प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2015
अंक -44

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

विदेशों में संस्कृत की प्रचारक श्रीमती कमलारत्नम्: अरुण कुमार निषाद

आधुनिक संस्कृत की विदुषियों में श्रीमती कमलारत्नम् का नाम बङे ही आदर के साथ लिया जाता है। आपका जन्म सन् १९१४ ई. को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद शहर में हुआ
।१ आपके सहयोग से विदेशों में कालिदास और रामायण का बहुतायत प्रचार-प्रसार हुआ। आपने १९३७ ई. में एम.ए. की परीक्षा अनेक पदकों के साथ लखनऊ विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण की। आपको संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती, तेलगू, उर्दू  आदि भारतीय भाषाओं के साथ-साथ अंग्रेजी, जर्मन, फ्रैंच, रशियन, स्पैनिश, जापानी, आदि भारतीय भाषाओं का सम्यक् ज्ञान था। इन भाषाओं में आप वार्तालाप करने में ही नहीं, वरन् रचना करने में भी समर्थ थीं।२ आपने १९३९ ई. में लंदन विश्वविद्यालय से शिक्षा-मनोविज्ञान में विशेष योग्यता के साथ टी.डी. परीक्षा उत्तीर्ण की थी। आपने सन् १९४० से १९४७ तक आगरा विश्व्विद्यालय के अन्तर्गत ग्वालियर के कमला राजा महाविद्यालय में संस्कृत की विभागाध्यक्षा रहीं तथा अपनी योग्यता के कारण उसी कालेज में उपप्रधानाचार्य के पद को भी सुशोभित किया।
आपके पति श्री पेरालारत्नम् भारतीय विदेश सेवा में राजदूत के पद पर कार्यरत थे। जिनके साथ आपने जापान अरब देश, आस्ट्रेलिया, थाइलैण्ड, मैक्सिको, क्यूबा, पनामा, कोलम्बिया,पेरु, चिली, इण्डोनेशिया, रुस, लाओस आदि देशों का भ्रमण किया तथा इन देशों में संस्कृत को बढावा दिया। आस्ट्रेलिया, टोकियो, मैक्सिको व मास्को विश्वविद्यालयों में आपने संस्कृत एवं हिन्दी के अतिथि प्रोफेसर के रुप में कार्य किया।३ आप दिल्ली के सुप्रसिद्ध रामजस कालेज की तीन वर्ष प्राचार्या रही। आप दिल्ली स्थित भारतीय विज्ञान भवन में भारतीय संस्कृति की प्राध्यापिका रही। इस तरह आपने देश-विदेश के हजारों छात्रों में भारतीय संस्कृति एवं संस्कृत भाषा के प्रति अभिलाषा उत्पन्न किया।४ आप जीवन भर अनेकों पत्र-पत्रिकाओं से जुडी रहीं। कानपुर से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘संस्कृत-पारिजातम्’ के संरक्षक मण्डल की आप सदस्या थीं। रामायण, कालिदास तथा भवभूति पर आप के अनेकों लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। आपने स्पैनिश भाषा में भी बहुत सारी रचनायें की हैं। आपके द्वारा प्रणीत ‘अक्षरगीतम्’ संस्कृत भाषा में गीतों की एक प्रसिद्ध पुस्तक है।


आपने १९६३ ई. में अखिल भारतीय कालिदास परिषद की स्थापना की। संस्था के प्रतिनिधि के रुप में आपने १९६० से १९६७ तक भारत का प्रतिनिधित्व मैक्सिको में में किया तथा प्राच्य विद्या पर अपने शोधपत्रों का वाचन किया। सन् १९६८ में  मैक्सिको में हुए महिला पत्रकार सम्मेलन में आपने भारत का प्रतिनिधित्व किया। सन् १९७१ ई. में पुनः आयोजित हुए इस संगठन की आप उपाध्यक्षा चुनी गईं । सन् १९७३ ई. में विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन  ने आपको ‘कालिदास विद्वान’ की उपाधि से सम्मानित किया। आपने सन् १९७७-१९७८ में सम्म्मानित अतिथि के रुप में नागपुर एवं मारीशस में आयोजित विश्व हिन्दी -सम्मेलन में भाग लिया। आपकी संस्कृत नाटकों के प्रति गहरी अभिरुचि रही। इसलिये आपने संस्कृत रंगमंच की स्थापना भी की थी। आप जीवन पर्यन्त संस्कृत -साहित सेवा में संलग्न रही।
                                                                                               रचनाएँ
आपकी पाँच रचनाएँ प्राप्त हुई हैं।
(क)गणञ्छागः
(ख)विक्रमवेतालनाटिका
(ग)विवेकानन्दस्मृति
(घ)नचिकेतोयमसम्वादम्-
(ङ)विवेकानन्दविजयम्


 (क)गणञ्छागः-
       यह एक प्रतीकात्मक कल्पित बाल रुपक है। इसमें दो दृश्य हैं। इसमें साक्षरता के महत्त्व को बतलाया गया है। यह रुपक सन् १९७६ ई. में ‘दिव्यज्योति’ पत्रिका के जुलाई अंक में प्रकाशित हुआ है।
(ख)विक्रमवेतालनाटिका-
          इसका प्रकाशन सन् १९८२ ई. के दिसम्बर अंक तथा पुनः१९८३ के जनवरी अंक में हुआ। इसमें चार दृश्य हैं।
(ग) विवेकानन्दस्मृति-
          यह एक रेडियो-रुपक है। इसका प्रकाशन १९८४ ई. को ‘संविद्’ नामक पत्रिका में हुआ। इसमें विवेकानन्द की जन्म से लेकर मृत्यु तक की घटनाओं को दर्शाया गया है। इसमें तीन दृश्य है।
 (घ)नचिकेतोयमसम्वादम्-
     इसका प्रकाशन ‘पारिजातम्’ पत्रिका १९८४ के अगस्त अंक में हुआ। इसमें तीन दृश्य हैं। इसका उपजीव्य ‘कठोपनिषद्’ है।
(ङ)विवेकानन्दविजयम्-
         ‘पारिजातम्’पत्रिका के जुलाई १९८६ अंक में इसका प्रकाशन हुआ। इसमें तीन अंक हैं। जिसमें स्वामी विवेकानन्द की घटनाओं को दिखाया गया है।
इन समस्त रुपकों का समय-समय पर दिल्ली दूरदर्शन एवं आकाशवाणी से प्रसारण हो चुका है।

इस प्रकार निष्कर्ष रुप में कह सकते हैं कि-कमलारत्नम् ने अपना सम्पूर्ण जीवन संस्कृत भाषा के लिए समर्पित कर दिया । अपने इन अवदानों के लिये वह संस्कृत साहित्य सदैव स्मरण की जायेंगी।
                                                                                       सन्दर्भ-ग्रन्थ  
१.आधुनिक संस्कृत महिला नाटककार, डाँ.मीरा द्विवेदी परिमल पब्लिकेशन्स, दिल्ली, प्रथम सं. १९९६, पृष्ठ १०
२.आधुनिक संस्कृत कवयित्रियाँ, डाँ. अर्चना कुमारी दुबे,नवजीवन पब्लिकेशन,निवाई (राजस्थान),प्रथम संस्करण२००६, पृष्ठ८६ ,
३.वही,पृ.८७
४. आधुनिक संस्कृत महिला नाटककार, डाँ.मीरा द्विवेदी परिमल पब्लिकेशन्स, दिल्ली, प्रथम सं. १९९६, पृष्ठ ११
५.आधुनिक संस्कृत कवयित्रियाँ, डाँ. अर्चना कुमारी दुबे,नवजीवन पब्लिकेशन,निवाई (राजस्थान),प्रथम संस्करण२००६, पृष्ठ८७
६.आधुनिक संस्कृत महिला नाटककार, डाँ.मीरा द्विवेदी परिमल पब्लिकेशन्स, दिल्ली, प्रथम सं. १९९६, पृष्ठ १२


- डॉ. अरुण कुमार निषाद