प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अप्रैल 2017
अंक -38

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

व्यंग्य

व्यंग्य लेख- अब मैं निश्चिंत हूँ

(सादर समर्पित अपने उस खास मित्र के झूठ के श्री चरणों में, जो हर किस्म का झूठ बिना किसी लाग लपेट के पूरी ईमानदारी, निष्ठा से बोलता रहा है।)

ज़िंदगी भर गधे की तरह दौड़ते हुए घुटनों में दर्द हो जाने तक मैंने और कुछ नोट किया हो या न, पर एक बात ज़रूर नोट की कि ज़िंदगी में किसी चीज की हमें ज़रूरत पड़े या न पर झूठ बोलने की ज़रूरत हर डेढ़ कदम बाद पड़ती है। और तब भगवान को हाजिर-नाजिर मान पैदा होने से पहले सच की कसम खाने के बाद भी सच को गले से पकड़ जेब में डाल, झूठ बोलना ही पड़ता है। सफेद झूठ बोलते हैं वे, जो ये शेखी बघारते हैं कि वे ज़िंदगी में सबकुछ बोलते हैं, पर अपनी लाइफ़ में झूठ नहीं बोलते।

अपन से जब तक झूठ बोला गया मैंने झूठ बोलने के लिए किसी की सहायता नहीं ली। वैसे एक बात कहूं, सच कहने के लिए किसी की सहायता लेने की ज़रूरत पड़ती भी नहीं। अकेले ही सच कहा जा सकता है। यह दूसरी बात है कि दूसरा उसे सिरे से ख़ारिज कर दे, तो कर दे और आप सच का तो सच आपका लटका मुँह देखता भर रह जाए।

उस रोज़ भी मैं रोज़ की तरह पूरे दम-खम के साथ रब्ब से झूठ बोल रहा था कि अचानक मेरे झूठ को पता नहीं क्या हुआ कि वह बेहोश होकर ज्यों औंधे मुँह  गिर पड़ा। तब पता नहीं कौन भगवान का प्यारा मेरे झूठ को बेहोशी की हालत में अस्पताल ले आया। भगवान उस देवता का भला करे। जब मेरे झूठ को होश आया तो वह अस्पताल में डाॅक्टर के सामने लेटा था। पसीने से तर-बतर।


डाॅक्टर ने मेरे झूठ को झूठा इंजेक्शन लगाने के पाँच मिनट बाद मेरे झूठ की आंखों में आंखें डाल सस्नेह पूछा, "अब कैसा फील कर रहे हो डियर?"
"अब कुछ-कुछ ठीक लग रहा है सर! पर मुझे हुआ क्या था डाॅक्टर साहब? पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ मेरे साथ?" मेरे झूठ ने अपने सूखे होंठों पर जीभ फेरते हुए पूछा।
"होना क्या, तुम्हें झूठ बोलते-बोलते अब कमजोरी आ गई है या कि उम्र का तकाज़ा कह लीजिए इसे।"
"पर डाॅक्टर साहब..... मैं तो झूठ को ताकतवर बनाए रखने वाले सारे टाॅनिक समय पर रेग्युलर लेता रहा हूँ!"
"सच वाले कैप्सूल भी ले लिया करो कभी-कभी। लगातार झूठ की सेहत की ओर ही ध्यान देने से दिमाग का बैलेंस बिगड़ जाता है अक्सर। वैसे एक उम्र के बाद टाॅनिक भी बेअसर हो जाया करते हैं डियर। पर चिंता की कोई बात नहीं।"
"पर???" डाॅक्टर के साथ होने पर भी झूठ परेशान हो उठा तो डाॅक्टर साहब ने उसकी परेशानी को भांप कहा, "कोई बात नहीं। ये विटामिन लिख रहा हूँ। झूठ को ताकत देने में अच्छा रिस्पांस है इनका। जिसने भी खाए उनका झूठ समाज में सरपट दौड़ रहा है, भले ही उनकी टांगें जवाब दे गईं हों। पर मेरी हिदायत है कि अब झूठ बोलने के लिए बीच में जब हैल्प की जरूरत पड़े तो किसी की भी हैल्प ले लिया कीजिए। इसमें शर्म की कोई बात नहीं होती। झूठ के लिए अच्छा रहेगा। जब जिंदगी में झूठ के बिना गुजारा नहीं तो झूठ के लिए सहारा लेने से शरमाना क्या? साॅरी अगर मैं आपकी इगो को हर्ट कर गया हूँ तो। एक डाॅक्टर के नाते मेरी भी कुछ सोशल रिसपांसिबिलिटिज हैं। न चाहते हुए भी निभानी पड़ती हैं। बाकि मानना, न मानना तो पेशेंट के इगो पर डिपेंड करता है।"

और उस दिन मैंने एक बात गांठ बांध ली कि और मसले पर किसी की सहायता लूंगा या नहीं, पर जब झूठ लड़खड़ाने लगे तो गधे की सहायता लेने से भी हिचकिचाऊंगा, क्योंकि झूठ है तो लूट है।


और अचानक मुझे कल झूठ बोलते-बोलते लगा कि मेरा झूठ चक्कर-सा खा रहा है, तो मैंने तत्काल पास खड़े से निसंकोच सहायता लेने के इरादे से पूछा, "भाई साहब! मुझे अपने झूठ के लिए आपके सहारे की सख्त ज़रूरत है इस वक्त। हैल्प मी प्लीज!" इससे पहले कि मेरे सहायता मांगने का वाक्य पूरा होता, उन्होंने मेरे झूठ को पूरी सपोर्ट देते कहा, "कहो बादशाहो! अपने झूठ को किस टाइप की हैल्प चाहते हो? एक सौ आठ को फोन करूं क्या??"
"नहीं! पर तुम गिरते झूठ को ठीक से सहारा दे लेते हो क्या?" शक-सा हुआ। तो मेरे पूछने पर वे बिगड़ते बोले, "हद है साहब! झूठ न बोलने वाले होते तो क्या आपके गिरते झूठ को गिरते देख सहारा देने आगे आते क्या? झूठ-झूठ मौसरे नहीं, सगे भाई जो ठहरे। हम सबकुछ गिरते देख सकते हैं, पर झूठ को बिलकुल नहीं। रही बात हमारी सो,  हम तो पैदाइशी झूठे हैं साहब! झूठ इस तरह बोलते हैं कि सच तो सच, झूठ भी हमारा मुँह ताकता रह जाता है कि बंदा बोल गया तो क्या बोल गया? अब आप पूछ ही रहे हो तो....अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना मेरी आदत तो नहीं, जब बात अपने झूठ की प्रतिष्ठा की हो तो बता दूँ कि अब तो मेरे झूठ पर मेरा सच भी आंखें मूंदे विश्वास करता है।"
‘तो इस वक्त मेरे चक्कराते झूठ को तुम्हारे झूठ के सहारे की सख्त जरूरत आन पड़ी है बंधु!’
‘ तो बंदा हाजिर है 
 बादशाहो! सोच लो मुझे भगवान ने तुम्हारे गिरते झूठ को सहारा देने ही मुझे यहां भेजा है । हरेक के गिरते तड़पते झूठ को हंसते-हंसते सहारा देना अपना धर्म है बादशाहो! उसे नरक मिले जो जीते जी अपने इस धर्म से फिरे ,’ बेहद अपनेपन से कह बंदे ने बड़े प्यार से मेरे चक्कराए झूठ का सिर पकड़ा तो मैंने तो मैंने, मेरे गिरते- पड़ते झूठ ने मुझसे भी अधिक राहत की सांस ली।


‘ माफ करना डियर ! न चाहते हुए भी पूछना पड़ रहा है, तुम कितना झूठ बोल सकते हो??’ सोचा, सहायता लेने से पहले बंदे का स्तर तो एकबार चैक कर लूं। ऐसा न हो कि अपने गिरते झूठ को इसका सहारा लेने की उम्मीद में इसके झूठ को ही सहारा न देना पड़ जाए कहीं।
‘ मेरा झूठ झूठ की किसी भी हद तक जा सकता है सर! मैंने आज तक निssसंकोच बेलौंस झूठ बोलकर बंदे तो बंदे, भगवान तक का मजे से उल्लू बनाया है। हर डिग्री का झूठ बोलने का लाइसेंस है अपुन के पास। क्या मजाल जो आज तक मेरे झूठ पर किसी को कोई शिकायत हुई हो। आपत्तियां हुईं हों तो होती रहें। समाज में आपत्तियों को पूछता ही कौन है? पचास साल का सफल झूठ बोलने का अनुभव है मेरे पास। प्रमाणपत्र बताऊं क्या.....?? ’
‘ नहीं! नहीं! मैंने तो बस यों ही पूछ लिया था मित्र! तुम्हारे हिम्मत से कहने का स्टाइल ही इस बात का सबूत है कि तुम झूठ के मामले में पहुंचे हुए सिद्ध हो, निष्णात हो, पारंगत हो.... ’ उस वक्त मैं बंदे के चेहरे पर आए झूठ के नूर को देख सहम सा गया । बंदे के चेहरे पर क्या खतरनाक तेज! सच कहूं उस वक्त मेरी आंखें चौंधियाने लगीं तो मैंने झूठ से अपनी आंखों पर जेब से निकाल काला चश्मा  लगा लिया।
तब पहली बार फील हुआ कि मुझे आज झूठ का हाड़ मांस का बंदा नहीं, झूठ का खुदा मिल गया दोस्तो। अब मेरा झूठ कहीं भी, कभी भी नहीं गिर सकता। हारा तो वह खैर किसी से नहीं आजतक। पर अब मैं अपने डियर के झूठ की बिना शर्त मिलने वाली सपोर्ट को लेकर पूरी तरह निश्चिन्त हूं।


- अशोक गौतम
 
रचनाकार परिचय
अशोक गौतम

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