प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अप्रैल 2017
अंक -51

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव

ग़ज़ल-

तग़ाफ़ुल पे तग़ाफ़ुल क्या हुआ है
सुलगती रूह को धोका हुआ है

यही है सब्र की बस एक सूरत
यक़ीनन जो हुआ, अच्छा हुआ है

अँधेरे दूर हैं मेरे ही दम से
उजाला आँखों में ठहरा हुआ है

हिक़ारत से उसे क्यूँ देखते हो
वो पत्ता शाख से टूटा हुआ है

नई ईजाद कर धोके की सूरत
ये चेहरा तो मेरा देखा हुआ है


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ग़ज़ल-

चोट फिर दिल पे कोई खाएँ क्या
"आजमाए को आजमाएँ क्या"

देखकर इन अँधेरी रातों को
दर्द कहते हैं झिलमिलाएँ क्या

सब्र के इम्तिहान बोल उठे
ज़िंदगी तुझसे हार जाएँ क्या

जिनमें सबकुछ है उल्फ़तों के सिवा
ऐसे रिश्ते भी अब निभाएँ क्या

ग़म के मारों की आह रोशन है
ग़म के मारों पे मुस्कुराएँ क्या

दिल तो हर आदमी का नाज़ुक है
दिल को दिल का ही डर दिखाएँ क्या

दिल की बुनियाद कुछ नहीं है 'ज़हीन'
दिल की हालत तुझे बताएँ क्या


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ग़ज़ल-

बड़े सलीक़े से हाथों में हाथ छोड़ गया
चला गया वो मगर अपनी बात छोड़ गया

वो ख़ुशबुओं-सी अजब कायनात छोड़ गया
हसीन यादों की महकी हयात छोड़ गया

मैं जिसके वास्ते ख़ुशियों की भीड़ लाया था
दुखों की भीड़ में वो मेरा साथ छोड़ गया

तेरी मिसाल ज़माने में मिल नहीं सकती
नहीं वो बात कहीं तू जो बात छोड़ गया

ज़रा-सी नींद का लम्हा भी रूठकर मुझसे
सुलगते ख़्वाबों के हिस्से में रात छोड़ गया

वो एक शख्स जो बंदा भी था, रसूल भी था
हमारे वास्ते राहे-निजात छोड़ गया

रसूल- पैगम्बर, पैगाम देने वाला
राहे निजात- रिहाई का रास्ता


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ग़ज़ल-

अँधेरी रात का नक्शा बदलने वाला है
ज़रा-सी देर में सूरज निकलने वाला है

उसी को देख के पानी उबलने वाला है
जो तिश्नगी का समन्दर निगलने वाला है

ज़माना यूँ ही मुख़ालिफ़ नहीं हुआ उसके
वो मेरे साथ बहुत दूर चलने वाला है

ख़ुदा का शुक्र मोहब्बत ने राज़ खोल दिया
किसे पता था कि दिल घर बदलने वाला है

हसीन ख़्वाब कोई चुन के नींद ले आई
उदास आँखों का मंज़र बदलने वाला है


- ज़हीन बीकानेरी
 
रचनाकार परिचय
ज़हीन बीकानेरी

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ग़ज़ल-गाँव (1)