प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मार्च 2017
अंक -47

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

संस्मरण

पिता

आज भी जब याद करती हूँ तो हँसी आ जाती है, जब आपने पूछा था- किस क्लास में आ गये तुम दोनों (हम दोनों बहनें, जो मुझसे डेढ वर्ष छोटी है) आपको पता ही नहीं चला कि कब कक्षाएं पार कर हम काॅलेज में आ गये हैं। तब लगा था पापा लापरवाह हैं शायद, आज सोचती हूँ तो लगता है कि उन्हें आभास ही नहीं था हमारे बड़े होने का। इससे अलग असमंजस की स्थिति भी है कि वो हमारे विवाह को लेकर भी ख़ासे परेशान रहते थे, वो भी जब हम केवल 15-16 वर्ष की आयु में थे। समाज के हिसाब से चलना चाहते थे और दूसरी तरफ ये भी कि बेटा जिस इन्सान से तुम्हारे विचार मिलें और तुम लगाव महसूस करो, उस व्यक्ति से ही तुम लोगों की शादी हो, ऐसा मेरा प्रयास रहेगा।

माँ से ज्यादा प्रभावित होती हैं बेटियाँ, सच भी है। हमारी माँ ने सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, पाकशास्त्र से लेकर घर गृहस्थी के हर काम में हमें निपुण किया, साथ ही सन्तुलित व्यावहारिक ज्ञान देने की हर सम्भव कोशिश की, ये बात अलग है कि हम कितना सीखे और पापा, जिन्होंने लिखने की शुरूआत से ही अनार की डंडी की कलम बना कर थमा दी थी, स्याही की दवात, तख्ती फिर एक से बढ़कर एक फाउन्टेन पैन। अपने पास रखी खूबसूरत तस्वीरें, जो उन्होंने इकठ्ठा कर रखीं थीं कि मेरा कोई बच्चा तो इन तस्वीरों की तरह तस्वीरें बनायेगा (आज भी मेरे पास मौजूद हैं)।
हर जन्मदिन पर रंग, चित्रकला की किताबें और साथ में हर हफ्ते घर में संगीत का माहौल। आपका बांसुरी बजाना, बैंजो पर धुन निकालना, मधुर आवाज़ और तबले-ढोलक पर पड़ती थाप पर माँ का नाचना-गाना। अंत्याक्षरी पर 'म' शब्द आने पर सिर्फ एक गाना गाना चाहे वो शब्द किसी के भी हिस्से आये- "मधुबन में राधिका नाचे रे" और अपने कार्यालय में कर्मठ ईमानदार छवि।


हम दोनों बहनों ने पिता की विरासत में से कब संगीत और चित्रकला का बंटवारा कर लिया पता ही नहीं चला। मैंने रंग चुने उसने लय। एक वक्त ऐसा भी आया कि समाज की व्यवस्था से हार कर दिल की बीमारी से घिर गये पर हारे नहीं, ना ही मुझे हारने दिया, सम्बल बन गये। सबसे ज्यादा मेरे दर्द और चुप्पी को समझने वाले मेरे पापा की मेरे लिये लिखी कुछ पक्तियाँ जीवन में हार न मानने का सबब बनीं।

दर्द में मर्म का अहसास बहुत है
विपत्ति में धैर्य का साहस बहुत है
पलकें बोझिल क्यों हैं मेरे लाल
विश्वास की डोर में आशीष बहुत है


अक्सर रात 11 बजे हम दोनों बहनें और पापा की जुगलबन्दी चलती। मैं पेटिंग करती, दीपा तबले का रियाज़ करती। पापा ग़ज़लें सुनते, लिखते और पढ़ते फिर एक ब्रेक, जिसमें हर तरह के विषय पर विचार-विमर्श, अध्यात्म से लेकर प्रेम जैसे विषय भी शामिल, उर्दू सर्विस के गानों से शुरू ट्रांजिस्टर चलता रहता सुबह 4 बजे से शास्त्रीय संगीत सुनकर हमारी रात होती और माँ की सुबह।

अजब-गजब दिन और रात
अपनी पहचान बनाने की ख़ातिर हम दोनों बहनों का दिल्ली चले जाना, माँ का दिल पर पत्थर रख कठोर बनना और पापा का अतिभावुक होकर कमज़ोर पड़ना, रोज़-रोज़ फोन करना, छुट्टी मिलते ही हमारे पास आना, मंडी हाउस में घूमना, हमारे साथ फुटपाथ पर बैठकर चने खाना। धीरे-धीरे आपका अतिभावुक होकर कमज़ोर पड़ते जाना, दोनों छोटे भाईयों के भविष्य के बारे में बात करना (दोनों भाई मुझसे 14-16 वर्ष छोटे हैं) और......एक दिन अचानक हार्ट अटैक और ब्रेन हैमरेज से कोमा में पहुँचना और अन्तिम वक्त में होश आने पर इशारों में पूछना, कैसे करोगे?
माँ का संयत हो इतना कहना कि आप सारी चिंताएँ छोड़ दो, ईश्वर का, नारायण का ध्यान करो। और आपका नश्वर शरीर को छोड़ना, मेरा एम्बुलेन्स से स्ट्रेचर पर उसी शरीर को कन्धा देकर घर लाना...............ख़ामोशी......गहन ख़ामोशी उतर गई थी उस दिन मेरे अन्दर।

17 वर्षों से अधिक बीत गये आपको गये पर आपकी बात किसी न किसी रूप में रोज़ आती है।
पिता, तुम्हारे लिये क्या कहूँ, शब्दकोश के अच्छे से अच्छे शब्द ढूँढे पर सब अधूरे मिले....!!!


- पूनम भार्गव ज़ाकिर
 
रचनाकार परिचय
पूनम भार्गव ज़ाकिर

पत्रिका में आपका योगदान . . .
संस्मरण (1)