हस्ताक्षर रचना
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अप्रैल 2017
अंक -41

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

फिल्म समीक्षा

बजरंगी भाईजान: फ़िल्म समीक्षा

 



यदि मनोरंजन के मसाले में मुद्दा मिला दिया जाता है। तो स्वाद बदलता है और फिल्म का प्रभाव भी बदलता है। मनोरंजन के साथ मुद्दे को मिलाकर कबीर खान ने
बहुत चालाकी से सलमान की छवि का इस्तेमाल किया है। और अपनी बात सरल तरीके से कह दी है। इस सरलता में तर्क डूब जाता है। तर्क क्यों खोजें? आम आदमी की
जिंदगी भी तो एक ही नियम से नहीं चलती। ‘बजरंगी भाईजान’ बड़े सहज तरीके से भारतीय और पाकिस्तानी समाज में सालों से जमी गलतफहमी की काई को खुरच देती है। पॉपुलर कल्चर में इससे अधिक की उम्मीद करना उचित नहीं है। सिनेमा समाज को प्रभावित जरूर करता है, लेकिन दुष्प्रभाव ही ज्यादा दिखते हैं। सद्प्रभाव होता है तो ‘बजरंगी भाईजान’ का स्पष्ट संदेश है कि दोनों देशों की जनता नेकदिल और मानवीय हैं।


पवन कुमार चतुर्वेदी उर्फ बजरंगी मध्यवर्गीय हिंदू परिवार में पला भोंदू किस्म का लड़का है। हां, उसकी खासियत है वह बजरंग बली का भक्त है और सच्चा एवं ईमानदार लड़का है। जो पढ़ाई से लेकर तो हर मामले में जीरो है। लगातार फेल होने वाला पवन जब पास हो जाता है तो उसके पिता सदमे से ही मर जाते हैं। बजरंगबली का वह भक्त है। बजरंग बली का मुखौटा लगाए कोई जा रहा हो तो उसमें भी पवन को भगवान नजर आते हैं।
उसके पिता कुछ कमाने के उद्देश्य से उसे दिल्ली जाने की सलाह देते हैं। दिल्ली पहुंचने पर पवन की मुलाकात रसिका से होती है। दोनों के बीच स्वाभाविक प्रेम होता है। इस बीच एक गूंगी बच्ची भी उसके जीवन में आ जाती है। भटकी लड़की को उसके मां-बाप से मिलाने की कोशिश में बजरंगी गहरे फंसता जाता है। कहानी आगे बढ़ती है और पता चलता है कि बच्ची तो पाकिस्तान की है। कई बार तर्क और कारण पर ध्यान नहीं दिया जाता। शायद लेखक-निर्देशक जल्दी से अपने ध्येय तक पहुंचना चाहते थे। वे दर्शकों को भावनात्मक रूप से झकझोरना चाहते हैं। जिसमें काफ़ी हद तक वे सफल भी हुए हैं। इसमें उनकी सहायता पाकिस्तानी टीवी रिपोर्टर चांद करता
है। फिल्म जब खत्म होती है तो सभी की आंखें नम होती हैं। गूंगी बच्ची जिसे पवन मुन्नी कहता है और जो अपने मां-बाप की शाहिदा है, उसकी अंतिम पुकार दर्शकों को हिला देती है।


‘बजरंगी भाईजान’ हिंदी सिनेमा के इतिहास की उन चंद फिल्मों में से एक होगी, जिसमें पाकिस्तान को दुश्मन देश के तौर पर नहीं दिखाया गया है। देशभक्ति के नाम पर गालियां नहीं दी गई हैं। इसमें उन धारणाओं के प्रसंग हैं, जिनसे गलतफहमियां जाहिर होती हैं। दोनों देशों के शासकों और राजनीतिक शक्तियों ने इस वैमनस्य को बढ़ाया है। ‘बजरंगी भाईजान’ मानवीय और सौहार्दपूर्ण तरीके से उन धारणाओं को छेड़ती है। गलतफहमियां दोनों तरफ से हैं। भारत में रहते हुए हम अपनी कमियों से परिचित होते हैं और पाकिस्तान पहुंचने पर वहां मौजूद गलतफमियों से रूबरू होते हैं। पवन की तरह ही भोंदू टीवी रिपोर्टर की इंसानियत जागती है। बजरंगी में भाईजान लफ्ज जुड़ता है और हम देखते हैं कि कैसे दिल पिघलते हैं। सरहद पर खिंची कंटीली तारों के बीच बने फाटक के दरवाजे खुलते हें। ‘बजरंगी भाईजान’ दोनों देशों को करीब लाने का नेक प्रयास करती है।
 

कलाकारों में हर्षाली मल्होत्रा अपनी मासूमियत से दिल जीत लेती है। वह गूंगी है, लेकिन आंखें और चेहरे से प्रेम का इजहार करती है। नवाजुद्दीन सिद्दीकी की मौजूदगी फिल्म को आगे बढ़ाने के साथ रोचक भी बनाती है। वे दर्शकों को मोह लेते हैं। उनके किरदार और अभिनय में सादगी है। सलमान खान का किरदार इतना सरल और
प्रभावशाली है कि वह दर्शकों को अपने साथ लिए चलता है। बात खूबियों की करें तो फिल्म दूसरे भाग में काफी मजबूती से पर्दे पर आती हैं। दूसरे भाग में एंटरटेनमेंट भी ज़्यादा है और भावुक सीन्स भी। नवाज़ुद्दीन के आते ही फिल्म में 
एंटरटेनमेंट का तड़का लग जाता है। सलमान अपने भोले-भाले किरदार में सफल दिखे। शाहिदा के किरदार में हर्षाली आपका दिल जीत लेंगी। धर्म और दोनों देशों की सोच पर भी बढ़िया तंज़ है। करीना का क़िरदार सादा और सहज है। फिल्म के गाने ठीक हैं पर 'सेल्फ़ी ले ले' और 'भर दे झोली' के अलावा कोई और गाना आपकी ज़ुबान पर शायद न टिके। फिल्म का स्क्रीनप्ले कसा हुआ है और निर्देशन पर भी अच्छी पकड़ है।


भारत-पाकिस्तान के खट्टे-मीठे रिश्तों ने हमेशा ही फिल्मकारों को आकर्षित किया है। गदर जैसी फिल्मों में खट्टापन ज्यादा था तो 'बजरंगी भाईजान' में इन पड़ोसी
देशों के बारे में मिठास ज्यादा मिलती है। गदर में अपनी पत्नी को लेने के लिए सनी देओल पाकिस्तान में जा खड़े हुए और पूरी फौज को उन्होंने पछाड़ दिया था। बजरंगी भाईजान में पाकिस्तानी से आई बालिका को छोड़ने सलमान खान भारत से वहां जा पहुंचते हैं जहां उन्हें कई मददगार लोग मिलते हैं। उनके व्यवहार से महसूस होता है कि दोनों देश के आम इंसान अमन, चैन और शांति चाहते हैं, लेकिन राजनीतिक स्तर पर दीवारें खड़ी कर दी गई हैं और कुछ लोग इस दीवार को ऊंची करने में लगे रहते हैं।
तो कुल मिलाकर सीधी,सरल फ़िल्म है 'बजरंगी भाईजान', जो आपको हंसाएगी भी, पर फ़िल्म में तर्क न ढूंढें तो बेहतर होगा। बजरंगी भाईजान को कमर्शियल फॉर्मेट में बनाया गया है और हर दर्शक वर्ग को खुश किया गया है। हिंदू-मुस्लिम, भारत-पाक, इमोशन, रोमांस, कॉमेडी बिलकुल सही मात्रा में हैं और यह फिल्म इस बात की मिसाल है कि कमर्शियल और मनोरंजक सिनेमा कैसा बनाया जाना चाहिए। दर्शक सिनेमा हॉल से बाहर आता है तो उसे महसूस होता है कि उसका पैसा वसूल हो गया है।


विजयेन्द्र प्रसाद ने बेहतरीन कहानी लिखी है जिसमें सभी दर्शक वर्ग को खुश करने वाले सारे तत्व मौजूद हैं। फिल्म का स्क्रीनप्ले भी उम्दा लिखा गया है और पहले दृश्य से ही फिल्म दर्शकों की नब्ज पकड़ लेती है। शुरुआती दृश्यों में ही मुन्नी अपनी मां से बिछड़ जाती है और दर्शकों की हमदर्दी मुन्नी के साथ हो जाती है मुन्नी का राज खुलने वाले दृश्य जिसमें पता चलता है कि वह पाकिस्तान से है, बेहतरीन बन पड़ा है। वह पाकिस्तान की क्रिकेट में जीत पर खुशी मनाती है और बाकी लोग उसे देखते रह जाते हैं। इसी तरह मुन्नी का चुपचाप से पड़ोसी के घर जाकर चिकन खाना, मस्जिद जाना, उसको एक एजेंट द्वारा कोठे पर बेचने वाले सीन तालियों और सीटियों के हकदार हैं।

पाकिस्तान में पवन को पुलिस, फौज और सरकारी अधिकारी परेशान करते हैं, लेकिन आम लोग जैसे चांद (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) और मौलाना (ओम पुरी) उसके लिए मददगार साबित होते हैं। एक बार फिर कुछ बेहतरीन दृश्य देखने को मिलते हैं। फिल्म के क्लाइमैक्स में भले हीे सिनेमा के नाम पर छूट ले ली गई हो, लेकिन यह इमोशन से भरपूर है। भारत-पाक दोनों ओर की जनता का पवन को पूरा समर्थन मिलता है और उसे एक सही मायने में हीरो की तरह पेश किया गया है। एक ऐसा हीरो जिसे आम
दर्शक बार-बार रुपहले परदे पर देखना चाहता है। गूंगी मुन्नी की फिल्म के अंत में बोलने लगने लगती है, भले ही यह बात तार्किक रूप से सही नहीं लगे, लेकिन यह सिनेमा का जादू है कि देखते समय यह दृश्य बहुत अच्छा लगता है।


निर्देशक कबीर खान ने फिल्म को बेहद संतुलित रखा है। उन्हें पता है कि कई लोग इसे हिंदू या मुस्लिम के चश्मे से देखेंगे, लिहाजा उन्होंने कहानी को इस तरह से प्रस्तुत किया है कि किसी को भी आवाज उठाने का मौका नहीं मिले। उन्होंने फिल्म को उपदेशात्मक होने से बचाए रखा तर्क की बात की जाए तो कई प्रश्न ऐसे हैं जो दिमाग में उठते हैं। जैसे क्या बिना वीजा के लिए गैर-कानूनी तरीके से किसी देश में घुसना ठीक है? सीमा पार करते ही पवन को पाकिस्तानी फौजी पकड़ लेते हैं और फिर छोड़ देते हैं, क्यों? मुन्नी की मां अपनी बेटी को ढूंढने की कोशिश क्यों नहीं करती?


अव्वल तो ये कि फिल्म में इमोशन और मनोरंजन का बहाव इतना ज्यादा है कि आप इस तरह के सवालों को इग्नोर कर देते हैं। वहीं इशारों-इशारों में इनके जवाब भी
मिलते हैं। पाकिस्तानी फौजी सोचते हैं कि इस आदमी की स्थिति ‍इतनी विकट है कि कानूनी रूप से वे चाहे तो कभी भी मदद नहीं कर सकते, लेकिन इंसानियत के नाते तो कर ही सकते हैं। धर्म और कानून से भी बढ़कर इंसानियत होती है। शायद इसीलिए अंत में पाकिस्तानी सैनिक, पवन को रोकते नहीं हैं और बॉर्डर पार कर भारत जाने देते हैं। सलमान खान की मासूमियत जो पिछले कुछ वर्षों से खो गई थी वो इस फिल्म से लौट आई है। उन्होंने अपने किरदार को बिलकुल ठीक पकड़ा है और उसे ठीक से पेश किया है। वे एक ऐसे हीरो लगे हैं जिसके पास हर समस्या का हल है।


हर्षाली मल्होत्रा इस फिल्म की जान है। उसकी भोली मुस्कुराहट, मासूमियत, खूबसूरती कमाल की है। हर्षाली ने इतना अच्छा अभिनय किया है कि वह सभी पर भारी
पड़ी है। उसके भोलेपन से एक पाकिस्तान का घोर विरोधी किरदार (जो कहता है कि यह उस देश की है जो हमारे लोगों को मारते हैं) भी प्रभावित हो जाता है। संगीत और संवाद के मामले में फिल्म कमजोर है। 'सेल्फी ले ले रे' खास नहीं है। चिकन सांग की फिल्म में जरूरत ही नहीं थी और यह गाना नहीं भी होता तो कोई फर्क नहीं पड़ता। 'भर दो झोली' जरूर अच्छा है और 'तू जो मिला' का फिल्म में अच्छा उपयोग किया गया है।

'बजरंगी भाईजान' की सच्चाई और मुन्नी की मासूमियत दिल को छूती है। 'बजरंगी भाईजान' की शुरुआत कश्मीर की बर्फीली वादियों से होती है, वहीं 2 घंटे 43 मिनट
बाद वह बर्फ आंखों की कोर में पिघलती महसूस होती है। बीते छह वर्षों में यह पहला मौका है, जब‍ सलमान की फिल्मों ने मनोरंजन करने के साथ ही दर्शकों खासकर
उनके फैंस को रूलाया है। यूं तो भावुकता का पाठ 'किक' में भी पढ़ाया गया था, लेकिन तब 'डेविल का हैंगओवर' ज्यादा था।


यह फिल्म 2009 के बाद से सलमान खान और उनकी फिल्मों को लेकर बने तमाम पूर्वाग्रहों को तोड़ती है। फिल्म की कहानी स्वीट और सिंपल है, जिसमें मारधाड़ और करिश्माई स्टंट्स की कोई गुंजाइश नहीं थी। यह अच्छा है कि न तो कबीर खान और न ही सलमान ने ऐसा कोई रिस्क ही उठाया। ऐसे में लंबे अरसे बाद अपने हीरो को एक संजीदा किरदार में देखकर अच्छा लगता है।  उससे भी अधि‍क खुशी तब होती है, जब अब तक सलमान के धुर विरोधी रहे आलोचक दबे हुए शब्दों में ही सही फिल्म की सफलता और इसमें सलमान की सराहना करते हैं।
शाहिदा/मुन्नी के किरदार में हर्षाली फिल्म की जान है। वह वाकई फिल्म की ट्रम्प कार्ड है। बिना कुछ बोले हुए भी हर फ्रेम में उसकी मासूमियत सब पर भारी पड़ती है
करीना के हिस्से ज्यादा कुछ नहीं है, लेकिन वह भी सुंदर लगी हैं। फिल्म में हर पहर के लिए एक गीत है। सलमान की एंट्री से लेकर दरगाह पर इबादत और रास्तों की मशक्कत तक, हर समय कोई न कोई गीत चलता रहता है। ...क्योंकि सबकुछ सिनेमा नहीं होता इसलिए फिल्म में कुछ सीन ऐसे भी हैं जो गले नहीं उतरते मसलन,अंतिम सीन में लोगों द्वारा सीमा पर लटके ताले को तोड़ना और नैतिक बनकर अपनी-अपनी सीमा में ही खड़े रहना। पाकिस्तानी सेना का व्यावहारिक अंदाज से इतर आवाम और सरकार के सामने सरेंडर करना या फिर शुरुआती सीन में शाहिदा का ट्रेन से उतरना, लेकिन ऐन मौके पर ट्रेन की सुरक्षा में पहरा दे रहे घुड़सवार दल का गायब हो जाना।


खैर इतना चलता है क्योंकि सबकुछ असल जैसा हो तो वो सिनेमा कैसे कहलाएगा और फिर मनोरंजन भी एक बात होती है। लेकिन यह भी सच है कि जिंदगी सिनेमा नहीं। यह फिल्म  पाकिस्तान में भी रिलीज हुई है। सरहद से लेकर सियासत तक पाकिस्तान की सेना और सरकार से कोई उम्मीद पालना अब बेमानी सा हो गया है, ऐसे में उम्मीद यह है कि कम से कम सरहद पार हमारे भाइयों को भी 'बजरंगी भाईजान' भावनात्मक डोर में बांधेगी और वो भी शाहिदा, पवन कुमार चतुर्वेदी और चांद मुहम्मद के बहाने पल रहे सियासी तानाबाना से इत्तफाक रखेंगे क्योंकि दोनों मुल्कों के रिश्तों में कभी तो सुबह आएगी...

भाईजान में हम एक अलग ही सलमान खान को देखते हैं जिन्हें इससे पहले हमने स्क्रीन पर नहीं देखा है। यहां उनकी चाल में वो अकड़ नहीं है, न उनकी सिग्नेचर पंचलाइन हैं और न ही वो एक बार भी अपनी शर्ट फाड़ते हैं। अपनी लार्जर देन लाइफ एक्शन हीरो की छवि को अलविदा कहते हुए इस सरहद पार कहानी में सलमान खान शांति और अमन की छवि पेश करते हैं। जिसका नतीजा ये है कि पिछले कुछ साल में ये सलमान खान की शायद सबसे तार्किक फिल्म है।


- तेजस पूनिया