ग के दर्जनों लोग मारे गए। विस्फोटों के बाद असामाजिक तत्वों ने अल्पसंख्यक वर्ग के मकानों व दुकानों पर हमला कर दिया। दंगे-फ़साद शुरू हो गए। बड़े पैमाने पर लूट-पाट, आगज़नी और छुरेबाज़ी की घटनाएँ होने लगीं। एक-दूसरे के धर्म-स्थलों में गाय और सुअर का माँस फेंकने की वारदातें होने लगीं। क़ानून और व्यवस्था बहाल करने और स्थिति पर नियंत्रण पाने के लिए प्रशासन को शहर में कर्फ़्यू लगाना पड़ा। पर
कर्फ़्यू के दौरान भी छिटपुट घटनाएँ होती रहीं।


 

दो दिन बाद एक बिना चिड़ियों वाली सुबह कर्फ़्यू में कुछ घंटों की ढील दी गई। पर कर्फ़्यू में ढील के दौरान इलाक़े में एक सिर-कटी लाश मिलने से लोगों में तनाव बढ़ गया। शरारती तत्व मौक़े की ताक में थे। देखते-ही-देखते लाश के इर्द-गिर्द एक उत्तेजित भीड़ जमा हो गई। भीड़ में हिंदू और मुसलमान, दोनों ही थे।
पिछली रात ही आसमान से मरे हुए पक्षियों की बारिश हुई थी। कुछ लोग कौतूहल-वश वहाँ पहुँचे थे। कुछ लोगों के जवान बेटे दो दिन से घर नहीं लौटे थे। ऐसे आशंकित लोग भी भीड़ में थे।
भीड़ में हिंदू और मुसलमान युवकों की संख्या ज़्यादा थी। कई खूँखार युवा चेहरे ऐसे भी थे, जो उस इलाक़े में पहले कभी नहीं देखे गए थे। ज़ाहिर है, वे किसी ख़ास मक़सद के लिए बाहर से आए या बुलाए गए थे। पता नहीं कबीरदास को क्या और कितना समझ में आ रहा था, पर वह भी भीड़ में मौजूद था। देखते-ही-देखते भीड़ दो हिस्सों में बँट गई। हिंदू एक ओर हो गए। मुसलमान दूसरी ओर हो गए। कबीरदास किसी ओर नहीं गया। वह सिर-कटी लाश के पास ही बीच में खड़ा रहा। उदास आँखों से लाश को घूरता हुआ। यह वह समय था, जब सारे देश पर एक डरावनी-सी परछाई फैली हुई थी। शहरों की गलियों में अफ़वाहें सीना ताने घूम रही थीं। इस धर्म के इतने लोग मारे गए, उस मज़हब के इतने लोग ज़िंदा जला दिए गए- चारों ओर ऐसी अफ़वाहों का ज़ोर था। ऐसा लगता था, जैसे भरी दुपहरी में अँधेरा छा गया हो। लोग अँधेरों में घिरे थे और अँधेरों को ही रोशनी समझ रहे थे।

 

वह एक सड़े हुए फल-सा लिजलिजा और बदबूदार दिन था। हिंदुओं और मुसलमानों की उत्तेजित भीड़ शहर के उस इलाक़े रामपुरा शरीफ़ में एक सिर-कटी लाश के
इर्द-गिर्द जमा थी। भीड़ में इंसान की शक्ल में भेड़िए, लकड़बग्घे, साँप, बिच्छू, गिद्ध और मगरमच्छ मौजूद थे। भीड़ में से जंगली जानवरों के गुर्राने की डरावनी आवाज़ें आ रही थीं। विचारधाराओं के मुखौटे ओढ़े अपराधी तत्व भीड़ में घुसे हुए थे। और मौक़े की प्रतीक्षा में थे। किसी बड़ी अनहोनी की आशंका का साया सब पर मँडरा रहा था। अफ़सोस की बात यह थी कि ऐसे संवेदनशील इलाक़े और तनावपूर्ण माहौल में एक भी पुलिसवाला मौजूद नहीं था। दरअस्ल प्रदेश के गृह-मंत्री दंगा-प्रभावित इलाक़ों के दौरे पर आ रहे थे। लिहाज़ा समूचा प्रशासन और पूरा पुलिस-बल हवाई-अड्डे और मंत्री महोदय के आने के रास्ते पर उनकी सुरक्षा और अगवानी के लिए मुस्तैदी से तैनात था।
भीड़ अब ख़तरनाक रूप से दो विपरीत खेमों में बँट चुकी थी। भीड़ में मौजूद हिंदू युवकों का कहना था कि वह सिर-कटी लाश किसी हिंदू की थी और उसे मुसलमानों ने मारा था। दूसरी ओर भीड़ में मौजूद मुसलमान युवकों का दावा था कि वह सिर-कटी लाश किसी मुसलमान की थी, जिसे हिंदुओं ने मारा था। माहौल में  तनाव था, उत्तेजना थी। ऐसा लग रहा था, जैसे किसी भी पल कुछ भी हो सकता था।
अचानक भीड़ में से एक बुज़ुर्ग हिंदू आगे आया। वह थके हुए क़दमों से लाश के पास गया और लाश पर झुककर कुछ देखने लगा। फिर उसके मुँह से एक दर्दनाक चीख़ निकली जो कातर विलाप में बदल गई। वह लाश के पास उकड़ूँ बैठ गया और आसमान की ओर देखकर मातमी स्वर में बोलने लगा-
"हे ईश्वर, यह दिन भी देखना लिखा था। आज मेरा बेटा किशोर मेरी आँखों के सामने मरा पड़ा है। यह लाश उसी की है। क्या मैं अपने बेटे को नहीं पहचानूँगा? अगले महीने इसकी शादी होने वाली थी। बम धमाकों के बाद यह 'अभी आता हूँ' कहकर जो गया तो वापस ही नहीं लौट पाया। बेरहम दंगाइयों ने कितनी बेदर्दी से मेरे बेटे का सिर काट दिया। हाय, मेरा बेटा!" इतना कहकर वह बुज़ुर्ग हिंदू उस सिर-कटी लाश से लिपटकर बिलख-बिलख कर रोने लगा।

 

भीड़ में खड़े हिंदुओं की आँखें नम हो गईं। कई हिंदू युवकों ने 'हत्यारों का नाश हो' जैसे नारे लगाए। वहाँ मौजूद मुसलमानों के चेहरों पर तनाव की रेखाएँ बढ़ गईं। अचानक दूसरी ओर की भीड़ में से एक बुज़ुर्ग मुसलमान आगे आया वह भी थके-हारे क़दमों से चलता हुआ उस सिर-कटी लाश तक गया। लाश को ध्यान से देखने के बाद वह भी फूट-फूटकर रोने लगा।
"या अल्लाह, यह तो मेरा बेटा नदीम है। दो दिन से लापता था। मैंने बहुत समझाया था कि बेटा, दंगे हो रहे हैं। बाहर मत जा। पर वह नहीं माना। 'अभी आता हूँ, अब्बा' कहकर जो गया तो फिर लौट नहीं पाया। हाय, कसाइयों ने कितनी बेरहमी से मार डाला है मेरे जिगर के टुकड़े को!" इतना कहकर वह बुज़ुर्ग मुसलमान भी लाश के पास बैठकर बिलखने लगा।
भीड़ में खड़े मुसलमानों में ग़मो-ग़ुस्सा साफ़ दिखने लगा। कई मुसलमान युवकों ने 'हत्यारे जहन्नुम में जाएँ, शहीद को जन्नत नसीब हो' जैसे नारे लगाए। अब हिंदुओं के चेहरों पर तनाव की रेखाएँ नज़र आने लगीं।
अजीब स्थिति हो गई। एक सिर-कटी लाश के दो दावेदार आ गए। भीड़ में लोगों की संवेदनाएँ बँट गईं। आधे लोग हिंदू बुज़ुर्ग से सहानुभूति जताने लगे, आधे मुसलमान बुज़ुर्ग से। पर वह सिर-कटी लाश हिंदू की है या मुसलमान की, यह विकट समस्या ज्यों-की-त्यों बनी रही।
किसी ने इलाक़े के थाने का नम्बर मिलाया। फ़ोन की घंटी लगातार बजती रही पर किसी ने फ़ोन नहीं उठाया। सभी पुलिसवाले प्रदेश के गृह-मंत्री की अगवानी में व्यस्त थे। शहर में शांति-व्यवस्था तो बाद में भी क़ायम की जा सकती थी। मंत्री महोदय की आवभगत और उन्हें सुरक्षा मुहैया कराना ज़्यादा ज़रूरी था। इसलिए पुलिसवालों के पास आम नागरिकों के लिए समय नहीं था। वे वी.आइ.पी. ड्यूटी में लगे थे।

 

अजीब दृश्य था। हिंदू बुज़ुर्ग और मुसलमान बुज़ुर्ग, दोनों ही लाश के पास बैठकर विलाप कर रहे थे। दोनों का ही दावा था कि लाश उनके ही बेटे की थी। विकट समस्या थी। माहौल में तनाव बढ़ रहा था। तभी खूँखार चेहरों वाले कुछ हिंदू युवक और वैसे ही कुछ मुसलमान युवक भीड़ में से आगे आए। उन्होंने आपस में सलाह की और फिर ऐलान
किया कि इस समस्या से निपटने का अब एक ही तरीका था। लाश की पैंट उतार कर उसकी जाँच की जाएगी, तभी पता चलेगा कि लाश हिंदू की है या मुसलमान की।
मातम कर रहे दोनों ही बुज़ुर्गों ने लाश की बेइज़्ज़ती करने की इस बेहूदा बात को मानने से इंकार कर दिया। दोनों ओर की भीड़ में मौजूद कई लोगों ने बुज़ुर्गों की बात से सहमति जताई। पर खूँखार चेहरों वाले वे हिंदू और मुसलमान युवक लोगों की असहमति के बावजूद इस काम को अंजाम देने के लिए आगे बढ़े। दोनों बुज़ुर्ग उन युवकों के सामने बेबस और लाचार नज़र आने लगे। अब यह तय था कि लाश को नंगा किया जाएगा। मरने वाले को भी क्या पता था कि उसकी देह को यह ज़िल्लत झेलनी होगी।
तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी। बुज़ुर्ग हिंदू का बेटा किशोर न जाने कहाँ से भीड़ को चीरता हुआ अपने पिता के पास आ पहुँचा। अपने लाल को जीवित और सही-सलामत देखकर युवक का पिता ख़ुशी से झूम उठा। और उसने अपने बेटे को गले से लगा लिया। "पिताजी, मैं दंगों में फँस गया था। किसी तरह जान बचाकर छिपता हुआ भागा। फिर शहर में कर्फ़्यू लग गया, इसलिए पहले नहीं आ पाया।" किशोर ने अपने पिता को बताया।
भीड़ में से किसी ने शंख फूँक दिया। खूँखार चेहरों वाले हिंदू युवकों ने इस दृश्य को देखकर 'जय श्री राम!' का उद्घोष किया। भीड़ में मौजूद हिंदुओं में हर्ष की लहर दौड़ गई। पता नहीं कबीरदास को यह सब क्या और कितना समझ में आया, पर वह भी ख़ुशी से नाचने-कूदने लगा।
दूसरी ओर सिर-कटी लाश के पास बैठा बुज़ुर्ग मुसलमान अब फूट-फूट कर रोने लगा।" मैं शुरू से कह रहा था कि यह लाश मेरे बेटे नदीम की है। या अल्लाह, जिन हत्यारों ने मुझसे मेरा जवान बेटा छीन लिया है, उन्हें कोढ़ हो जाए। वे दोज़ख़ में जाएँ। " बुज़ुर्ग मुसलमान यह कहकर मातम करने लगा।
तभी एक और हैरान कर देने वाला वाक़या हुआ। बुज़ुर्ग मुसलमान का बेटा नदीम भी न जाने कहाँ से वहाँ आ पहुँचा। उसे सही-सलामत देखकर उसके अब्बा ने उसे गले से लगा लिया।" अब्बा, दंगाइयों से बचते हुए मैंने कहीं पनाह ली। फिर शहर में कर्फ़्यू की वजह से वहीं रुकना पड़ा।" नदीम ने अपने वालिद को बताया।
अब खूँखार चेहरों वाले मुसलमान युवकों ने 'अल्लाह-ओ-अकबर' का नारा बुलंद किया। भीड़ में मौजूद मुसलमानों में भी ख़ुशी की लहर दौड़ गई।
शायद बुज़ुर्ग मुसलमान को ख़ुश देखकर एक बार फिर कबीरदास भी ख़ुशी से नाचने-कूदने लगा। किसी ने कहा, "अरे, देखो-देखो, पागल भी ख़ुशियाँ मनाते हैं!" पर इस सब से बेफ़िक्र कबीरदास नाचने-कूदने में मस्त था।

 

लेकिन मूल समस्या अब भी मौजूद थी। आख़िर वह सिर-कटी लाश किसकी थी? खूँखार चेहरों वाले हिंदू और मुसलमान युवक एक बार फिर आगे बढ़े। उन्होंने लाश की तलाशी ली। क़मीज़ के बाज़ू का बटन खोलकर क़मीज़ ऊपर करने पर उन्हें लाश की दाईं कलाई में 'कड़ा' नज़र आया। क़मीज़ के ऊपरी बटन खोलने पर उन्हें बनियान के ऊपर 'कृपाण' लटकी हुई दिखी। अब दोनों पक्षों को यह बात पता चल गई कि लाश न किसी हिंदू की थी, न मुसलमान की थी, बल्कि यह तो किसी सिख की लाश थी।
भीड़ में मौजूद कुछ लोगों ने आवाज़ लगाई, "अरे, यहाँ कोई सरदार है तो आगे आए और इस लाश को ले जाए।"
पर उस भीड़ में शायद एक भी सिख नहीं था। वहाँ केवल हिंदू थे और मुसलमान थे।
दोबारा पुलिस को फ़ोन लगाया गया, पर सौ नम्बर पर फ़ोन करने पर भी कोई फ़ायदा नहीं हुआ। किसी ने फ़ोन नहीं उठाया। प्रदेश के गृहमंत्री का शहर में आगमन कोई मामूली घटना नहीं थी। समूचा पुलिस बल उन्हें सुरक्षा प्रदान करने और उनकी तीमारदारी में लगा था।

 

तब खूँखार चेहरों वाले हिंदू युवकों ने खूँखार चेहरों वाले मुसलमान युवकों से कहना शुरू किया- "देखो, यह लाश एक सिख की है। सरदार और हिंदू सगे भाइयों की तरह हैं। हम भी अपने मुर्दों को जलाते हैं और सरदार (सिख) भी अपने मुर्दों को जलाते हैं। हमारा-उनका रोटी-बेटी का, नाख़ून और माँस का रिश्ता है। हिंदू अपने बड़े बेटे को
सिख बनाते रहे हैं। चूँकि यहाँ कोई सरदार नहीं है, इसलिए इस लाश पर हमारा हक़ है। इसे हम ले जाते हैं।"
पर खूँखार चेहरों वाले मुसलमान युवकों को इस बात पर एतराज़ था। वे कहने लगे कि मुसलमान और सिख भी भाइयों जैसे ही हैं। उन्होंने दलील दी कि सिखों के पहले गुरु श्री नानक देव जी मक्का-मदीना की यात्रा पर गए थे। सिखों के सबसे पाक धर्म-स्थल श्री हरिमंदिर साहिब का नींव-पत्थर मियाँ मीर जी ने रखा था, जो एक मुसलमान थे। सिखों की पवित्र किताब श्री गुरु ग्रंथ साहिब में मुस्लिम सूफ़ी संत बाबा फ़रीद की 'बाणी' दर्ज़ थी। लिहाज़ा मुसलमानों और सिखों के बीच भी गहरा रिश्ता था।
इसलिए मुसलमान युवकों ने दावा किया कि एक सरदार की उस सिर-कटी लाश पर उनका हक़ था।
एक बार फिर माहौल में तनाव बढ़ने लगा। दोनों पक्ष अपनी-अपनी बात पर अड़ गए। एक ओर भीड़ में से किसी ने कहा- "इतिहास गवाह है कि सिखों और मुसलमानों के आपसी सम्बन्ध कभी अच्छे नहीं रहे।"
दूसरी ओर से जवाब आया- "हिंदुओं और सिखों का भाईचारा हम खूब जानते हैं। 1984 में सिखों के ख़िलाफ़ हुए दंगों में हज़ारों बेक़सूर सिखों के गले में टायर डाल-डाल कर किसने उन्हें ज़िंदा जला दिया था?"
एक पक्ष ने धमकी दी- "इस लाश पर हमारा हक़ है। हम देखते हैं कि तुम यह लाश कैसे ले जा सकते हो।"
दूसरे पक्ष की ओर से भी वैसा ही जवाब आया- "हमने भी चूड़ियाँ नहीं पहन रखी हैं। अगर तुम लोगों ने लाश को हाथ भी लगाया तो अंजाम बहुत बुरा होगा।"
स्थिति विस्फोटक होती जा रही थी। बेचारे मरने वाले को भी क्या पता था कि उसकी लाश को लेकर बाद में इतना बवाल हो जाएगा। दोनों पक्षों की ओर से भड़काऊ नारेबाज़ी होने लगी। हवा में ज़हर घुलने लगा।
तभी अचानक भीड़ में से कूदकर कबीरदास लाश के पास पहुँच गया। उसने दोनों ओर देखा और गम्भीर मुद्रा बनाकर भाषण देने लगा-
"भाइयो! हवा किस धर्म की होती है? धूप का सम्प्रदाय क्या है? नदी के पानी की क्या नस्ल है? आकाश की ज़ात क्या है? परिंदे किस क़ौम के हैं? बादलों का मुल्क़ क्या है? इन्द्रधनुष की बिरादरी तो बताओ, लोगों! सूरज, चाँद और सितारों का मज़हब क्या है ... "

 

चारों ओर सन्नाटा छा गया था। कबीरदास हाथ हिला-हिला कर बोलता जा रहा था। भीड़ में खड़े ज़्यादातर लोग जैसे मंत्रमुग्ध होकर एक 'विक्षिप्त' आदमी को इंसानियत की बात कहते हुए सुन रहे थे। ऐसा लग रहा था, जैसे मध्यकाल के संत कबीरदास की आत्मा हमारे इस कबीरदास में प्रवेश कर गई थी। 'पागल' कबीरदास संतों, महात्माओं और दरवेशों की वाणी बोल रहा था। काश, वक़्त यहीं थम जाता। पर ऐसा नहीं हुआ। 30 जनवरी, 1948 की सुबह भी यही हुआ था।
अचानक धाँय की आवाज़ के साथ गोली चली। पता नहीं, गोली इधर वालों ने चलाई या उधर वालों ने। पर दूसरे ही पल कबीरदास उस
सिर-कटी लाश के पास ज़मीन पर पड़ा तड़पता नज़र आया। लगा जैसे भयंकर आँधी-तूफ़ान में किसी छायादार पेड़ पर बिजली गिर गई हो। देखते-ही-देखते
दोनों ओर की भीड़ में मौजूद दरिंदों के हाथों में बम, देसी कट्टे और तलवारें निकल आईं। 'जय श्री राम' और 'अल्लाह-ओ-अकबर' के नारों के बीच दंगे-फ़साद शुरू हो गए। चारों ओर चीख़-पुकार मच गई ज़मीन पर लाशों के ढेर लगने लगे।
इस पूरे कांड के दौरान वहाँ एक भी पुलिसवाला नज़र नहीं आया। अलबत्ता इलाक़े के कुत्ते ज़रूर एकजुट होकर दंगाइयों पर भौंक रहे थे। वे बिना किसी भेदभाव के हिंदू दंगाइयों और मुसलमान दंगाइयों दोनों पर ही समान भाव से भौंक रहे थे। वे एक-दूसरे को नहीं नोच रहे थे जबकि इंसान हैवानियत पर उतारू थे। ईश्वर की रचना स्वयं को खुद ही नष्ट कर रही थी। अल्लाह के बंदे अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे थे। दीवारों पर लिखे 'जय गुरुदेव, सतयुग आएगा' जैसे नारों पर ख़ून के छींटे पड़ रहे थे।

 

बाद में जब पुलिस घटनास्थल पर पहुँची तो वहाँ इंसानियत लहुलुहान पड़ी थी। चारों ओर लाशों का ढेर लगा था। बुरी तरह घायल लोगों की कराहों और चीत्कारों से माहौल ग़मगीन हो गया था। बाक़ी लाशों के बीच ही किशोर और नदीम की खुली आँखों वाली लाशें जैसे स्तब्ध पड़ी हुई थीं।
सरदार की सिर-कटी लाश के पास ही कबीरदास अंतिम साँसें ले रहा था। बाद में एक पुलिसवाले ने किसी अख़बार के संवाददाता को बताया कि लाशों के बीच पड़े एक बूढ़े भिखारी के सीने में बाईं ओर, जहाँ इंसान का दिल धड़कता है, ठीक उसी जगह गोली लगी हुई थी। जब पुलिसवाले उसे उठाकर एम्बुलेंस में डालने लगे, उस समय तक शायद उसमें थोड़ी जान बची हुई थी। उस पुलिसवाले ने बताया कि नाम पूछे जाने पर उस बूढ़े भिखारी ने अस्फुट स्वर में शायद ऐसा कुछ या इससे मिलता-जुलता कुछ कहा-

 

अव्वल अल्लाह नूर उपाया
क़ुदरत के सब बंदे,
एक नूर से सब जग उपज्या
कौण भले , कौण मंदे

 

इतना कह कर उस बूढ़े भिखारी ने दम तोड़ दिया। उस पुलिसवाले ने अख़बार के रिपोर्टर को यह भी बताया उसका हुलिया देखकर पुलिसवालों ने यही समझा कि कोई पागल भिखारी दंगों की चपेट में आ गया था। पुलिस ने पूरे इलाक़े में दोबारा अनिश्चितकालीन कर्फ़्यू लगा दिया। दंगाइयों को देखते ही गोली मार देने के आदेश दे दिए गए।

मामाजी बताते हैं कि उस दिन कबीरदास की लाश के पास पुलिसवालों को एक पोटली भी मिली, जिसमें साम्प्रदायिक सद्भाव पर कुछ लेख थे और महात्मा गाँधी की कुछ तस्वीरें थीं। इन्हीं तस्वीरों के साथ एक औरत और दो छोटे बच्चों की फ़ोटो भी थी। मामाजी का कहना है कि ये फ़ोटो शायद कबीरदास की पत्नी और उसके बच्चों की थी, जो बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद हुए दंगों में मारे गए थे। कबीरदास इसीलिए इस पोटली को अपने सीने से चिपकाए रहता था।
उस दिन जगह-जगह हुए साम्प्रदायिक पागलपन में दर्जनों लोग मारे गए, दर्जनों औरतें विधवा हो गईं, दर्जनों बच्चे अनाथ हो गए। सरकार ने एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया, जिसे तीन महीने में अपनी रिपोर्ट देने के लिए कहा गया। पर एक साल बीत जाने और तीन बार कार्यकाल बढ़ाए जाने के बाद भी आयोग की रिपोर्ट आनी अभी बाक़ी है।
पर प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं कि उस रात एक और अजीब घटना हुई थी। आगरा, राँची, शाहदरा (दिल्ली) समेत देश के तमाम पागलखानों के अधिकांश पागल उस रात बेचैन होकर न जाने क्यों घंटों तक रोते रहे थे। जैसे उनका कोई सगा मर गया हो! पागलों का यह सामूहिक विलाप मीलों तक सुना गया था और इसे सुनकर पत्थर-दिल लोगों के भी दिल दहल गए थे।
 डॉक्टर और समाजशास्त्री अब तक इस विचित्र घटना का कोई तर्क-संगत कारण ढूँढ़ने में लगे हैं। हालाँकि सरकार ऐसी किसी घटना से साफ़ इंकार करती है। उसका कहना है कि यह सब शरारती तत्वों द्वारा फैलाई गई अफ़वाहें हैं।
पर असली बात आपको बताना तो मैं भूल ही गया। रामपुरा शरीफ़ के लोगों का दावा है कि उन्होंने अक्सर इलाक़े में आधी रात के समय कबीरदास के भूत को भटकते हुए देखा है। इलाक़े के लोगों का यह दृढ़ विश्वास है कि कई बार आधी रात के समय जब चाँद बादलों में छिप जाता है, जब हवा चलनी बिल्कुल बंद हो जाती है, जब रोते हुए कुत्ते अचानक सहमकर चुप हो जाते हैं, जब माँएँ नींद में डर गए बच्चों को अपने सीने से चिपका लेती हैं, तब घटनास्थल के पास मैले-कुचैले चिथड़े पहने, बिखरे बाल और लाल
आँखों वाला कबीरदास का भूत एक हाथ में अपनी पोटली थामे, उसी अन्दाज़ में अपना दूसरा हाथ हिला-हिला कर वही ऐतिहासिक भाषण देता है, जो वह उस दिन दे
रहा था-
"भाइयो! हवा किस धर्म की होती है? धूप का सम्प्रदाय क्या है? नदी के पानी की क्या नस्ल है? आकाश की ज़ात क्या है? परिंदे किस क़ौम के होते हैं? बादलों का मुल्क क्या है? इन्द्रधनुष की बिरादरी तो बताओ, लोगों।
सूरज, चाँद और सितारों का मज़हब क्या है ..."
इलाक़े के लोगों का कहना है कि खिड़की-दरवाज़े बंद कर लेने के बाद भी कबीरदास की गम्भीर और भारी आवाज़ झिर्रियों में से  प्रवेश करके इलाक़े के घरों में देर तक गूँजती रहती है। यदि आपको मेरी बातों पर यक़ीन नहीं आता तो कबीरदास के इलाक़े रामपुरा शरीफ़ में आपका स्वागत है।


- सुशांत सुप्रिय