प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मार्च 2017
अंक -43

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

लघुकथा- अलविदा

दर्पण में अपने चेहरे पर पड़ती झुर्रियों के साथ बालों में से झाँकती चाँदी देखकर वह खिलखिला उठी। उसकी आजादी के साथ उसके सारे प्रश्न भी आज आजाद हो गये थे, जो बरसों से दिलो-दिमाग में कैद उसे हर वक्त कोंचते रहते थे।
हिरणी सी कुलाँचे भरती, ग्यारह बरस की होते ही, अचानक उसकी आजादी किसी पंछी-सी पिंजरे में कैद कर दी गयी थी, पूछने पर भी माँ ने नहीं बताया था कि वह अपने भाई की तरह अन्य बच्चों के साथ क्यों नहीं खेल सकती। फिर तो जो सिलसिला शुरू हुआ, चलता ही गया। कंधे पर दुपट्टे के न हटने से लेकर, ससुराल में कदम रखते ही सिर पर पल्लू का टिका रहना, खुलकर हँसने-बोलने पर प्रतिबंध लग गया था। खुली हवा में साँस लेना मुश्किल था। अक्सर सड़क पर लोलुप निगाहें लिए भेड़ियों से भी सामना हो जाता था। फिर तो हर घुटती-साँस भी सिसकती हुई पूछती थी, "इतना भेदभाव क्यों? आखिर कोई तो बताये?"

अचानक बेटे-बहू ने आकर उसकी तंद्रा तोड़ी, "चलिए माँ, सब आ गये हैं।"
आज केक काटने के साथ वह खुद को पचासवें जन्मदिन पर बधाई देती फूली नहीं समा रही थी। टच वुड और हाउ क्यूट की फुहार के साथ वह अब अपनी जवानी को अलविदा कहती, उन्मुक्त गगन में आजाद पंछी-सी उड़ी जा रही थी।



*********************************************************************


लघुकथा- शिड़िंग आंटी

बढ़ती उम्र की झुर्रियों के साथ अपने अशक्त हाथों से, आज मारिया दीवान पर बिछी चादर की सिलवटों को मिटाती आतुर हुई जा रही थी। अभी फोन आया था, सनी अपनी विदेशी-पत्नी के साथ किसी भी पल उससे मिलने यहाँ पहुँचता होगा। उसे विदेश गये पूरे बारह वर्ष हो चले थे। न जाने वह अब कैसा दिखता होगा?

अरसा बीत गया, जब वह चार साल के सनी को ट्यूशन पढ़ाने उसके घर गयी थी। गोरे-चिट्टे चेहरे पर दो मासूम आँखें उसे देखते ही बिफर पड़ी थीं, "नहीं, मुझे नहीं पढना इस काली-सी टीचर से, कभी भी नहीं।" फिर तो वह अपने काले रूप-रंग के साथ अपनी गरीबी के बोझ तले, महँगे से कालीन पर खड़ी खुद में दबी चली जा रही थी। किन्तु उसी पल सनी के पापा ने उसे उबार लिया था, "तो क्या हुआ। टीचर जी को भी अपनी तरह शिड़िंग (क्रीम) लगा देना, वह भी गोरी हो जाएँगी।" फिर प्यारी-सी हंसी की फुहार में भीगती वह फूल-सी खिल गयी थी।

सनी मारिया से अंग्रेजी के सभी शब्दों का उच्चारण सही से सीख गया था, किन्तु मरिया को क्रीम की जगह शिड़िंग बोलना सिखा गया था।
अचानक यादों के झूले में झूलती मारिया चौंक पड़ी जब, "शिड़िंग-आंटी” कहता सुदर्शन-सा गोरा-चिट्टा नवयुवक फूलों और उपहारों से लदा खड़ा मुस्कुरा रहा था। दोनों के बहते आँसुओं के मधुर-संगम को देखकर, नववधू के सांवले चेहरे पर चमकती दो अजनबी आँखें भी अब प्यार से छलकी जा रही थीं।

उधर उपहारों के बीच सजा ब्रांडेड शिड़िंग (क्रीम) का डिब्बा, बड़ी शान से मुस्कुराता नजर आ रहा था।


- प्रेरणा गुप्ता
 
रचनाकार परिचय
प्रेरणा गुप्ता

पत्रिका में आपका योगदान . . .
कथा-कुसुम (5)