प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2015
अंक -47

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

नवगीत

चीखकर ऊँचे स्वरों में

चीखकर ऊँचे स्वरों में
कह रहा हूँ
क्या मेरी आवाज
तुम तक आ रहीहै?

जीतकर भी
हार जाते हम सदा ही
यह तुम्हारे खेल का
कैसा नियम है
चिर-बहिष्कृत हम
रहें प्रतियोगिता से
रोकता हमको
तुम्हारा हर कदम है
क्यों व्यवस्था
अनसुना करते हुए यों
एकलव्यों को
नहीं अपना रही है

मानते हैं हम
नहीं सम्भ्रांत, नासम्पन्न
साधनहीन हैं
अस्तित्व तो है
पर हमारे पास
अपना चमचमाता
निष्कलुष,निष्पाप सा
व्यक्तित्व तो है
थपथपाकर पीठ अपनी
मुग्ध हो तुम
आत्मा स्वीकार से
सकुचा रही है

जब तिरस्कृत कर रहे
हमको निरन्तर
तब विकल्पों को तलाशें
या नहीं हम
बस तुम्हारी जीत पर
ताली बजाएं
हाथ खाली रख
सजाकर मौन संयम
अब नहीं स्वीकार
यह अपमान हमको
चेतना प्रतिकार के
स्वर पा रही है


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भीड़ में भी तुम मुझे पहचान लोगे

भीड़ में भी
तुम मुझे पहचान लोगे
मैं निषिद्धों की
गली का नागरिक हूँ

हर हवा छूकर मुझे
तुम तक गई है
गन्ध से पहुँची
नहीं क्या यन्त्रणाएँ
या किसी निर्वात में
रहने लगे तुम
कर रहे हो जो
तिमिर से मन्त्रणाएँ
मैं लगा हूँ राह
निष्कंटक बनाने
इसलिए ठहरा हुआ
पथ में तनिक हूँ

हर कदम पर
भद्रलोकी आवरण हैं
हर तरह विश्वास को
जो छल रहे हैं
था जिन्हें रहना
बहिष्कृत ही चलन से
चाम के सिक्के
धड़ाधड़ चल रहे हैं
सिर्फ नारों की तरह
फेंके गये जो
मैं उन्हीं विख्यात
शब्दों का धनिक हूँ

मैं प्रवक्ता वंचितों का
पीड़ितों का  
यातना की
रुद्ध-वाणी को कहूँगा
शोषितों को शब्द
देने के लिए ही
हर तरह प्रतिरोध में
लड़ता रहूँगा
पक्षधर हूँ न्याय
समता बंधुता का
मानवी विश्वास का
अविचल पथिक हूँ


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पेड़ पर लटके हुए शव लड़कियों के

पेड़ पर लटके हुए
शव लड़कियों के
सिर्फ मादा जिस्म, या
कुछ और हैं

कौन हैं ये लड़कियाँ
रौंदा गयी हैं
देह जिनकी
क्यों प्रताड़ित हैं
दलित अपमान को
पीते हुए भी
कौन हैं वे
गर्व जिनको
लाडलों की क्रूरता पर
क्यों समय निर्लज्ज
बैठा मौन को
जीते हुए भी
सांत्वना के शब्द भी
हमदर्द होकर
गालियों के बन रहे
सिरमौर हैं

यह दबंगों की
सबल, संपन्न
सत्ता-अंधक्रीड़ा
जब तुम्हारे बीच से
उठकर, तुम्हें
धिक्कार देगी
आज के असहाय
जनकी कसमसाहट
मुखर होकर
संगठित हो
एक दिन संघर्षमय
प्रतिकार लेगी
रोक सकते क्रूरता
तो रोक लो यह
आ रहे बदलाव के
अब दौर हैं


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अनसुना है पक्ष मेरा

अनसुना है पक्ष मेरा
वाद में
प्रतिवाद का

साक्ष्य अनदेखा रहा आया
अभी तक
जो मुझे निर्दोष घोषित
कर सकेगा
दृष्टि बंधित जो हुआ
पूर्वाग्रहों से
वह तुम्हें अभियुक्त
क्यों साबित करेगा
वह व्यवस्था क्या
जहाँ, अवसर
नहीं संवाद का

जब तुम्हारे ही
बनाये मानकों के
तुम नहीं अनुरूप
फिर अधिकार कैसा
गढ़ रहे फिर भी
नए प्रतिमान जिनमें
साँस भी हमको
मिले उपकार जैसा
क्यों करूँ स्वीकार
बिन उत्तर
मिले परिवाद का

क्यों नहीं संज्ञान में
मेरी दलीलें
दृष्टि में क़ानून की
समकक्ष हूँ मैं
हो भले विपरीत ही
निर्णय तुम्हारा
परसदा अन्याय का
प्रतिपक्ष हूँ मैं
साँस क्यों लूँ मैं
तुम्हारी, दया पर
आह्लाद का


- जगदीश पंकज
 
रचनाकार परिचय
जगदीश पंकज

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