प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मार्च 2017
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

फिल्म समीक्षा

अंडरकवर एजेंट्स को समर्पित फिल्म फ़ोर्स- 2 : तेजस पूनिया

 




फ़ोर्स फिल्म की सीक्वल फ़ोर्स- 2 उन अंडरकवर एजेंट्स को समर्पित है, जो समय आने पर देश के लिए अपनी जान देते हैं और उन्हें 'शहीद' का दर्जा भी नहीं मिलता। इसी थीम और भावना को लेकर इस फिल्म की कहानी बुनी गई है। परन्तु इस फिल्म में भाषा की अशुद्धियाँ बहुत खटकती हैं। मसलन एचआरडी मिनिस्टर (मंत्री) का नाम गलत हिज्जे (उच्चारण) के साथ ब्रीजेश वर्मा बोला जाना, जबकि हंगरी के अधिकारी सही नाम ब्रजेश वर्मा बोलते हैं। यही मिनिस्टर अपने भाषण में हंगेरियन-इंडो बोलते हैं, जबकि यह इंडो-हंगेरियन होना चाहिए था। चीनी शहरों और व्यक्तियों के नामों के उच्चारण और शब्दांकन में भी यथा संभव गलतियाँ हैं। हालांकि इन सब गलतियों के बावजूद फिल्म ठीक ही कही जा सकती है। ऐसी गलतियाँ अमूमन हर फिल्म में देखने को मिल जाती हैं।

फिल्म की कहानी कुछ इस तरह है। एसीपी यशवर्धन (जॉन अब्राहम) पांच वर्ष पूर्व अपनी पत्नी को खो देता है और अब उसे इस दर्द/गम के अलावा कोई और दर्द या गम नहीं है। दूसरी ओर रॉ के तीन एजेंट्स चीन में मारे जाते हैं। इनमें से एक यश का दोस्त भी है। फिल्म में एक राज ये भी है कि कोई ऐसा है जो इनकी पहचान दुश्मनों को बता रहा है और इसे ढूंढने की जिम्मेदारी यश को सौंपी जाती है। इस काम में उसकी मदद करती है रॉ की एक अन्य एजेंट केके (सोनाक्षी सिन्हा)। दोनों पता लगाते हैं कि बुडापेस्ट (चीन) में कोई ऐसा शख्स है जो यह काम कर रहा है। बुडापेस्ट पहुंच कर वे शिव शर्मा (ताहिर भसीन राज) को बेनकाब कर देते हैं। इसके बाद शिव को पकड़ने का खेल शुरू होता है। शिव ऐसा क्यों कर रहा है, यह राज फिल्म के अंत में खुलता है। फिल्म की कहानी बेहद सरल है और सारा फोकस शिव को पकड़ने में होने वाले रोमांच पर रखा गया है। इसके लिए कॉमेडी या रोमांस की बैसाखियों का सहारा भी नहीं लिया गया है। फिल्म में आगे क्या होने वाला है इसका अंदाजा लगाना ज्यादा मुश्किल  नहीं है। कुछ उतार-चढ़ाव देकर चौंकाने की कोशिश की गई है, हालाँकि ये पैंतरेबाजी बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं कर पाती। स्क्रिप्ट में एक्शन के शौकीनों को खुश करने के लिए फिल्म में उद्देश्य को एक किनारे रख दिया गया है। इसीलिए यह फिल्म किसी हॉलीवुड फिल्म  की कॉपी जैसी सी लगती है। बुडापेस्ट की सड़कों पर यश और केके जिस तरह की गोलीबारी करते हैं उस पर यकीन करना थोड़ा मुश्किल हो जाता है और शिव तक हर बार यश-केके आसानी से पहुंच जाते हैं। यदि इसमें थोड़ी कठिनाई रखी जाती तो फिल्म का मजा और बढ़ सकता था, लेकिन एक्शन सीक्वेंस की अधिकता के कारण इस ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। केके और यश की अलग-अलग 'वर्किंग स्टाइल' को लेकर होने वाले टकराव से दर्शकों का मनोरंजन होता है। 'फोर्स' का निर्देशन निशिकांत कामत ने किया था, लेकिन सीक्वल अभिनय देव ने  बनाया है। स्क्रिप्ट की कमियों को बखूबी छिपाते हुए उन्होंने फिल्म को 'कूल' लुक नाम दिया है और 'स्टाइलिश' एक्शन का तड़का लगा कर दर्शकों का मनोरंजन भी किया है। अभिनय की इसलिए भी तारीफ की जा सकती है कि उन्होंने फिल्म को ज्यादा भटकने नहीं दिया। एक आइटम सांग का मोह भी वे छोड़ देते तो बेहतर ही होता। हंगरी की महिला का हिंदी गाना अटपटा सा लगता है। किन्तु जब हिंदी वैश्विक हो गई है तो ऐसा होना संभव भी है।

'फोर्स 2' के एक्शन डायरेक्टर और उनकी टीम का काम काबिल-ए-तारीफ है। कार चेज़िंग सीन और गन फाइट्स के जरिये वे दर्शकों को रोमांचित करने में सफल रहे हैं। दो-तीन सीक्वेंस तो कमाल के हैं। निश्चित रूप से एक्शन फिल्मों के प्रशंसक इन्हें देख कर रोमांचित होंगे। जॉन अब्राहम एक स्टाइलिश हीरो हैं और वे इस फिल्म में बेहतरीन लगे हैं। जॉन के चेहरे पर आसानी से भाव नहीं आते और उन्हें इस तरह के दृश्य बहुत कम दिए गए हैं। ज्यादातर समय वे एक्शन करते ही नजर आए। उनका एंट्री वाला सीक्वेंस जोरदार है। सोनाक्षी सिन्हा ने जॉन का साथ अच्छे से निभाया है और वे भी रॉ एजेंट के रूप में एक्शन करती नजर आईं। ताहिर राज भसीन एक कूल और माउथ आर्गन बजाने वाले और चालाक विलेन के रूप में वे अपना प्रभाव छोड़ते हैं।
सिनेमाटोग्राफी जबरदस्त है और फिल्म को 'रिच लुक' देती है। क्लाइमैक्स का कुछ  हिस्सा वीडियो गेम की तरह शूट किया गया है और यह प्रयोग अच्छा लगा है। एक्शन सीक्वेंस को भी सफाई के साथ शूट किया गया है। फिल्म का बैकग्राउंड म्युजिक अन्य एक्शन फिल्मों की तरह लाउड नहीं है। तकनीकी रूप से फिल्म बेहद सशक्त है।
पिछली वाली ‘फोर्स’ के पांच साल बाद आए इस सीक्वल में कहानी पांच साल बाद की ही है। एसीपी यशवर्द्धन (जॉन अब्राहम) अब पहले से ज्यादा चुप्पा, ज्यादा सख्त हो चुका है। चीन में छुपकर काम कर रहे भारत के एजेंट एक-एक कर मारे जा रहे हैं। गद्दार कोई अंदर का ही आदमी है। मरते-मरते एक एजेंट अपने दोस्त यश को एक हिंट दे जाता है। यश रॉ की अफसर के.के. (सोनाक्षी सिन्हा) के साथ हंगरी जाकर उस गद्दार को ढूंढ भी निकालता है, लेकिन बाजी लगातार पलटती रहती है। पर्दे का खलनायक बदल रहा है। अब हमारी लड़ाई पाकिस्तान नहीं, चीन के साथ है। बदले माहौल की झलक फिल्म और इसके संवादों में आती है, तो दर्शक इससे खुद को जोड़ पाते हैं।


अरुणाचल प्रदेश में चीन के घुस आने का भी  जिक्र फिल्म में है और जॉन का यह संवाद भी कि ‘सर वक्त बदल गया है, अब हम अंदर घुस कर मारते हैं।’ साफ है कि लेखक आसपास की दुनिया से बेखबर नहीं है। दर्शकों को पर्दे पर यही तो चाहिए- लफ्फाजी नहीं, मुद्दे की बात करो। इस किस्म की एक्शन-थ्रिलर फिल्मों में जिस कसावट, पैनेपन और रफ्तार की जरूरत होती है, वह इस फिल्म में पहले ही सीन से हैं। चीन में एजेंटों के मारे जाने का सीक्वेंस हो या इधर मुंबई में यश का एंट्री-सीन, सब ऐसे धारदार हैं कि आप दम साधे देखते हैं और कम से कम इंटरवल तक तो एक पल के लिए भी पर्दे से नजर नहीं हटा पाते।
डायरेक्टर अभिनय देव ने लगभग पूरी फिल्म को सलीके से संभाला है। सैकिंड हॉफ में चंद पलों के लिए फिल्म धीमी पड़ती है, लेकिन जल्द संभल भी जाती है। हालांकि यह कमियों से भी अछूती नहीं है। थ्रिलर फिल्म में आप अतार्किक नहीं हो सकते। एक-दो जगह यह फिल्म तर्क छोड़ कर ‘फिल्मी-सी’ हुई है, लेकिन इसकी तेज गति आपको इन बातों पर ध्यान देने का मौका नहीं देती। अंत जरूर कमजोर है क्योंकि दुनिया भर में कोई भी सरकार अपने जासूसों की पोल खुलने पर उन्हें न तो स्वीकारती है न स्वीकारेगी, भले ही कैसे भी दबाव हों। मुंह की बजाय हाथ-पैरों से बात करने वाले इस किस्म के किरदारों में जॉन जंचते आए हैं और यहां भी वह पूरी फॉर्म हैं। सोनाक्षी सिन्हा कुछ एक जगह बेबस दिखी हैं, लेकिन वह भी अपनी भूमिका में फिट लगी हैं। ताहिर राज भसीन का बेफिक्र अंदाज उनकी कुटिलता को और निखारता है। एक्शन सीन बहुत ही बढ़िया तरीके से कंपोज़ किए गए हैं और इसमें कैमरे ने भी बखूबी साथ निभाया है। हालांकि ये सीक्वेंस काफी लंबे हैं, लेकिन एक्शन और थ्रिल के चाहने वालों को यह बोर नहीं करते। गाने फिल्म में हैं नहीं। ‘मि. इंडिया’ के ‘काटे नहीं कटते ये दिन ये रात...’ का एक नया वर्जन जरूर है जो असल में लगता है ‘नैनसुख’ के लिए डाला गया है। इस फिल्म में रोमांस नहीं है, इमोशंस नहीं है, कॉमेडी भी नहीं है और इनकी गुंजाइश थी भी नहीं शायद। फिल्म मुख्यतः एक्शन और थ्रिल परोसती है और इसकी खुराक में कमी नहीं आने देती।


- तेजस पूनिया