हस्ताक्षर रचना
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
मार्च 2017
अंक -41

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

पत्रकारिता और समाज
पत्रकारिता जनता और सरकार के बीच, समस्या और समाधान के बीच, व्यक्ति और समाज के बीच, गाँव और शहर के बीच, देश और दुनिया के बीच, उपभोक्ता और बाजार के बीच सेतु का काम करती है। यदि यह अपनी भूमिका सही मायने में निभाए तो हमारे देश की तस्वीर वास्तव में बदल सकती है।
राष्ट्रीयता की ध्वजवाहिका, स्वदेश प्रेम, मानव कल्याण एवं बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय के दृष्टिकोण को लेकर जन्मी पत्रकारिता आज कैसे दिग्भ्रमित हो गई? इस संबंध में हमें भारतीय पत्रकारिता के लगभग सवा दो सौ वर्ष के इतिहास के सभी पक्षों का तुलनात्मक अध्ययन करना होगा।
 
वर्तमान में मीडिया अधिक प्रसार एवं विज्ञापन प्राप्त करने की होड़ में इस कदर फंस चुकी है कि भारत का असली चेहरा कहां है, वह भूल चुकी है। उपभोक्तावादी संस्कृति को बढ़ावा देकर विज्ञापनदाताओं को प्रत्यक्ष सहयोग प्रदान करना उसका ध्येय हो गया है। इससे क्या देश आने वाले दशक में विकसित राष्ट्रों में शामिल हो जाएगा? इस पर प्रश्नचिन्ह लग रहा है।
भारत की आत्मा गांवों, झोपड़ियों , बस्तियों में बसती है। मीडिया का दायित्व है कि उनकी उपेक्षा न करके समाज की मुख्य धारा में इन्हें भी जोड़ें। पश्चिमी सभ्यता के उपनिवेशवादी अप-संस्कृति के भंवरजाल में उलझी मीडिया को इससे निकलना होगा और राष्ट्र की वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत करनी होगी। नहीं तो आने वाला कल इसी मीडिया से प्रश्न करेगा कि यह किसका राष्ट्र है? मीडिया को अपना लक्ष्य बदलना होगा तभी हम खुशहाल  राष्ट्र के सपने को साकार कर सकते हैं।
 
टी.वी. चैनलों और बड़े अख़बारों की सीमा यह है कि वे ग्रामीण क्षेत्रों में अपने संवाददाताओं और छायाकारों को स्थायी रूप से तैनात नहीं कर पाते। कैरियर की दृष्टि से कोई सुप्रशिक्षित पत्रकार ग्रामीण पत्रकारिता को अपनी विशेषज्ञता का क्षेत्र बनाने के लिए ग्रामीण इलाक़ों में लंबे समय तक कार्य करने के लिए तैयार नहीं होता। कुल मिलाकर, ग्रामीण पत्रकारिता की जो भी झलक विभिन्न समाचार माध्यमों में आज मिल पाती है, उसका श्रेय अधिकांशत: जिला मुख्यालयों में रहकर अंशकालिक रूप से काम करने वाले  पत्रकारों को जाता है, जिन्हें अपनी मेहनत के बदले में समुचित पारिश्रमिक तक नहीं मिल पाता। इसलिए आवश्यक यह है कि नई ऊर्जा से लैस प्रतिभावान युवा पत्रकार अच्छे संसाधनों से प्रशिक्षण हासिल करने के बाद ग्रामीण पत्रकारिता को अपनी विशेषज्ञता का क्षेत्र बनाने के लिए उत्साह से आगे आएँ और उनको संस्थान का पूरा सहयोग प्राप्त हो।
 
वर्तमान में हिन्दी पत्रकारिता ने अंग्रेजी पत्रकारिता के दबदबे को खत्म कर दिया है। पहले देश-विदेश में अंग्रेजी पत्रकारिता का दबदबा था लेकिन आज हिन्दी भाषा का झण्डा चहुँदिश लहरा रहा है। ३० मई, प्रतिवर्ष 'हिन्दी पत्रकारिता दिवस' के रूप में मनाया जाता है। अगर हिंदी पत्रकारिता न होती तो हिंदुस्तान की आधी आबादी आज भी खबरों से वंचित होती। हिंदी पत्रकारिता का जो गौरवपूर्ण इतिहास हमारे सामने है उससे हम यह समझते हैं कि रचनात्मक समाज में इसका योगदान कितना महत्वपूर्ण हैं। पर बेहद रोष की बात ये है कि वर्तमान में हिंदी पत्रकारिता अपनी मूलभूत दशा और दिशा से भटक गयी हैं। आज हम ख़बरों से तात्पर्य उन घटनाओ की रिपोर्टिंग से लगाते हैं जो हममे रोमांच पैदा करें।  भले ही उस घटना का आम जनमानस से कोई नाता न हो। कहा जाता हैं कि आज के समय में वही अखबार चल सकते हैं जो लेखन से ज्यादा सनसनी पैदा करते हों। अगर ख़बरों में सनसनी हैं तो अखबार चलने की संभावना है अन्यथा उसका डूबना तय। हालाँकि इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि इस प्रवृत्ति को जन्म इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने दिया हैं पर अब ये प्रिंट मीडिया में भी हावी हो रहा हैं जो हिंदी पत्रकारिता के लिए शुभ नहीं हैं  क्योकि हिंदी पत्रकारिता का आधारभूत स्तभ ही 'प्रिंट मीडिया' है। अगर ये गिरा तो हिंदी पत्रकारिता के अस्तित्व को खत्म होते देर नहीं लगेगी।
 
इसके अतिरिक्त एक सच यह भी है कि भूमंडलीकरण के इस दौर में पत्रकारिता भी अब स्वतंत्र नहीं रही हैं।  एक दौर था जब ख़बरों का चयन सामाजिक संदर्भ को देखकर किया जाता था पर अब ख़बरों का चयन मालिकों की रूचि के अनुरूप किया जाता है। सीधे शब्दों मे कहूँ तो पहले ख़बरों को समाज तय करता था और अब बाजार। लिहाजा ख़बरों के स्तर में गिरावट का आना स्वाभाविक है पर ये गिरावट इतनी भी नहीं है कि इसे सुधारा न जा सके।
पर हमें इसकी शुरुआत साझे तौर पर करनी होगी। कुछ लगन आपकी (समाज की) होगी तो कुछ मेहनत हमारी(पत्रकारों की), लगन इस चीज की कि आपको खुद ये तय करना होगा कि ख़बरों में आपको क्या चाहिए। और यकीन मानिये आपका निर्धारण ही हमारी ख़बरों के चयन का आधार होगा।
 
तो आइये अब हम और आप मिलकर हिंदी पत्रकारिता के गिरते स्तर को सुधारने के लिए प्रयत्नशील हों ताकि हम सब अपनी आने वाली पीढ़ी को स्वस्थ पत्रकारिता की पहचान करा सकें।

- ज्ञानेन्द्र विक्रम सिंह
 
रचनाकार परिचय
ज्ञानेन्द्र विक्रम सिंह

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